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गांधी, नेहरू और सुभाष

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 24, 2024
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गांधी, नेहरू और सुभाष
गांधी, नेहरू और सुभाष

श्याम बेनेगल की फिल्म ‘नेताजी द अनफॉरगोटेन हीरो’ में एक दृश्य है. 10 दिसंबर 1942 की सुबह सुभाष बाबू बर्लिन में बैठकर अखबार पढ़ रहे हैं, तभी उनके सहयोगी एसीएन नांबियार वहां आए. सुभाष बाबू ने अखबार बढ़ाते हुए नांबियार से ‘क्विट इंडिया मूवमेंट’ और गांधी जी की गिरफ्तारी की ख़बर सुनाई. बोस ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ का जिक्र करते हुए कहा कि ‘हमें आज ही अपने रेडियो से महात्मा जी की हिमायत में स्टेटमेंट देना होगा.’ नांबियार ने पलटकर पूछा ‘आज अचानक गांधीजी के लिए इतनी हमदर्दी क्यों ?’ सुभाष बोस ने कहा कि ‘बापू से मेरा क्या रिश्ता है ये और कोई नहीं जान सकता. ये सही वक़्त था मेरे वहां रहने का.’

महात्मा गांधी के लिए सुभाष चंद्र बोस के मन में कितना सम्मान था, ये बर्मा से रेडियो प्रसारण में बापू को राष्ट्रपिता संबोधित करके उन्होंने ज़ाहिर किया था लेकिन बर्मा से 22 फरवरी 1944 को कस्तूरबा गांधी के निधन के बाद नेताजी ने रेडियो से जो बयान जारी किया था उससे सुभाष और गांधी के रिश्तों की असली गहराई पता चलती है. नेताजी ने कहा –

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‘कस्तूरबा की मृत्यु पर देश के 38 करोड़ 80 लाख और विदेश में रहने वाले मेरे देशवासियों के गहरे शोक में मैं उनके साथ शामिल हूं. उनकी मौत एक दु::खद परिस्थितियों में हुई है लेकिन एक गुलाम देश के वासी के लिए कोई भी मौत इतनी सम्मानजनक और इतनी गौरवशाली नहीं हो सकती. हिन्दुस्तान को एक निजी क्षति हुई है. इस महान महिला को जो हिन्दुस्तानियों के लिए मां की तरह थी, मैं अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, और इस शोक की घड़ी में मैं गांधीजी के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता हूं.’

गांधीजी के अलावा पंडित नेहरू से भी सुभाष बोस का आत्मीय रिश्ता था. जब पंडित नेहरू अपनी पत्नी कमला नेहरू का इलाज कराने के लिए ऑस्ट्रिया के वियना पहुंचे तो वहां पहले से मौजूद सुभाष बोस और एसीएन नांबियार ने पंडित नेहरू का स्वागत किया. स्विट्जरलैंड को लोजान शहर में जब कमला नेहरू की मौत हुई तो वहां पंडित नेहरू और सुभाष चंद्र बोस दोनों मौजूद थे.

कमला नेहरू के इलाज के साथ-साथ उनके अंतिम संस्कार में भी सुभाष चंद्र बोस नेहरू के साथ खड़े रहे. इस घड़ी में दोनों की दोस्ती और प्रगाढ़ हो गई थी. यही वजह है कि जब सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फौज में ब्रिगेड का गठन किया तो उसमें ‘गांधी ब्रिगेड’ और ‘नेहरू ब्रिगेड’ भी बनाई. 1945 में पंडित नेहरू को जब नेताजी के विमान हादसे की ख़बर मिली थी तो वो पहली बार सबके सामने फूट-फूटकर रोये थे. इससे पहले पंडित नेहरू सार्वजनिक रूप से कभी नहीं रोए.

2016 में नेताजी से जुड़ी हुई गोपनीय फाइलें जब सार्वजनिक की गईं तो उम्मीद थी कि कई सारे साक्ष्य ऐसे बाहर आएंगे जिसमें गांधी और नेहरू से सुभाष के मतभेद और ज़ाहिर होंगे. लेकिन इससे उलट एक बात ये सामने आई कि नेताजी सुभाष की पत्नी एमिली शेंकल और उनकी बेटी अनिता बोस का सबसे ज्यादा ख्याल किसी एक शख्स को था तो वो थे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू.

गोपनीय फाइल में ये खुलासा हुआ कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने 1954 में नेताजी की पुत्री की मदद के लिए एक ट्रस्ट बनाया था, जिसके जरिये अनिता बोस को हर महीने 5 सौ रूपये की आर्थिक मदद दी जाती थी. दस्तावेजों के मुताबिक 23 मई 1954 को अनिता बोस के लिए 2 लाख रूपये का एक ट्रस्ट बनाया गया था, जिसके ट्रस्टी थे प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी रॉय.

ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी ने 1964 तक अनिता बोस को हर साल 6000 रूपये की मदद की जो उनकी शादी तक जारी रही. उस वक्त 500 रूपये महीना कोई छोटी रकम नहीं थी. ये भी कहा जाता है कि पंडित नेहरू जबतक जीवित रहे सुभाष बोस की पत्नी एमिली शेंकल को हर महीने दार्जीलिंग की चायपत्ती अपने खर्चे से भेजते रहे. ज़ाहिर है पंडित नेहरू के मन में सुभाष की दोस्ती आजीवन बनी रही.

क्रांतिकारी भगत सिंह हिन्दुस्तान के लिए पंडित नेहरू और सुभाष चंद्र बोस की अहमियत भली भांति जानते थे. 1928 में जब भगत सिंह की उम्र महज 21 साल थी उन्होंने ‘किरती’ नामक पत्र में नए नेताओं के अलग-अलग विचार नाम से एक लेख लिखा था. इस लेख में भगत सिंह ने लिखा था कि ‘सुभाष परिवर्तनकारी हैं जबकि नेहरू युगांतरकारी.’ फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले जब भगत सिंह के वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे तो भगत सिंह ने कहा था कि ‘वे पंडित नेहरू और सुभाष बोस को मेरा धन्यवाद पहुंचा दे जिन्होंने मेरे केस में गहरी रूचि ली थी.’

देश के राष्ट्रनिर्माताओं की भूमिका को अलग-अलग देखने की बजाए, आज जरूरत उनकी सामूहिक भूमिका को देखने की भी है. नेताजी के बगैर गांधी और नेहरू दोनों अधूरे लगेंगे. अगर हमने अपने राष्ट्रनिर्माताओं की एकल भूमिका लिखनी शुरू कर दी तो हम कभी भारतीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास नहीं लिख पाएंगे.

  • राजेश कुमार

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