Monday, June 8, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

प्राचीन भारत के आधुनिक प्रारंभिक भारतीय इतिहासकार

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 16, 2024
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

हिंदुत्ववादी लोग आरोप लगाते हैं कि भारत का इतिहास वामपंथियों ने लिखा है इसलिए भारत का इतिहास फिर से लिखा जाना चाहिए. क्योंकि वामपंथियों ने भारत के हिन्दू शासकों का उपेक्षा किया है, उन्हें इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान नहीं दिया है. लेकिन हिंदुत्ववादियों के इस बात में कोई सच्चाई नही है. अगर हम प्राचीन भारत के इतिहास लेखन को देखते है तो पाते हैं कि जितने भी हमारे प्रारंभिक भारतीय इतिहासकार हुए है, उन में से कोई भी वामपंथी नहीं था.

जैसे, राजेन्द्र लाल मित्र (1822-1891), रामकृष्ण गोपाल भंडारकर (1837-1925), विश्वनाथ काशीनाथ राजवाडे (1869-1926), पांडुरंग वामन काणे (1880-1972), देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर (1875-1950), हेमचंद्र राय चौधरी(1892-1957), आर.सी. मजूमदार (1888-1980), नीलकंठ शास्त्री (1892-1975), काशी प्रसाद जायसवाल (1881-1937), ए.एस.अलेतकर (1898-1959), यू.एन.घोषाल (1886-1969).

You might also like

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

ये सब राष्ट्रवादी इतिहासकार माने जाते हैं. इन्होंने साम्राज्यवादी इतिहासकारों के विरोध में इतिहास लेखन शुरू किया. साम्राज्यवादी इतिहासकारों ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर कई बड़े हमले किए थे, जो निम्नलिखित है –

  1. भारतीयों को इतिहास बोध नहीं था (विशेषकर काल और तिथिक्रम का).
  2. भारतीय हमेशा निरंकुश शासन के अधीन रहने के आदी हैं.
  3. भारत में हमेशा आक्रमणकारी ही शासक रहे हैं.
  4. भारतीय आध्यात्म और परलोक के चिंता में ही खोय रहते हैं. इसलिए वे इस लायक नहीं है कि अपने भौतिक जगत की देखभाल कर सके. इसलिए अंग्रेजों का भारत में रहना जरूरी है.
  5. अंग्रेजों से पहले भारत ने कभी राजनीतिक एकता का अनुभव नहीं किया था और वे स्वशासन के योग्य नहीं है.

इन सारी बातो को विन्सेन्ट आर्थर स्मिथ (1843-1920) ने अपनी पुस्तक ‘अर्ली हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया’ में स्थापित किया, जो प्राचीन भारत पर इतिहास की पहली सुव्यवस्थित पुस्तक माना जाता है, जिसे स्मिथ ने उस समय के उपलब्ध स्रोतों के आधार पर 1904 में लिखा था. इसके बाद यही किताब 50 सालों तक कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढाया जाता रहा.

यही वो किताब है जिस में पहली बार भारतीय इतिहास को हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई (अंग्रेज) शासन के आधार पर तीन कालों में बांटा गया. वैदिक युग से लेकर हर्षवर्धन तक के काल के भारत को हिन्दू शासकों का काल कहा गया. इसके बाद दिल्ली सल्तनत से ले कर मुगलों के शासन तक के भारत को मुस्लिम शासकों का काल कहा गया. और इसके बाद के भारत को अंग्रेज शासकों का काल कहा गया. बाद के साम्राज्यवादी इतिहासकारों ने भी इसी मार्ग का अनुसरण किया. इन सब बातों के पीछे अंग्रेज़ों का उद्देश्य अपने शासन को वैध और न्यायसंगत ठहराना था. हिंदुत्ववादी आज भी भारतीय इतिहास के इस साम्प्रदायिक काल विभाजन को ही मानते हैं.

इन सवालों के जवाब में राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने अपना इतिहास लेखन शुरू किया, जिस में से यहां कुछ का जिक्र करना जरूरी है. ये वो दौर था जब भारत में हिन्दू नवजागरण की हवा भी बह रहा था, जिसके प्रभाव में कई इतिहासकार भी बह गए.

लेकिन कुछ ऐसे भी इतिहासकार थे, जिन्होंने तथ्यों से समझौता नहीं किया, उनमें प्रमुख नाम है राजेन्द्र लाल मित्र का, जिन्होंने डी. एन. झा से बहुत पहले ही अपनी किताब ‘इंडो आर्यन’ में बता दिया कि प्राचीन भारत के लोग गाय का मांस खाते थे. वैसे राजेन्द लाल मित्र खुद प्राचीन परम्परा के प्रेमी थे और उन्होंने खुद कई मूल वैदिक ग्रंथों को प्रकाशित कराया था.

