Monday, September 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

पुलिस कब सुधरेगी, यह कोई आरोप नहीं है, टिप्पणी है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 27, 2024
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
पुलिस कब सुधरेगी, यह कोई आरोप नहीं है, टिप्पणी है
पुलिस कब सुधरेगी, यह कोई आरोप नहीं है, टिप्पणी है
विष्णु नागर

अभी इसी हफ्ते एक अखबार की मुख्य खबर का 72 पाइंट में हेडिंग था- ‘कब सुधरेगी पुलिस ?’ हेडिंग क्या था, भरा-पूरा, हृष्ट-पुष्ट सवाल था. बहुत ही मौजूं सवाल था और उसकी बहुत ही मौजूं हेडिंग थी ! मैं वाह-वाह कर उठा. काश पत्रकारिता में होते हुए मैं कभी इतना बढ़िया हेडिंग दे पाता !

वैसे जब कोई लोकप्रिय अखबार इतना महत्वपूर्ण सवाल करे तो उसे गंभीरता से लेना चाहिए और गंभीरता से उसका जवाब देना चाहिए. मगर यहां गंभीर है कौन ? जिसे गंभीर होना चाहिए, वह खुद सबसे बड़ा मसखरा है. खैर छोड़ो‌ उसे. अभी-अभी वह बेचारा यूक्रेन और रूस के बीच ‘युद्ध रुकवा’ कर आया है ! थका होगा. मसखरे हर तरह का काम कर लेते हैं, जिसमें युद्ध रुकवा भी शामिल है.

You might also like

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

तो मूल बात पर आते हैं. पुलिस कब सुधरेगी, यह कोई आरोप नहीं है, टिप्पणी है. आरोप होता तो आइजी, डीआइजी, पुलिस कमिश्नर स्तर का कोई अधिकारी तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इसका खंडन करता या पुलिस प्रेस विज्ञप्ति जारी करके कहती कि इस देश की पुलिस तो पहले से ही बहुत सुधरी हुई थी, मगर 2014 के बाद के दस वर्षों में उसे इतना अधिक सुधार दिया गया है कि अब उसमें और सुधार संभव नहीं.

सारी दुनिया आज विश्वगुरु की इस पुलिस का कीर्तन कर रही है. इसकी ओर आशा की नजरों से देख रही है कि काश हमारी भी पुलिस इतनी ही शानदार, इतनी ही वजनदार होती !अमेरिका और यूरोप के अनेक देशों की पुलिस के अधिकारी उत्तर प्रदेश की एनकाउंटर विशेषज्ञ पुलिस से प्रशिक्षण प्राप्त करने लिए आना चाहते हैं, मगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री इसकी मंजूरी नहीं दे रहे हैं. वह अपनी पुलिस की विशेषज्ञता का लाभ किसी और देश से क्या किसी और राज्य से भी साझा करना नहीं चाहते !

तो मूल प्रश्न अखबार का यह है कि पुलिस कब सुधरेगी ? इसका सही जवाब किसी न किसी को तो देना पड़ेगा. जब कोई जवाब देने को तैयार नहीं है तो सोच रहा हूं मैं ही दे दूं कि हमारी पुलिस कभी नहीं सुधरेगी बल्कि मैं इतना और जोड़ना चाहूंगा कि पुलिस के न सुधरने में ही इस देश की इस व्यवस्था का कल्याण है.

हमारी पुलिस के पास नागरिकों को सुधारने की तो अकूत क्षमता है, जिसका प्रदर्शन वह देश के हर भाग में हर दिन करती रहती है, मगर जहां तक उसके अपने सुधरने का सवाल है, वह न तो अपने आप सुधर सकती है, न किसी को वह मौका देगी कि उसे सुधारे. उसे सुधारने की रिस्क ले कौन ? महामानव जी ? महामानव जी नोटबंदी करने की रिस्क ले सकते हैं, उसके लिए किसी भी चौराहे पर फांसी पर लटकने को भी तैयार हो सकते हैं मगर पुलिस के साथ उनका पुराना समझौता है कि न वह उन्हें सुधारेगी, न वह उसे सुधारने का दुस्साहस करेंगे.

कल्पना करो पुलिस किसी चमत्कार से सुधरने के लिए तैयार हो गई तो ‘हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे’ कि तर्ज पर वह अकेले नहीं सुधरेगी. उसकी शर्त होगी कि हम सुधरेंगे तो सबको सुधरना पड़ेगा. सीआईडी, सीबीआई, ईडी-फीडी, जो भी है, सबको सुधरना पड़ेगा. प्रधानमंत्री, गृहमंत्री से लेकर देश और प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, अधिकारियों, जजों, वकीलों, सेठों, दलालों, तस्करों, माफियाओं, चम्मचों, छुरियों-कांटों-प्लेटों इनमें से एक-एक को सुधरना पड़ेगा. क्या यह देश इतना अधिक सुधार झेलने में समर्थ है ?

जिस देश में सड़कें बरसात का भार नहीं झेल पातीं, कार और ट्रक ही नहीं, बरसात के पानी की धार का भार तक पुल नहीं सह पाते, सोने के पत्तर का वजन मंदिर सह नहीं पाते, उसे पीतल में बदलकर सहनीय बनाना पड़ता है, उस देश से ऊपर से नीचे तक सुधार का इतना बड़ा भार सहा जाएगा ? इससे सारी व्यवस्था छिन्न-भिन्न नहीं हो जाएगी ? सारे स्वार्थ तहस नहस नहीं हो जाएंगे ? प्रलय नहीं आ जाएगा ? कौन संभालेगा तब ? महामानव जी ?

