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Home लघुकथा

इन दिनों ‘कट्टर’ से ‘कट्टा’ हो रहा हूं मैं…!

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 27, 2023
in लघुकथा
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आजकल मैं बहुत हीन भावना में जी रहा हूं. सामान्य तौर पर मैं सामान्य मनुष्य के जैसा जीवन ही जीना चाहता रहा हूं, मगर अब देख रहा हूं कि ऐसा सोचना भी मेरा असामान्य है. आजकल ऐसे सोचने वालों को कायर कहा जाता है. कायर ही नहीं बहुत कुछ कहा जाता है, जो यहां लिखा नहीं जा सकता.

‘कट्टर’ शब्द को मैं नकारात्मक मानता हूं. मुझे लगता है कोई एक बार कट्टर बन गया तो वह इंसान तो नहीं ही रहता ! अब मुझे लगता है कि मुझे अपनी सोच बदलनी पड़ेगी. पर मैं कट्टर जैसे भारी, महाप्रचलित और अतिआवश्यक शब्द को सिर्फ धर्म के साथ रखने का कट्टर विरोधी हूं.

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‘कट्टर’ शब्द को सीमित न रखकर इसको व्यापक करने की जररूत है. जैसे कट्टर ईमानदार, कट्टर खूबसूरत, कट्टर ज्ञान, कट्टर दयालु, कट्टर भावुक, कट्टर मेहनती, कट्टर नेता, कट्टर प्रेमी वगरैह….वह कट्टर गोरे रंग पर मरता है….वह कट्टर बेरोजगार है…ऐसे वाक्य बोले और लिखे जाने चाहिए !

कल बाजार में एक पुराना मित्र मिला. बोला, ‘यार तुम बहुत ढीले हो !’

मैंने उससे पूछा कि ‘फिर मुझे क्या करना चाहिए ?’

वह बोला, ‘थोड़ा कट्टर बनो !’

मैंने उसे शुक्रिया कहा.

‘किस बात के लिए !’ उसने पूछा.

‘आपने थोड़ा कहकर बहुत रियायत दे दी !’

वह मुस्कुराया। बोला,’ शुक्र है तुम जाग गए !’

‘क्या अब जागना भी होगा !’, मैंने पूछा.

वह हंसा और हाथों की उंगलियों को हिलाते हुए बोला, ‘बिना जागे कट्टर नहीं बन सकते…!’

‘यह भी गजब है ! बचपन में मां जगाती थी तो जवानी में घड़ी. सोचा था अब आराम से सोऊंगा तो तुम जैसे चिंतक जगा रहे. ट्रेन में किसी सहयात्री की तरह घड़ी-घड़ी भाईसाहब कौन-सा स्टेशन आया, पूछने वाले की तर्ज पर चैन से न रहने देना !’ मैंने उलाहना दिया.

‘भइया अपने धर्म के हो तो जागना पड़ेगा !’ उसने सर हिलाया.

‘अगर मैं किसी और धर्म का होता तो !’

‘तब तो कोई जरूरत नहीं थी.’

‘क्यों !’

‘वह तो पहले से जागे हैं !’

‘अच्छा ! तुम सारी खबर रखते हो ! वैसे जागने का काम चौकीदार का होता है !’

‘जागते तो चोर भी हैं !’ उसने यह कर अपनी एक आंख दबाई.

‘फिर मुझे कैसे जागना होगा !’ मैंने पूछा.

‘जैसे मैं जागा हूं !’ वह बोला.

अब जाकर मैंने उसे गौर से देखा. भरा हुआ चेहरा. चमकता हुआ. विज्ञापन वाली भाषा में कहूं तो विटामिन ई, एलोविरा से युक्त खिला-खिला चेहरा. एक मैं हूं कि जागने की वजह से मेरे आंखों के नीचे काले गड्ढे पड़ चुके हैं और यह…

‘मैं काफी देर तक जागता हूं मित्र !’

यह सुनकर वह हंसा.

‘नींद सेहत के लिए बहुत जरूरी है.’ उसने सुझाव दिया.

‘फिर जागने की बात क्यों करते हो ?’

‘अरे यार जागने का मतलब वो नहीं है, जो तुम ले रहे हो !’

‘फिर मैं कैसे लूं ?’

‘जागने का मतलब जाग्रत अवस्था. अपनी संकृति से प्रेम. राष्ट्र के प्रति भक्ति…!’

‘मुझे लगता है यह सब मैं करता हूं !’

‘जागने का मतलब देशद्रोहियों पर नजर भी ! खतरा बढ़ता ही जा रहा !’ यह कह कर वह इधर-उधर देखने लगा.

