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असांजे का साहस दुनिया के किस काम आया

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 4, 2024
in गेस्ट ब्लॉग
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असांजे का साहस दुनिया के किस काम आया
असांजे का साहस दुनिया के किस काम आया
चन्द्रभूषण

विकीलीक्स के संस्थापक-संपादक जूलियन असांज की रिहाई के साथ राजकाज में पारदर्शिता की मांग की एक लंबी लड़ाई का पटाक्षेप हो गया. ऐसे तो कई देशों के, लेकिन खास तौर पर अमेरिका के बहुत सारे सरकारी रहस्यों के पर्दाफाश में अहम भूमिका निभाने वाले इस ऑस्ट्रेलियाई हैकर को कुल बारह साल और उसके पहले दो साल गुप्त जीवन को भी जोड़ लें तो चौदह साल दुनिया से अलग-थलग रहकर बिताने पड़े. सात साल लंदन स्थित इक्वाडोर के दूतावास में, फिर पांच साल ब्रिटेन की एक जेल में.

ये रहस्य असांज ने जासूसी करके नहीं निकाले थे. उनका दोष सिर्फ ऊंचे सरकारी ओहदों पर बैठे लोगों की बातचीत और उनके ऑडियो-वीडियो आदान-प्रदान को खुले में ला देने का था. यह रिहाई भी उन्हें खुद को अमेरिका के जासूसी कानून के उल्लंघन का दोषी मान लेने के बाद जमानत की शक्ल में हासिल हुई है. इस तकनीकी आधार पर कि उनका अपराध उन्हें पांच साल से ज्यादा की सजा का हकदार नहीं बनाता, जो वे पहले ही भुगत चुके हैं.

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जूलियन असांज ने सरकारी दस्तावेजों के खुलासे के लिए एक ग्लोबल प्लैटफॉर्म के रूप में 2006 में विकीलीक्स की स्थापना की. तब से लेकर 2012 में इक्वाडोर के दूतावास में एक किस्म की नजरबंदी में जाने के पहले उन्होंने जो किया, उसके बारे में बात करने से पहले हमें उस हड़बड़ी को याद करना चाहिए जो उस वक्त अमेरिका, ब्रिटेन और स्वीडन की ताकतवर ‘लोकतांत्रिक’ सरकारों में दिखाई पड़ रही थी. असांज को कहीं से भी किसी शर्त पर पकड़वा लेने की कोशिश में उनपर स्वीडन में यौन उत्पीड़न का एक मुकदमा दायर किया गया.

इस मामले में सबसे विचित्र बात थी मुकदमा दायर करने वाली महिला का यह बयान कि यौन संसर्ग शुरू होने से पहले उन्होंने इसकी स्वीकृति दी थी लेकिन यौनक्रिया के बीच में ही स्वीकृति वापस ले ली, लिहाजा उत्पीड़न तो हुआ. असांज ने इसे सरकारी रहस्यों के लीक के लिए किसी भी शर्त पर उन्हें गिरफ्तार कर लेने का बहाना बताया, लेकिन अपनी इस बात से अपने पक्ष में वे ऐसा जनमत नहीं बना सके, जो ब्रिटिश हुकूमत को उनकी धर-पकड़ करने से रोक पाता.

गनीमत रही कि उस समय इक्वाडोर के दूतावास ने असांज को अपने यहां शरण दे दी और अगले सात साल उन्होंने दूतावास की चहारदीवारी के बीच ही बिताए. 2019 में ब्रिटेन की पुलिस उन्हें दूतावास से जेल ले जाने में सफल हुई, लेकिन इसके साथ ही अमेरिका ने ब्रिटेन पर असांज के प्रत्यावर्तन के लिए दबाव बनाया तो एक ब्रिटिश अदालत ने लगातार तनाव और दबाव से बिगड़ी हुई उनकी मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए अपनी सरकार को ऐसा करने की इजाजत नहीं दी.

इक्कीसवीं सदी का यह भी एक कमाल ही कहा जाएगा कि अपने हुनर का माहिर एक सामान्य व्यक्ति पैसे कमाने के लिए नहीं, किसी चोरी-चकारी के लिए नहीं, अपनी समझ से एक नैतिक काम करने के लिए, जनता के पैसों पर पलने वाली सरकारों का कच्चा-चिट्ठा उजागर करने के लिए इतनी दूर तक चला आया और जानलेवा खतरों के बावजूद अपनी गलती के लिए कान पकड़कर गिड़गिड़ाने का रास्ता भी नहीं अपनाया.

ऐसे तो विकीलीक्स पर कई सरकारों के छोटे-बड़े रहस्य उजागर हुए और इस साइट से इसके मुख्य संचालक जूलियन असांज के 12 साल दूर रहने के बावजूद आज भी यह ठप नहीं हुई है, लेकिन इसकी कोशिशों से सबसे ज्यादा मिर्ची अमेरिका को लगी, क्योंकि 2010, 2011 और फिर 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में सामने आए उसके पांच लाख के आसपास दस्तावेजों में से कई ने कुछेक बड़े अमेरिकी अफसरों और नेताओं की मिट्टी पलीद कर दी.