जब किसी निरपराध को सताने, चोरी, डकैती, हत्या , लफंगई करवाने, ठेका दिलवाने, घूस खाने, तस्करी करवाने, नियुक्तियां और स्थानांतरण करवाने, सेठों को उपकृत करके उनसे उपकृत होने, संविधान की आरती उतारकर उसकी इज्जत उतारने का अधिकार नहीं होगा, तब तक महामानव क्या मंदिर का घंटा बजाने के लिए प्रधानमंत्री बनने को तैयार होगा ? सब सिस्टम से चलने लगेगा तो क्या नेता से लेकर चपरासी तक आत्महत्या करने को विवश नहीं हो जाएंगे ?

ऊपर से नीचे तक अगर केवल इतनी सी क्रांति हो गई तो क्या देश की वर्तमान एकता का ढांचा चरमरा नहीं जाएगा, जो कि प्रधानमंत्री से लेकर चपरासी तक के न सुधरने और न सुधरने देने पर दृढ़ता से टिका हुआ है ? जिस दिन सब सुधर गया तो तय मानिए उसी दिन उत्तर से दक्षिण तक, पूर्व से पश्चिम तक सब तितर-बितर हो जाएगा. गर्व से कहो, हम हिंदू हैं, चकनाचूर हो जाएगा. महामानव का नामलेवा नहीं रह जाएगा.

मान लो ईडी सुधर गई. उसने कहा कि श्रीमन अब हम आपके आदेश पर आपके विरोधियों को एकतरफा तौर पर गिरफ्तार नहीं करेंगे. मामला ठोस होगा, सबूत पक्के होंगे, तब हम मनी लांड्रिंग के केस में किसी को गिरफ्तार करेंगे, चाहे वह कोई भी हो, चाहे वह आप खुद हों‌. अगर ऐसा हुआ तो बताइए इस देश का क्या होगा ? क्या यह रसातल में नहीं चला जाएगा ? होगी किसी में हिम्मत तब उसे निकालने की ? है किसी के सीने में छप्पन इंच का दम ? ऐसी स्थिति में कोई भी सरकार इस देश को क्या चार दिन भी चल पाएगी और यह वाली सरकार क्या एक घंटा भी इसे चला पाएगी ?

पुलिस ने कह दिया कि सरकार जी आपके लोग हर वेश में हर जगह गुंडागर्दी कर रहे हैं, लोगों का जीना हराम कर रहे हैं, हत्या और बलात्कार कर रहे हैं, घरों और दुकानों पर जब चाहे, बुलडोजर चलवा रहे हैं, जिसको चाहे गिरफ्तार करवा रहे हैं, हम सबसे पहले इनके खिलाफ कड़ा से कड़ा एक्शन लेंगे ताकि सभी गुंडों-बदमाशों- सफेदपोश अपराधियों, यहां तक कि सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठे व्यक्तियों तक भी यह संदेश जाए कि बयानों में ही नहीं वास्तव में भी किसी को बख्शा नहीं जाएगा.

अब पुलिस, सीबीआई, ईडी सब कानून से चलेगी तो बताइए यह राजनीतिक धनतंत्र एक दिन भी टिक सकता है ? हर एफआईआर मान लो टाइम पर होने लगे, हर जांच पुख्ता होने लगे, हर अपराधी जेल में होने लगे, ऊपर के आदेशों का पालन बंद हो जाए, अधिकारी और जज दबाव में काम करने से मना कर दें तो क्या होगा इस देश का ? इसकी अपनी विशिष्ट पहचान का ?

पुलिस खुद जो आज चलती सी लगती है, एक कदम भी चल पाएगी ? उसका ऊपर से नीचे तक का बना बनाया, सजा-संवरा ढांचा बिखर नहीं जाएगा ? उसकी वर्दी का रौब साधारण नागरिकों पर नहीं चला तो बताइए क्या होगा ? इसकी चिंता है किसी को ? अगर होती तो अखबार ऐसा सवाल पूछने का साहस नहीं करता.

Read Also –

तेजी से जनता का भरोसा खोती पुलिस अपने सुधार के सोलह वर्ष बाद अब कहां है ?
पुलिस व्यवस्था में सुधार कब ?
पुलिस : राजनीतिक सत्ता को बनाये रखने का औजार
जेलों और पुलिस हिरासत में लगातार मौतें, विकल्प है ‘जनताना सरकार’

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
G-Pay
G-Pay
Previous Post

भारत का फासिज्म इटली और जर्मनी के फासिज्म से भिन्न है

Next Post

सीखने के लिए आप किस चरित्र को चुनते हैं, आपका चयन है…

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

by ROHIT SHARMA
September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

by ROHIT SHARMA
August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

by ROHIT SHARMA
August 27, 2026
Next Post

सीखने के लिए आप किस चरित्र को चुनते हैं, आपका चयन है...

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

वे पांच थे

June 7, 2022

दस्तावेज : भारत में सीपीआई (माओवादी) का उद्भव और विकास

September 6, 2026

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

August 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बारे में संक्षिप्त जानकारी

August 26, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.