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हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक समझ का प्रसार करें – हिमांशु कुमार

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 26, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
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हिमांशु कुमार

संविधान कहता है कि हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक समझ का प्रसार करे इसलिए मैं आपसे कुछ कुछ बातों पर वैज्ञानिक तरीके से सोचने का आग्रह करता हूं. हमारे सभी भगवान हथियारधारी हैं. वे किनको मारते थे ? कहीं ऐसा तो नहीं मारने वालों को ही हमने भगवान बना लिया ?

आप कहते हैं वे असुरों को मारते थे. मतलब असुर खराब होते थे. ध्यान दीजिये हम पूरे असुर समाज को बुरा कहते हैं. हमारे युद्ध के वर्णनों में लिखा गया है कि हमले से असुर स्त्रियों के गर्भ गिर गये और असुर जल कर चिल्ला कर भागने लगे. इसका मतलब है जिन्हें हम मार रहे थे वे असुर परिवार समेत रहने वाले लोग थे. यानी असुर पूरे के पूरे समुदाय थे.

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उनके गांव थे, उनके परिवार थे, पत्नी बच्चे घर सब थे. यानी वे हमारी तरह के ही लोग थे. हम उन्हें मारते थे. उनका कसूर था कि वे काले होते थे. उनके सींग होते थे. वे ‘हो हो’ करके जोर से हंसते थे. आज भी आदिवासी काले होते हैं, हो हो कर के हंसते हैं, आज भी आप कुछ समुदायों से नफरत करते हैं.

आप दलितों, आदिवासियों, मुसलमानों, ईसाईयों से नफरत करते हैं. उनके साथ खान पान, शादी ब्याह में आपको आज भी आपत्ति है. यानी पूरे के पूरे समुदायों को अपराधी मानना आपके धर्म का शुरू से ही लक्षण है.

आठवीं कक्षा की सामजिक विज्ञान की किताब पढियेगा..उसमें जेनरेलाईजेशन के बारे में एक पाठ है. इसका मतलब है कि यह एक दिमागी कमजोरी होती है कि आप पूरे समुदाय को एक जैसा मानते हैं. उसका जेनेरलाइजेशन कर देते हैं. लेकिन हर समुदाय में तो अलग अलग तरह के लोग होते हैं. लेकिन आप पूरे समुदाय को एक जैसा मानने की गलती कर रहे हैं और यह आपका धर्म सिखा रहा है.

इसलिए आप लापरवाही से कह देते हैं कि अरे इस ज़ात के लोग ऐसे होते हैं या इस धर्म के लोग वैसे होते हैं. जैसे आप असुरों को बुरा कहते हैं, मुसलमान यहूदियों को बुरा कहते हैं. इसका मतलब है अतीत में हमने पूरे के पूरे समुदायों को एक जैसा मानने का अपराध किया. हमने कमज़ोर समुदाय की औरतों, बच्चों को भी मारा और मारने वाले अपने विजेताओं को भगवान मानने लगे.

इस तरह की अवैज्ञानिक सोच ज्यादा दिन चलेगी नहीं. आज नहीं तो कल बच्चे इस सब पर सवाल ज़रूर उठाएंगे. इसलिए इस सब को खुद ही छोड़ दीजिये. याद रखिये धर्म हमेशा वर्तमान में होता है. आज का धर्म है बराबरी और न्याय. अगर आप खुद को महान, बड़ा और सही मान कर दूसरों को नीचा और गलत मानते रहेंगे तो जैसे नई पीढी पुराने अवैज्ञानिक धर्मों को छोड़ रही है, आपका धर्म भी त्याग दिया जाएगा.

विज्ञान और तर्कशीलता अंधविश्वास और अधर्म पर चोट कर रही है. आप फटाफट अधर्म को छोड़ दीजिये और सच्चे धर्म की तरफ आ जाइए. असली धर्म है इंसानियत, वैज्ञानिक समझ और तर्कपूर्ण सोच. यही वैज्ञानिक सोच टिकेगी, बाकी के पुराने सम्प्रदाय लोग छोड़ देंगे. दुनिया में प्रेम शांति और सौन्दर्य लाने का यही रास्ता है.

सनातन धर्म के बारे में सन् 1960 में लिखी आत्मकथा ‘अपनी ख़बर’ में हिन्दी के मशहूर लेखक पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ ने विचार व्यक्त किए थे. वे लिखते हैं –

‘अब से पचास-साठ वर्ष पहले अखिल-भारतीय स्‍तर पर सहस्र-सहस्र ऐसे ब्रह्मराक्षस पैदा हुए थे, जिन्‍होंने कुकर्मों के स्‍लो-पॉयज़न द्वारा मारते-मारते सनातन धर्म को मार ही डाला. इस पूर्णता से कि वह सनातन धर्म तो अब पुन: जागने-जीनेवाला नहीं, जिसके सरग़ना ब्राह्मण लोग थे. ब्राह्मण-कुल में मैं भी पैदा हुआ हूं.

‘कोई पूछ सकता है कि सनातन धर्म या ब्राह्मण धर्म के इस विनाश पर मेरी क्‍या राय है. मेरी क्‍या राय हो सकती है ? मैं कोई व्‍यावसायिक ‘राय’ साहब नहीं. जो वस्‍तु नष्‍ट होने योग्‍य होती है, जिसकी उपयोगिता सर्वथा समाप्‍त हो जाती है, वही नष्‍ट होती है, उसी का अन्त होता है. रहा मेरा ब्राह्मण-कुल में पैदा होना, सो उसे मैं नियति की भूल मानता हूं. जब से पैदा हुआ, तब से आज तक शूद्र-का-शूद्र हूं.’