अफगानिस्तान में तैनात एक अमेरिकी जनरल ने उस समय उपराष्ट्रपति रहे मौजूदा राष्ट्रपति जोसफ बाइडन को कहीं अचके में एक बड़ी गंदी गाली दी थी, जिसका जिक्र किसी और अफसर ने अपने ईमेल में किसी हमजोली को कर दिया था. नतीजा यह कि जनरल को तो जाना ही पड़ा, बाइडन को भी ‘छवि सुधार परियोजना’ चलानी पड़ गई.

अमेरिका के लिए भारी शर्मिंदगी का बायस वह वीडियो बना, जिसमें एक फौजी अपाची हेलिकॉप्टर ने इराक में गोलीबारी करके ग्यारह आम लोगों को मार गिराया था, जिनमें समाचार एजेंसी रायटर्स के दो पत्रकार भी शामिल थे. इसके लिए अमेरिकी फौज ने अदालत में जूलियन असांज को दुश्मन का एजेंट साबित करने की कोशिश की लेकिन इसके लिए सबूत नहीं जुटा पाई.

इस खुलासे का नुकसान यह हुआ कि सद्दाम को मृत्युदंड दिए जाने के बाद इराक में बनी शिया हुकूमत अमेरिका के बुरी तरह खिलाफ हो गई और ईरान से उसकी नजदीकी बढ़ती गई. उसे काबू में रखने के लिए बराक ओबामा की सरकार ने आइसिस नाम के कट्टरपंथी संगठन की पीठ ठोक दी. जल्द ही उसका फैलाव भस्मासुर की तरह होने लगा लेकिन उसकी कत्लोगारत के बावजूद अमेरिका से कुछ करते नहीं बन रहा था.

विकीलीक्स की एक बड़ी शिकार हिलेरी क्लिंटन भी बनीं, जिनकी उम्मीदवारी 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में बहुत गंभीर मानी जा रही थी. लेकिन अपने चुनाव अधिकारियों के साथ उनकी कुछ खतोकिताबत इतनी संवेदनशील निकली कि अमेरिका का डेमोक्रेट जनमत उनके खिलाफ भले न हुआ, उसका उत्साह जाता रहा और डॉनल्ड ट्रंप के खिलाफ हिलेरी चुनाव हार गईं.

भारत में विकीलीक्स का कोई बड़ा धमाका तो नहीं हुआ लेकिन राहुल गांधी ने अपने चुनाव क्षेत्र अमेठी के दौरे पर गए ब्रिटिश राजदूत से देश में हिंदूवादी राजनीति को लेकर कोई बात कही- शायद यह कि बहुसंख्यकवादी कट्टरपंथ यहां अल्पसंख्यक कट्टरपंथ की तुलना में कहीं ज्यादा खतरनाक है- जो फिर अमेरिकी राजदूत तक पहुंची और उनकी ईमेल लीक हो गई.

किसी को लग सकता है कि ये सारे मामले लोकतांत्रिक राजनीति के अपेक्षाकृत उदार धड़े के ही खिलाफ गए, लेकिन इसके पीछे अकेली वजह थी कि उस दौर में ज्यादातर इसी मिजाज की सरकारें दुनिया में थी. इसके थोड़े ही समय बाद चक्का घूम गया, अनुदार सरकारों का दौर चल पड़ा तो इसमें 2010-12 के जमीनी आंदोलनों के अलावा कुछ भूमिका इन लीक्स की भी थी.

यहां विकीलीक्स की लाई उथल-पुथल के पीछे जूलियन असांज के अलावा जिस एक व्यक्ति की भूमिका खास तौर पर रेखांकित की जानी चाहिए, वे हैं अमेरिका की सैन्य गुप्तचर सेवा से जुड़ी चेल्सी मैनिंग, जो अमेरिकी दस्तावेजों को हैक करके विकीलीक्स पर डालने के वक्त ब्रैडली एडवर्ड मैनिंग नाम का पुरुष हुआ करती थी.

उनकी एक बड़ी तकलीफदेह निजी कहानी है लेकिन उन्होंने जान जोखिम में डालकर अपना काम किया और अपने एक दोस्त की भेदियागिरी से पकड़ी गईं. उन्हें तो शायद 35 साल जेल में बिताने पड़ते लेकिन बराक ओबामा ने बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति अपने आखिरी दिन यही काम किया कि उनकी सजा माफ कर दी.

जनवरी 2017 में अपनी रिहाई के बाद चेल्सी मैनिंग के खिलाफ फिर-फिर मामले खुलते रहे और 2019 से शुरू करके 2022 तक कुछ-कुछ समय उन्हें जेल में बिताना पड़ा. जैसा ऊपर कहा जा चुका है, असांज और मैनिंग जैसे लोग पारदर्शी राजकाज की इच्छा के ही प्रतिनिधि हैं. सरकारों को उनपर गरजने-बरसने के बजाय जब-तब अपने गिरेबान में झांककर देख लेना चाहिए.

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