‘ये काम तो सरकार, सेना, पुलिस लोगों का है !’

‘तुम हो बेवकूफ ! अपने आसपास पहचानो !’

‘जल सेना के 11 जवान जासूसी करते हुए पकड़े गए, जब सेना ही नहीं पहचान पा रही तो हमारे जैसा साधारण इंसान क्या पहचानेगा !’

‘कपड़े से पहचानो !’

‘कपड़े से कैसे पहचान होगी ?’

‘सेना के जवान सब वर्दी में ही थे ! मुझे कोई और काम-धंधा नहीं है क्या !’ मैंने उसे झिड़का.

‘तुम्हें काम-धंधे की पड़ी है ! चाहे देश जल जाए ! हैएं !!!’ उसने मुझे घूरा. मैं समझ चुका था यह अपनी टेक नहीं छोड़ेगा.

‘तुमनेे तो मेरी आंखें खोल दी मित्र. देश के लिए अब मैं जागूंगा ! अगली बार जब तुमसे मिलूंगा तो मैं पूरा कट्टर बन कर मिलूंगा.. शायद तुमसे भी ज्यादा ! क्योंकि मैं अपने देश को सच्चा नहीं… नहीं…कट्टर प्यार करता हूं !!”

‘यह हुई न बात !’ उसने जोश में मेरे कंधे पर शाबाशी दी.

तभी उसके मोबाइल पर झम से एक संदेश आया. उसने वह संदेश दिखाया. संदेश कह रहा कि ‘जो कट्टर है, इसे लाइक करें.’ उसने मोबाइल मेरी तरफ बढ़ा दिया.

‘लो तुम लाइक करो !’ बोला.

‘मैं अभी कट्टर कहां हुआ !’ मैं उससे बताता हूं. उसने उसे झट से लाइक कर दिया. मैं मन मसोस कर उसके उत्साह को देखता रह गया.

‘अब तो अपनी सुरक्षा की व्यवस्था भी खुद ही करनी पड़ेगी !’ जाते-जाते बोला…

मैं देख रहा हूं, जागने पर जोर कौन दे रहा ! विधान सभा-संसद में जो नेता सोता है वो ! मुझको अंधेरे में रखकर बीमा बेचने वाला परम मित्र ये ! जाग जाऊं पर सही रास्ता कौन बताएगा ? मुझे जगा कर आराम से कौन सोएगा ? अगर मैं वाकई जाग गया तो जगाने वालों के चेहरों जैसा मेरा भी चेहरा चमकदार होगा कि नहीं ? पता नहीं इनको जागने पर क्या दीखता है. मुझे तो जागने पर संडास दीखता है…! और सबसे बड़ी बात जागने के बाद रौशनी तो होगी न !

मैं बाजार में घूम रहा हूं. इधर-उधर नजर घुमा रहा हूं. देखिए, फलां कह रहा कि इसमें इतने प्रतिशत एक्स्ट्रा है. अलां कह रहा कि यह बचत नहीं महाबचत है. आज सीधे-साधे से काम नहीं चलता ! अपने बिकने को लेकर ये प्रोडक्ट भी कट्टर हो गए हैं. पर मैं तो मनुष्य हूं. मैं सोचता हूं. मुझे क्या बेचना है, क्या खरीदना है ! मेरे कट्टर होने से क्या भला होना है ! किसका भला होना है ! अगर होना है तो कैसे भला होना है.

हमने वोट देकर जिनको चुना था, आज वही हमसे कट्टर होने को कह रहा. मैं सोचता हूं, कट्टर हो कर मुझे क्या मिलेगा ? हां मगर पीढ़ी दर पीढ़ी उसकी पार्टी को हमारे घर का वोट उसे जरूर मिलेगा ! अर्थात, कट्टर मतलब पुश्त दर पुश्त वोटर होने की गारंटी…!

घूमते-घूमते मैं केले के ठेले के पास आ गया हूं.

‘कट्टर केले कैसे दिए ?’ उधेड़बुन में मैं उससे पूछता हूं.

‘पचपन रुपये दर्जन !’

‘आएं !!’ दाम तो वाकई कट्टर हैं !’ मैं सोचता हूं और आगे बढ़ लेता हूं.

‘पचास लग जाएंगे !’ वह अपनी कट्टरता कुछ कम करता है. मेरे हिसाब से अभी भी बहुत ज्यादा थी. मैं यह जानता हूं कि दाम की कट्टरता तय करने के पीछे इसका कोई हाथ नहीं. वह भी मेरी ही तरह है ‘कवि कहना चाहता है कि..’ के जैसे हम वहीं रट कर चलने वाले लोग हैं, जिसे हमें रटा दिया जाता है.