हिन्दुओं में फैले हुए अंधविश्वासों और कुरीतियों के बारे में लिखो तो तुरंत कुछ लोग आकर कहते हैं कि दम है तो मुसलमानों के बारे में लिख कर दिखाओ. मेरे कुछ मुस्लिम दोस्त मुसलमानों की कुरीतियों के बारे में लिखते हैं तो उन्हें मुसलमान आकर इसी तरह से बुरा भला कहते हैं.

देखिये आपको सिर्फ अपने समुदाय की कमियों और कुरीतियों पर ही बोलने का अधिकार है. दुसरे धर्म या समुदाय के खिलाफ लिखने बोलने का आपको कोई अधिकार नहीं है. हालांकि आपको यही अच्छा लगता है कि आप दुसरे धर्म की बुराई खोजें और उन्हें बुरा भला कहें. इससे आपका झूठा घमंड और ज्यादा फूल जाता है कि देखो मैं कितना महान हूं !

मान लीजिये जब आपके समुदाय का ही व्यक्ति आपके समुदाय की कुरीतियों के बारे में कहता है तो वह आपका सबसे बड़ा दोस्त है. आपके दुश्मन दुसरे धर्म के लोग नहीं है. आपका अज्ञान, गरीबी और पिछड़ापन आपका सबसे बड़ा दुश्मन है. अगर हिन्दू ख़त्म होंगे तो वह गरीबी, अज्ञान और अंधविश्वास की वजह से खत्म होंगे. मुसलमान हिन्दुओं का कुछ नहीं बिगाड़ सकते. मुसलमान डूबेंगे तो अपनी ज़हालत और गरीबी की वजह से. हिन्दू लोग मुसलमानों का कुछ नहीं बिगाड़ सकते.

डार्विन का सिद्धांत है कि दुनिया में वही प्रजातियां बची जिन्होंने बदलते वक्त के साथ अपने को ढाल लिया. जो नहीं बदल पाए वह जीव मिट गये. आप अगर आज के हिसाब से नहीं बदलते तो आप मिट जायेंगे. संसार रोज़ बदल रहा है. आपको बदलना ही पड़ेगा.

आपकी जिद है कि आप और भी ज़्यादा पीछे जाकर पुराना धर्म निकाल कर उस पर चलेंगे. आप पुराने ढंग का खाना, पुराने ढंग के कपडे, पुराने रीति रिवाज़, औरतों की गुलामी और बच्चों को दबा कर रखने की जिद पर अड़े हुए हैं. जो पार्टी आपकी इन मूर्खता से भरी ज़िद का समर्थन करती है, आप उसे सत्ता दे देते हैं. इसलिए आपकी गरीबी, ज़हालत, बीमारी मिट ही नहीं रही है. आपका मजहबी पिछड़ापन आपका दुश्मन बन चूका है.

आपको कुछ कहो तो आपको लगता है कि अगर आपने यह मान लिया कि आपके समुदाय में कोई कमजोरी है तो इससे आपका दुश्मन धर्म जीत जाएगा. हिन्दू सोचता है कि मैं क्यों मानूं कि मुझमें कोई कमी है. मुसलमान सोचता है कि मैं खुद को क्यों गलत मानूं ?इस डर के कारण दोनों अपनी बेवकूफियों की जी जान से हिफाजत कर रहे हैं.

आप इसलिए हिन्दू थोड़े ही हैं क्योंकि हिन्दू धर्म बड़ा महान है. ना ही आप इसलिए मुसलमान हैं क्योंकि इस्लाम सबसे सच्चा धर्म है. बल्कि आप इसलिए हिन्दू या मुसलमान हैं क्योंकि आपके पिता उस धर्म को मानते थे. पिता के धर्म में पड़ जाने के बाद अब आप पूरी ताकत इस अचानक मिले धर्म को सही साबित करने में लगा रहे हैं.

हिन्दू हैं तो सोचिये कि अगर आपके पिता मुसलमान होते तो आप भी मुसलमान नहीं होते क्या ? और अगर आप मुसलमान हैं तो सोचिये कि अगर आपके अब्बा हिन्दू होते तो आप भी हिन्दू नहीं होते क्या ? अपने पिता से मिले धर्म को बड़ा महान कहने वालों की अक्ल पर ज़रा भी भरोसा नहीं किया जा सकता. अब अक्ल की बात यह है कि पिता से मिले धर्म में जो रूढी है, जो बुरी बात है और जो अंधविश्वास है, उसे दूर करो. तब तो आपकी अक्ल का इस्तेमाल होगा. वरना जहां पडदादा, दादा और पिता फंसे रहे वहीं आप भी ज़िन्दगी भर फंसे रहोगे.

लीक लीक गाड़ी चले,
लीकही चले कपूत
लीक छोड़ तीनों चले
सायर, सिंह, सपूत

बैलगाड़ी पुरानी लकीर पर चलती है और नालायक औलाद भी पुरानी लकीर पर चलती है. पुरानी लकीर को छोड़ कर तीन लोग चलते हैं – शायर, शेर और अच्छी औलाद.

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