Monday, September 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

हिरोशिमा, शिन और ‘क्लाड इथरली’ : एक लहूलुहान चेतना

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 9, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
हिरोशिमा, शिन और 'क्लाड इथरली' : एक लहूलुहान चेतना
हिरोशिमा, शिन और ‘क्लाड इथरली’ : एक लहूलुहान चेतना
मनीष आजाद

हिरोशिमा पर परमाणु बम गिरने के ठीक 4 दिन पहले शिन को उसके तीसरे जन्मदिन पर चटक लाल रंग की तिपहिया साइकिल उसके चाचा ने दी थी. उस समय बच्चों के लिए साइकिल बहुत बड़ी चीज़ थी, क्योंकि उस वक़्त जापान में लगभग सभी उद्योग युद्ध-सामग्री बनाने में लगे हुए थे.

शिन दिन भर साइकिल पर सवार रहता. सोते समय भी वह साइकिल का हत्था पकड़कर ही सोता. 6 अगस्त की सुबह वह रोते हुए उठा. शायद उसने सपने में देखा कि उसकी साइकिल चोरी हो गयी है. बगल में हंसती साइकिल को देखकर वह अचानक चुप होकर मुस्कुराने लगा और तुरन्त साइकिल पर सवार हो गया.

You might also like

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

(Shin’s Tricycle is a children’s book by Tatsuharu Kodama, first published in Japanese in 1992 as Shin-chan no-san rin sha)

सुबह 8 बजकर 15 मिनट पर जब परमाणु बम गिरा तो शिन अपनी तिपहिया साइकिल से एक शरारती तितली का पीछा कर रहा था. बाद में जब मलबे से शिन का शव निकाला गया तो उस वक़्त भी शिन साइकिल के हत्थे को मजबूती से पकड़े हुए था, मानो साइकिल चोरी का डर अभी भी उसे सता रहा हो.

साइकिल के प्रति शिन के इस लगाव को देखते हुए उसके पिता ने जली हुई साइकिल को भी शिन के साथ दफना दिया. कुछ वर्षों बाद शिन के पिता को लगा कि शिन की कहानी दुनिया के सामने आनी चाहिए. उसके बाद उसने कब्र से साइकिल निकाल कर म्यूज़ियम (Hiroshima Peace Memorial Museum) में रखवा दिया. तब दुनिया को शिन के बारे में पता चला.

इसी म्यूज़ियम में शिन की साइकिल के बगल में एक घड़ी भी रखी है, जो ठीक 8 बजकर 15 मिनट पर बन्द हो गयी थी. हमने सुना था कि समय कभी रुकता नहीं, लेकिन 6 अगस्त को 8 बजकर 15 मिनट पर समय वास्तव में रुक गया था. म्यूज़ियम की यह रुकी घड़ी मानो इस जिद में रुकी हो कि जब तक शिन वापस आकर इस घड़ी में चाभी नहीं भरेगा, वह आगे नहीं बढ़ेगी. ठीक शिन की साइकिल की तरह जो अभी भी म्यूज़ियम में उदास खड़ी शिन का इंतज़ार कर रही है.

हिरोशिमा-नागासाकी में तमाम लोग ही नहीं मारे गए, उनसे जुड़ी असंख्य कहानियां भी मारी गयी. यानी शिन के साथ वह तितली भी 1000 डिग्री सेल्शियस में जल कर ‘अमूर्त’ हो गयी, जिसका पीछा शिन कर रहा था. ‘सभ्य’ समाज की ‘सभ्यता’ का इससे अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता है.

क्लाड इथरली

परमाणु बम की प्रचंड ‘आग’ से अमेरिका में भी एक आदमी सालों झुलसता रहा, उसका नाम था- ‘क्लाड इथरली’ (Claude Eatherly). क्लाड इथरली 1945 में उस 90 सदस्यीय टीम का सदस्य था, जिसने हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु बम गिराया था. 6 अगस्त 1945 को क्लाड इथरली ने हिरोशिमा के ऊपर जहाज से मौसम का जायजा लिया और रिपोर्ट भेजी कि मौसम साफ है, बम गिराया जा सकता है. इस रिपोर्ट के मिलने के तुरंत बाद हिरोशिमा पर परमाणु बम गिरा दिया गया. बम गिराने वाले पायलटों ने जब पीछे मुड़कर नीचे की ओर देखा तो उन्हें लगा कि जैसे उन्होंने एक सूरज नीचे गिराया हो, आग का तूफान उठ रहा था. इन पायलटों ने अपनी सर्विस में कई बम गिराए थे, लेकिन यह उन सबसे अलग था.

क्लाड इथरली सहित 90 सदस्यीय इस टीम को बाद में पता चला कि इस आग के तूफान में 70 हजार लोग तुरन्त भस्म हो गए, इनमें वे हजारों मासूम बच्चे भी थे, जिन्हें मांएं धूप से भी बचाने के लिए अपने सीने से लगाये रखती थी. ये बच्चे 1000 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा तापमान में मिनटों में मानो धुआं हो गए. पूरे 3 माह बाद उन्हें पता चला कि जिस बम को गिराने वाली टीम के वे सदस्य थे, वह कोई सामान्य बम नहीं, बल्कि दुनिया का पहला परमाणु बम था.

