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Home कविताएं

अल्बर्ट पिंटो

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 13, 2024
in कविताएं
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अल्बर्ट पिंटो बोलता है तो खूब बोलता है
झूठ सच जो बोलना हो बेधड़क बोलता है
झूठ तो कुछ इस सफाई से बोलता है
कि झूठ सच से ज्यादा सच लगता है

संसद या बाहर हल्ला जो हो
जो नहीं बोलना होता है
वह भी बोल जाता है
और कभी कभी तो
सिग्नल तोड़ बिना किसी ब्रेक
प्लेटफार्म के बाहर निकल जाता है

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कौन है श्रेष्ठ ?

बाल बच्चों सहित
माल असबाब के साथ
सवारी को जितनी तकलीफ हो तो हो
इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है

अल्बर्ट संस्कारी भी बहुत है
मजाल कि कभी कोई माफी मांग ले
और व्यक्तिगत दबदबा इतना कि
मजाल कभी कोई पत्रकार
उससे इस आशय कोई सवाल पूछ ले

पता नहीं जो बोलता है
वही बोलता है
या उसके अंदर बैठा
कोई भूत बेताल बोलता है

महुआ दीदी जैसे तैसे
कुछ पूछने की कोशिश तो की थी
लेकिन कहा जा रहा है
कि कानून के लंबे हाथ के सामने
दीदी के हाथ थोड़े छोटे पड़ गये

अल्बर्ट
गधा सा मासूम
घोड़ा सा तेज
खच्चर सा उदार हो न हो
दिखना और दिखाना
अलबत्ता हर वक्त चाहता है

और हमें लगता है इस में
कुछ खराब भी नहीं है
यह उच्चत्तम स्तर
अल्बर्ट ही नहीं
हर कोई हासिल करना चाहता है

एक बात समझ नहीं आती
कि मुस्लिमपरस्त गांधी
और कट्टर कम्युनिस्ट भगत सिंह का नाम
अल्बर्ट पिंटो क्यों लेता रहता है
बाहर गांधी भगत
और अंदर गोलवरकर और गोड्से
एक साथ कैसे साध लेता है
यह मुखसुख पान जो हो
वह दिनरात बहुत चाव से चबाता रहता है

लेकिन इतना तो हुआ है कि
कभी अंदर जो पकता था
इस आबोहवा में अब खुलेआम
बाहर भी पकने लगा है
जो कभी पचता नहीं था
दस साल के इस सतत योगाभ्यास से
अब आराम से पचने लगा है

प्रजातंत्र कुछ ऐसी ही हांडी है
जहां सब को आजादी है
सुपच अपच अपना अपना पकाने की
और अल्बर्ट जो पका रहा है
उसमें क्या खराबी है

अंदर बाहर सामिष निरामिष जो पके
लेकिन कुछ तो ऐसा नायाब है
जो पहले कभी पका नहीं, अब पक रहा है
और यह खुशबू जिस नाक पहुंचे
खूब सराही जा रही है

  • राम प्रसाद यादव

 

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