Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

Karnataka State Shops and Establishments Act : यानी काम के 14 घंटे !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 24, 2024
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
Karnataka State Shops and Establishments Act : यानी काम के 14 घंटे !
Karnataka State Shops and Establishments Act : यानी काम के 14 घंटे !
Subrato Chatterjeeसुब्रतो चटर्जी

कर्नाटक सरकार आईटी लॉबी से घूस खाकर उनके एक प्रस्ताव पर विचार कर रही है, जिसके अनुसार आईटी सेक्टर में काम करने के समय को 10 घंटे से बढ़ा कर 14 घंटे करने का प्रावधान है. ज़ाहिर है कि एक बार इसे अगर Karnataka State Shops and Establishments Act में ला दिया गया तो इसका प्रभाव हरेक सेक्टर में पड़ेगा. राहुल गांधी की कॉरपोरेट विरोधी स्टैंड की असलियत यही है.

ख़ैर, बड़ा सवाल ये है कि कर्नाटक सरकार को ऐसे अमानवीय और श्रम विरोधी प्रस्ताव पर विचार करने की हिम्मत कहां से आई ?दरअसल, नव उदारवादी अर्थव्यवस्था का मतलब ही कॉरपोरेटपरस्त नीतियों को लागू कर मज़दूरों के हितों पर चोट पहुंचाना है. इसकी शुरुआत International Labour Law द्वारा पारित 8 घंटे के कार्य दिवस को पलीता लगाने से हुई.

You might also like

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

कहने को तो भारत भी इस क़ानून का signatory है, लेकिन भारत में 95% रोज़गार देने वाले असंगठित क्षेत्र में यह कभी लागू ही नहीं हुआ. अब इजारेदारों की नज़र संगठित क्षेत्र के कामगारों पर है. दरअसल कोई blue collard or white collared job नहीं होता है. नौकर नौकर होता है और मालिक मालिक होता है.

जिस तरह से निजी बैंकों में 1 लाख की तनख़्वाह वाले ब्रांच मैनेजर को vice president कह कर उसे false pride दिया जाता है, उसी तरह से air conditioned office में बैठे आईटी लेबर को भी special treatment पाने वाले की कैटेगरी में लाया जाता है. यह अलग बात है कि air condition कंप्यूटर की रक्षा के लिए लगाया जाता है, न कि इम्प्लाइस की सुविधा के लिए.

अब लौटते हैं मूल प्रश्न पर. 90 के दशक से भारत में ट्रेड यूनियन मूवमेंट का कमज़ोर पड़ना इस तरह की शोषण आधारित स्वेच्छाचारी क़ानूनों को आगे बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार है.

पहले, सफ़ेद कॉलर और नीले कॉलर के बीच विभाजन पैदा कर श्रमिकों को एक नई वर्ग व्यवस्था में बांटा गया. नतीजतन, ज़्यादा सैलरी और सुविधा पाने वाले मजदूर अपने से कम सैलरी या दिहाड़ी पाने वाले मज़दूरों से अपने को श्रेष्ठ मानने लगे. इस तरह से एक नया मध्यम वर्ग आकार लेता गया जिसकी प्राथमिकता उसी पूंजीवादी, शोषण आधारित व्यवस्था को बचाए रखना था, जो उसके सुख सुविधाओं का बेहतर ख़याल रखता था.

इस प्रपंच को आगे बढ़ाने के लिए दुनिया भर की सरकारें गृह और कार लोन पर ब्याज की कटौती कर इस मध्यम वर्ग को हरेक छोटे बड़े शहर में कुकुरमुत्ता की तरह उगे सोसायटी में क़ैद कर दिया. उसके बाद का काम आसान था. समाज और जनता के मुद्दों से कटे यह परजीवी वर्ग विरोध की आवाज़ उठाने में सर्वथा अशक्त था.

इनके पास कोई ट्रेड यूनियन भी नहीं था. कर्मचारी संघ निजी क्षेत्रों में दुनिया में कहीं भी नहीं है. नतीजतन, इनकी सरकार के ग़ैरक़ानूनी फ़ैसलों के विरोध करने की शक्ति लगभग शून्य है. अब अंतरराष्ट्रीय पूंजीवादी ताक़तों के सामने मैदान साफ़ था. अब उनके पास इस नपुंसक, आत्मघाती वर्ग से 14 घंटे काम लेकर उनको असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों की श्रेणी में लाना बहुत आसान काम था.

आज भी जिन लोगों को लगता है कि ट्रेड यूनियन औद्योगिक विकास के रास्ते में बाधा है, वे इस नारकीय जीवन को जीने के लिए तैयार रहें और भाजपा कांग्रेस को बारी बारी से वोट देते रहें. सच तो यह है कि आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था राजतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए कटिबद्ध है. इसके विरुद्ध लड़ाई संगठित होकर ही लड़ी जा सकती है. कलियुगे संघे शक्ति ! पूंजीपति संगठित हैं और जनता असंगठित. अब आप कम्युनिस्ट लोगों को गाली देने के लिए स्वतंत्र हैं, क्योंकि आपके जैसे ग़ुलामों को इससे ज़्यादा अक़्ल नहीं है.

Read Also –

श्रम के 12 घंटे, मजदूरों की ‘चेतना’ और अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की नौटंकी
मई दिवस : हे मार्केट के शहीदों का खून
अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस : ऐतिहासिक जीत का जश्न

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
G-Pay
G-Pay
Previous Post

सेलेक्टिव लेखन और पक्षधरता में बहुत बड़ा अंतर है

Next Post

विश्वविद्यालयों में प्रतिभाओं की, गुणवत्ता की खुल्लमखुल्ला संस्थानिक हत्या होती है!

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

विश्वविद्यालयों में प्रतिभाओं की, गुणवत्ता की खुल्लमखुल्ला संस्थानिक हत्या होती है!

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

बुद्धिलाल पाल की दो कविताएं

December 28, 2022

“मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको”

October 23, 2018

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.