मिथक में प्रोमेथियस ने जब ईश्वर से आग चुराकर मनुष्य को सौंपी होगी तो उस वक़्त यह कल्पना भी नहीं की होगी कि मनुष्यों में से ही कुछ ताकतवर बर्बर लोग इस आग का दावानल बनाकर इसमें अपने ही जैसे दूसरे मनुष्यों को भून देंगे.

बहरहाल इसके बाद उस टीम के 89 लोगों ने तो अपने आपको सुविधाजनक तर्क से यह समझा लिया कि हमें तो पता ही नहीं था कि यह परमाणु बम है, या कि हम नहीं होते तो कोई और होता. लेकिन क्लाड इथरली अपने को नहीं समझा पाए और वह अपने आपको इस जघन्य अत्याचार का दोषी मानने लगे. उधर क्लाड इथरली को ‘वार हीरो’ का सम्मान मिल रहा था. यह सम्मान उन्हें और बेचैन करने लगा. यह उन पर एक असहनीय बोझ की तरह हो गया.

इस सम्मान के जाल से निकलने के लिए उन्होंने छोटे छोटे अपराध भी किये, छोटी छोटी चोरियां भी की, क्योंकि वे अपने आपको दंड देना चाहते थे. लेकिन हर बार जब कोर्ट में उनकी मंशा उजागर हो जाती थी तो आमतौर से जज केस निरस्त कर देता. उन्होंने कई बार आत्महत्या करने की भी कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए. वे अपनी कमाई का अच्छा-खासा हिस्सा हिरोशिमा के पीड़ितों को भेजने लगे. लेकिन उनकी बेचैनी बढ़ती ही गयी और अंततः पागलपन की स्थिति में ही 1 जुलाई 1978 को उनकी मौत हो गयी. अपने इसी अंतर्द्वंद्व पर उन्होंने एक किताब ‘Burning Conscience’ भी लिखी.

प्रोमेथियस को आग चुराने की सजा उसे ‘अंतहीन यातना’ के रूप में मिली लेकिन आग को दावानल बनाकर लाखों लोगों को मारने वाले बर्बर अमरीकी साम्राज्यवादियों को हम आज तक सजा नहीं दे पाए. पागल तो क्लाड इथरली हुआ लेकिन बर्बर साम्राज्यवादी आज भी नए-नए हिरोशिमा-नागासाकी बनाने की योजना पर बदस्तूर काम कर रहे हैं.

मुक्तिबोध ने क्लाड इथरली पर इसी नाम से ही एक शानदार कहानी लिखी है. इसमे वे लिखते है- ‘जो आदमी अंतरात्मा की आवाज को कभी-कभी सुन लिया करता है, और उसे बयान करके उससे छुट्टी पा लेता है, वह लेखक हो जाता है. जो अन्तरात्मा की आवाज को बहुत ज़्यादा सुनने लगता है और वैसा करने भी लगता है वह समाज विरोधी तत्वों में शामिल हो जाता है. और जो आत्मा की आवाज सुनकर बेचैन हो जाता है और उसी बेचैनी में भीतर के हुक्म का पालन करने लगता है, वह पागल हो जाता है. उसे पागलखाने भेज दिया जाता है.’

अंत में कहानी का मानो सार प्रस्तुत करते हुए मुक्तिबोध लिखते हैं-‘हमारे मन-मस्तिष्क-हृदय में ऐसा ही एक पागलखाना है, जहां हम उन उच्च पवित्र और विद्रोही विचारों और भावों को फेंक देते हैं, जिससे कि धीरे-धीरे या तो वह खुद बदलकर समझौतावादी पोशाक पहनकर सभ्य भद्र हो जाये यानी, दुरुस्त हो जाएं या फिर उसी पागलखाने में पड़े रहें.

हम सबके भीतर एक ‘क्लाड इथरली’ है. हम उसे बाहर लाते हैं या उसे तहखाने के पागलखाने में सड़ने के लिए छोड़ देते है, यह निर्णय पूरी तरह हमारा होता है…!

Read Also –

बिकनी और ‘बिकनी एटोल’ की त्रासदी
अमेरिकी साम्राज्यवाद के निशाने पर परमाणु वैज्ञानिक और महत्वपूर्ण राजनयिक
यूक्रेन युद्ध : अमरीका के नेतृत्व में चलने वाले नाटो को भंग करो 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

जनवादी कवि व लेखक विनोद शंकर के घर पुलिसिया दविश से क्या साबित करना चाह रही है नीतीश सरकार ?

Next Post

विश्व आदिवासी दिवस पर : केरल में अपनी ही जमीन से क्यों बेदखल किए जा रहे हैं आदिवासी ?

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

by ROHIT SHARMA
September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

by ROHIT SHARMA
August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

by ROHIT SHARMA
August 27, 2026
Next Post

विश्व आदिवासी दिवस पर : केरल में अपनी ही जमीन से क्यों बेदखल किए जा रहे हैं आदिवासी ?

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

‘ये क्या जगह है दोस्तों’ : एक युद्धरत संस्कृतिकर्मी की पुकार…

March 12, 2023

द बैटल शिप

September 26, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

August 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बारे में संक्षिप्त जानकारी

August 26, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.