इसमें हम महाराष्ट्र के विश्वनाथ काशीनाथ राजवाडे का नाम भी ले सकते हैं, जो इस देश के सबसे बड़े शोधार्थी माने जाते हैं. वे संस्कृत की पांडुलिपियों और मराठा इतिहास के स्त्रोतों के खोज में महाराष्ट्र के गांव-गांव में घुमे. उपलब्ध स्रोतों को उन्होनें 22 खण्डों में प्रकाशित कराया.

उन्होनें मराठी में ‘भारतीय विवाह संस्था’ नामक किताब 1926 में लिखा, जो एक क्लासिक रचना मानी जाती है. इसे पढ़ते हुए एंगेल्स के पुस्तक परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पति की याद आने लगती है. उन्होंने इस पुस्तक को हिन्दू धर्म के नैतिकता के दबाव में आए बिना पूरा किया, जिसे प्रकाशित होने के बाद हिन्दुवादी संगठनों का विरोध झेलना पड़ा था.

इसी कड़ी में हम के.पी. जायसवाल को ले सकते हैं, जिन्होंने गहन शोध करके बताया कि प्राचीन भारत में गणराज्यों का अस्तित्व था, जो एक चुनी हुई परिषद द्वारा अपना शासन चलाते थे. अपनी इन सब बातों को उन्होंने 1924 में लिखी पुस्तक ‘हिन्दू पॉलिटी’ में स्थापित किया और भारतीय तानाशाही की अवधारणा का हमेशा के लिए खंडन कर दिया.

इसमें हम रामकृष्ण गोपाल भंडारकर का नाम भी ले सकते हैं, जो इतिहासकार के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे, जिन्होंने जाति प्रथा और बाल विवाह का विरोध किया और सातवाहनों के इतिहास का पुनर्निर्माण किया. ऐसे ही पांडुरंग वामन काणे ने पांच खण्डों में हिस्ट्री ऑफ़ धर्मशास्र का संपादन किया, जिससे हम प्राचीन भारत के रीति-रिवाजों को जान सकते हैं.

हेमचंद्र राय चौधरी ने दसवीं शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर छठवी शताब्दी ईसवी तक का भारत का राजनीतिक इतिहास लिखा. नीलकंठ शास्त्री ने उत्तर भारत और दक्षिण भारत दोनों का राजनीतिक इतिहास लिखा.

इन सब राष्ट्रवादी इतिहासकारों के लेखन के केंद्र में भारत का राजनीतिक इतिहास और राज्यव्यवस्था था इसलिए इनके इतिहास लेखन की अपनी सीमाएं और कई सारी कमियां है. फिर भी इन्होंने भारतीय इतिहास का पुनर्निर्माण करके ये बता दिया कि भारतीय के पास इतिहास बोध था और वे स्वशासन चलाने में दक्ष थे.

अंग्रेजी शासन से पहले भी कम से कम दो बार भारत राजनीतिक रूप से एक रहा था. पहले मौर्य शासनकाल के समय में, फिर गुप्तों के शासनकाल में. लेकिन हिन्दुत्ववादियों को तो इनके इतिहास लेखन से भी कोई मतलब नही हैं क्योंकि उन्हें इतिहास नहीं पुराण लिखना है, जो तथ्य पर नही कल्पना पर आधारित होगा. इसलिए वो फिर से इतिहास लेखन की बात कर रहे हैं.

वैसे इतिहास तो हमेशा लिखा जाता रहेगा और इस में कुछ गलत नहीं हैं लेकिन इतिहास को बिना तथ्यों के लिखना और उसमें अपने राजनीतिक फायदे के लिए काल्पनिक बाते जोड़ देना गलत है और हिंदुत्ववादी इतिहास लेखन के नाम पर यही कर रहे हैं.

  • विनोद शंकर

Read Also –

 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

किसान इस देश के अन्नदाता है या देश के अर्थव्यवस्था का दुश्मन ?

Next Post

कृषि उपज और आवश्यक वस्तुओं का ‘सम्पूर्ण राज्य व्यापार’ (ऑल आउट स्टेट ट्रेडिंग) लागू करो

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

by ROHIT SHARMA
June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

by ROHIT SHARMA
May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

by ROHIT SHARMA
May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

कृषि उपज और आवश्यक वस्तुओं का 'सम्पूर्ण राज्य व्यापार' (ऑल आउट स्टेट ट्रेडिंग) लागू करो

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

क्षुद्र और अवसरवादी सरकारें सांप्रदायिकता और जातीय वैमनस्य द्वारा सड़ांध भारत बना रही है

June 7, 2022

13 दिसम्बर, 2023 को भगत सिंह लौट आये ?

December 13, 2023

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026
Uncategorized

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.