‘नहीं नाश्ते में आज गर्व खाऊंगा !’ मैं उससे कहता हूं

‘आज तो खा लेंगे सर ! मगर कल !’ वह हंसता है.

‘आज जो गर्व खाया है. मैं जानता हूं वो पचेगा नहीं. इसको पचाने के लिए मनुष्यता का त्याग करना पड़ता है. इतिहास बदलना होता है. कल उल्टी हो ही जाएगी. नाश्ते की नौबत और तबियत ही नहीं होगी !’

‘मगर परसों सर !’

‘हां मगर परसो क्या !’ मैं सोच में पड़ जाता हूं.

‘परसों तुम्हारा ठेला लूट लूंगा !’ मैं मजाक करता हूं. वह सहम जाता है. मुझे झेंप नहीं गुस्सा आता है. यह मजाक को इतनी गम्भीरता से क्यों ले रहा ! मजाक को सच समझ रहा !

‘मजाक कर रहा हूं !’ मैं स्पष्ट करता हूं. वह इसके बाद एक फीकी मुस्कान देता है. कमबख्त अभी भी सच मान रहा !

कुछ दिन बाद मैं अपने जागे मित्र के घर पहुंचता हूं, जिसे मेजबान आ धमकाना कहते हैं.

काउच पर मेरे लिए सोफ़ा ही है. उस पर बैठते ही मैंने कट्टा निकाल कर उनकी गोद में रख दिया. वह उछल पड़ा, जैसे बचपन में किसी के ऊपर प्लास्टिक का सांप फेंक देते थे.

‘ये क्या है !’ उसने चौंकते हुए पूछा.

‘कट्टा है !’

‘हां वह तो मैं भी देख रहा हूं !’

‘तुमने कहा था कि कट्टर बनो !’

‘तो!’

‘तुमसे ज्यादा कट्टर बन गया हूं, जैसा तुम से कहा था. यह कट्टा तुम्हारे बेटे के लिए लाया हूं !’

‘पागल हो ! कैसे चाचा हो तुम ! कलम की जगह कट्टा दे रहे हो !’ वह गुस्से से बोला. मैं उसके गुस्से को देख रहा था.

‘अपने बेटे को दो, जा के !’ वह फिर बोला.

‘दोस्त, मैं पूरी तरह से जाग चुका हूं. इसलिए उसे पहले ही दे चुका हूं !’

वह एक झटके से उठा. मेरा हाथ पकड़ कर उठाते हुए बोला, ‘तुम्हें आराम की जरूरत है. लगता है तुम कई दिनों से ठीक से सोये नहीं हो ! भरपूर नींद लो जा के !’

मैं जाने लगा तो वह पीछे से टोका, ‘और ये लेते जाओ !’ यह कह कर उसने कट्टा मेरे हाथ में पकड़ा दिया.

सड़क पर आकर मैं हंसा. खूब हंसा.

उसी केले वाले के पास दुबारा पहुंचा. वह मुझे देखकर कुछ घबरा-सा गया.

‘ये क्या है सर !’ वह डरते हुए पूछता है.

‘कट्टा !’ वह जड़ हो गया.

‘अरे, बच्चों का खिलौना है ये !’

इस बात पर वह और डर जाता है. ऐसा क्या गलत बोल दिया मैंने !थोड़ी देर के लिए मैं सोचने लगता हूं.

‘अरे यह प्लास्टिक का खिलौना है ! नकली ! नकली है पूरी तरह !’ मैंने उसे तसल्ली देता हूं.

‘बिल्कुल असली लग रहा था सर !’

‘यही तो दिक्कत है आजकल. लोग नकली को असली समझने लगे हैं !’
वह मुस्कुराता है.

‘केले तो कट्टर है न ?’

‘बहुत ! चखिए तो सर !

‘अभी एक को चखा कर आया हूं !’

‘जी !!!’ वह मुझे गौर से देखता है.

‘कुछ नहीं, तुम नहीं समझोगे !’ मैं हंसता हूं.

‘क्यों नहीं समझेंगे सर ? केले के साथ हमको भी कट्टर समझ रहे हैं क्या ?’

मैं उसे देखता रह जाता हूं. इस बात पर मैं तो आज कट्टर केला खा कर रहूंगा. मैं केला खरीद लेता हूं. मैं केला खाता हूं.’

‘केला कट्टर हो न हो पर मीठा है !’

‘कट्टर मीठा सर…!’ वह बोलता है.

हम दोनों हंस देते हैं…!!

  • अनूप मणि त्रिपाठी

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