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कानूनों से खतरनाक खिलवाड़…दमन का खजाना है यह अन्याय संहिता

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 17, 2024
in गेस्ट ब्लॉग
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कानूनों से खतरनाक खिलवाड़...दमन का खजाना है यह अन्याय संहिता
कानूनों से खतरनाक खिलवाड़…दमन का खजाना है यह अन्याय संहिता

अजीत भारती नाम के भक्त को राहुल गांधी के खिलाफ अफवाह फैलाने के लिए कर्नाटक में केस हुआ. यह कांग्रेस सरकार ने किया है. इसके पहले श्याम मीरा सिंह पर असम में केस हुआ था. यह भाजपा सरकार ने किया. अभी लेखक अरुंधति रॉय पर 12-14 साल पहले के किसी बयान पर UAPA लगाने की बात चल रही है.

PMLA कानून तो किसी से कुछ भी बयान लेकर, बड़े बड़े लोगों को जेल डालने के कुख्यात हो ही चुका है. पर इन सबका बाप, भारतीय न्याय संहिता, 15 दिन में लागू होने को है. जिसके कण कण में UAPA, TADA, PMLA रचा बसा है.

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न्याय संहिता में पुलिस को इतने अधिकार है, कि जब जिसे चाहे, मिनटों में फ्रेम करके गिरफ्तार कर सकती है. गिरफ्तारी आयरन क्लैड है, और जमानत को, यदि पुलिस न चाहे, तो एकदम अलभ्य कर दिया है. याने कोर्ट भी, पुलिस के सामने अशक्त है.

आजाद समाज का बेसिक फलसफा, राइट टू फ्रीडम है. याने पुराने जमाने के राजा की तरह सरकार जिसे मन आये, काल कोठरी में बन्द नहीं करवा सकती. ऐसा करने का उचित कारण हो, और वह कानून में डिफाइन हो. फिर कानून, अभियुक्त को बचाव का पूरा मौका दे. 100 गुनहगार छूट जाए, एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए.

जमानत नॉर्म होना चाहिए, जेल एक्सेप्शन. अपराध, क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को साबित करना है, न कि आरोपी को अपनी निर्दोषता साबित करनी है. जब तक अपराध, बियॉन्ड रीजनेबल डाउट, सिद्ध न हो, सजा नहीं होनी चाहिए. लेकिन मौजूदा दौर में, निचली अदालतों ने बेल देना लगभग बन्द कर दिया है. हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ‘बेल पर’ फैसले दे रही हैं.

इंतजार में हवालात, या पुलिस कस्टडी में 50-60 दिन गुजारने वाले शख्स को मिली जमानत भी बेकार है. बिना दोषसिद्धि के सजा है. नई न्याय संहिता, इन एबरेशन को नार्म बनाती है. इसमें आतंकवाद की परिभाषा में जोड़े गए प्रावधान- सड़क पर एक मामूली प्रदर्शन, वहां लगाए नारे, किसी धरने को भी आतंकवाद के दायरे में रखने की सुविधा देते हैं.

वो पुलिस को यह अधिकार देते हैं कि ‘उचित न समझे’ तो केस की सूचना पर रिपोर्ट दर्ज न करे. याने न्याय के लिए आप थाने की आशा छोड़ दीजिए. हां, पहले भी यह चोरी-छुपे होता था, पर अब अधिकार में है. आगे, पुलिस को गिरफ्तारी के बाद 24 घण्टे में कोर्ट में पेश करने की जरूरत नहीं.

डॉक्टरी मुलाहिजे की जरूरत नहीं. 7 दिन बाद वह एसडीएम से रिमांड बढ़वा सकता है. असल कोर्ट तो 14 दिन में पेश करे. बिना चार्जशीट के 6 माह तक हवालात एक्सटेंन की जा सकती है. दमन का खजाना है यह अन्याय संहिता.

देशभक्त खुश होंगे. अब आएगा मजा. चमचों को जमकर पकड़ा जाएगा, उल्टा लटकाकर पीटेंगे. गद्दारों की खाल में भूसा भरा जायेगा. यस, श्योर. लेकिन याद रखें, ये पावर्स पुलिस को है. याने उन जगहों की पुलिस को भी जहां भाजपा की सरकार नहीं है और आज की डेट में आधे देश में नहीं है. इधर वाले, उधर वालों की जिंदगियां तबाह करेंगे, उधर वाले इधर की. सुरक्षित कोई नहीं.

ये कानून, क़ानून व्यवस्था की बेहतरी के लिए नहीं बने. राजनीतिक वजहों से बने हैं. विपक्ष की आवाज बन्द करने, और आम नागरिक को टेरराइज करने को बने हैं. बात व्यवस्था की है, तो कानून व्यवस्था और शांति के लिए, अंग्रेजों की बनाई व्यवस्था से बढ़िया कुछ नहीं.

क्योंकि वह हमारे बीच 150 साल पुरानी हो चुकी. वह बार बार मांज कर, चमका कर, कतरब्योंत और सुधार के लंबे कालक्रम से गुजर चुकी है. अंग्रेजों की नहीं, यह हमारी व्यवस्था हो चुकी है. आजाद हिंदुस्तान की 15 संसदों, सरकारों, और हजारों जजों ने लाखों मामलों के फैसलों से, हर सिचुएशन के लिए एक गाइडलाइन बना दी है. इस कानून को सब लोग समझते हैं, स्वीकार करते हैं, फॉलो करते हैं. वकील, पुलिस, अदालतें, समझती हैं.

तो IPC हमारे शरीर मे फिट, और शरीर कानून में फिट हो चुका है. टेलर फिट. अब नए चोले को फिर उतना ही समय लगेगा, परफेक्ट, टेलर फिट होने में. यदि इसका आधा ही समय लगा, या चलो, कि चौथाई या दसवां हिस्सा ही लगा परफेक्ट होने, सेट होने में- तो भी.. पहले 20 साल तो आम लोगों, वकीलों, कोर्ट्स को इससे जूझते, रास्ते और राहतें खोजते लग गए न..

और यह बड़ा वीभत्स दौर होने वाला है. राजनीतिक कटुता, और शुचिता के अभाव में कानूनन बेलगाम पुलिस, किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के कन्ट्रोल में नहीं रहेगी, लिख लीजिए. वह दोनों तरफ को दबाएगी. ताक कर रखेगी, इसकी सरकार में उसको, उसकी सरकार में इसको निपटायेगी.

यह पुलिस राज, व्यवस्था में अंसतोष और विद्रोह को जन्म देगा. और सरकारों को इसका नजला भुगतना पड़ेगा. और फाइनली लोकतन्त्र को गहरा डेंट लगेगा. कानूनों से खिलवाड़ बन्द हो. न्याय संहिता का इमिडीएट रिवीजन होना चाहिए.

  • मनीष सिंह

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