Monday, September 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

महाराष्ट्र गढ़चिरौली में मारे गए संदिग्ध विद्रोहियों से सहानुभूति ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 21, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

महाराष्ट्र गढ़चिरौली में मारे गए संदिग्ध विद्रोहियों से सहानुभूति ? महाराष्ट्र गढ़चिरौली में मारे गए संदिग्ध विद्रोहियों से सहानुभूति ?

[गढचिरौली में 40 गरीब आदिवासियों की हत्या कर जश्न मनाने वाली नृशंस हत्यारी पुलिसकर्मियों पर माओवादियों ने पलटवार हमला कर 7 पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया है. निर्दोष ग्रामीणों की हत्या पर जश्न मनाने वाली पुलिसकर्मियों पर संभव है आने वाले दिनों में और तेज हमले हों, और बड़ी तादाद में पुलिसकर्मी मारे जाये. पर इससे पुलिस या सरकार कोई सबक नहीं सीखने की मानो कसम खा रखी हो.

You might also like

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

पुलिस आये दिन निर्दोष लोगों की हत्या करती है, उनके मुर्गे चुराती है, उनकी बेटियों के साथ बलात्कार करती है, उन्हें पकड़ कर थाने में थर्ड डिग्री टॉर्चर करती है, उनकी संपदाओं से उन्हें खदेड़ कर अदानी-अंबानियों के हाथों लगभग मुफ्त में सौंप देती है तो स्वभाविक तौर पर पुलिस और सरकार नये माओवादी को जन्म देती है, फिर उसे खत्म करने के नाम पर देश की जनता के टैक्सोंं से जमा अरबों-खरबों की विशाल धनराशि खर्च करती है. देश के चंद धन्नासेठों के हित खातिर एक हिस्से की जनता को खत्म करने के लिए देश के दूसरे हिस्से की जनता के इस्तेमाल के खिलाफ सवाल खड़े करने चाहिए.]

सरकार नक्सलियों को आतंकवादियों के रूप में संदर्भित कर राज्य के खिलाफ हिंसा करने के लिए उन्हें दोषी ठहरा झूठे मुठभेड़ का नाटक कर सोये हुए में गोली मार अपना पीठ थपथपाती है. महाराष्ट्र गढ़चिरौली आदिवासी जनजातिये समुदाय के कई सदस्यों को सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच हालिया मुठभेड़ का सकारात्मक दृष्टिकोण नहीं है, जिसमें 40 संदिग्ध विद्रोहियों को गोली मार दी गई थी. महाराष्ट्र के गडचिरौली जिले के घने जंगलों में रहने वाले आदिवासियों का एक वर्ग उनके साथ सहानुभूति व्यक्त कर मदद के लिए उन पर ही निर्भर रहता है.

गढ़चिरौली में आदिवासी समुदाय की आबादी लगभग 40 प्रतिशत है. आदिवासी जनजातिय समुदाय के कई सदस्य छोटे गांवों में घने जंगलों में रहते हैं. अधिकतर गांव-बस्तियां में सड़कों का निर्माण ही नहीं किया गया है और इसलिए किराने की दुकानों, अस्पतालों या शहरों तक पहुंचने के लिए आदिवासियों को घने बड़े जंगलों में 10 से 40 किलोमीटर चलना पड़ता है. इन जनजातियों में गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा चरम सीमा पर हैं.

पिछले साल, राज्य सरकार ने सड़कों, पाइपलाइनों सार्वजनिक वितरण केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र निर्माण से संबंधित गडचिरौली के गांवों के लिए एक योजना शुरू की थी. हालांकि, इसके लिए शर्त यह थी कि नक्सलियों के बारे में ग्रामीणों को पुलिस को सूचित करना है. क्या ये राज्य का हिस्सा नहीं हैं ? और क्या ये अन्य राज्यों के नागरिकों जैसे बुनियादी ढांचे के लायक नहीं हैं ? यह स्पष्ट है कि यह योजना जनजातियों के खिलाफ भेदभावपूर्ण है.

उनकी आजीविका के लिए जनजातीय मुख्य रूप से जंगल से टेंडू पत्ते एकत्र करते हैं, जिनका उपयोग बीड़ियों को रोल करने के लिए किया जाता है, और उन्हें ठेकेदारों को बेचते हैं. इन ठेकेदारों, जिन्हें अक्सर सरकारी अधिकारियों से समर्थन मिलता है, अक्सर आदिवासियों का फायदा उठाते हैं, जिससे उन्हें 1,000 टेंडू पत्तियों के लिए 100-150 रुपये की दरें मिलती हैं. जनजातीय समुदाय के एक सदस्य ने कहा, “लेकिन नक्सलियों के दबाव के कारण ठेकेदार हमें 1,000-350 रुपये प्रति 1000 पत्ते का भुगतान करते हैं. सरकार हस्तक्षेप क्यों नहीं करती है ? और हमें उचित दर क्यों नहीं देती है ? ताकि हम नक्सलियों पर निर्भर न हो ? एक तरफ, सरकार इस तरह के रुख को अपनाती है और दूसरी ओर, यह हमें नक्सलियों की मदद करने का आरोप लगाती है. ”

सिंचाई सुविधाओं की कमी के कारण, इस क्षेत्र के लोग वर्ष में केवल एक बार धान पैदा कर सकते हैं, यह साल के दौरान उनके लिए पर्याप्त नहीं है.

गढ़चिरौली में जनजातियों का पूरी जीवनशैली वनों पर निर्भर करती है. मिसाल के तौर पर, इन्हेंं जंगल से घर बनाने और खाना बनाने के लिए लकड़ी और पत्तियों की जरूरत होती है. इसके अलावा, हमें पारंपरिक उपचार के लिए औषधीय पौधों की आवश्यकता है. यहां तक ​​कि पारंपरिक अल्कोहल फूलों से बने होते हैं जिन्हें हम जंगल में प्राप्त करते हैं. इन गांवों में से कोई भी गैस सिलेंडर नहीं है लेकिन वन अधिकारी अक्सर जंगलों से लकड़ी ले जाने वाले आदिवासियों को रोकते हैं और कहते हैं कि यह अवैध है, और रिश्वत मांगते हैं. इस क्षेत्र में, नक्सल नेताओं ने पुलिस पर दबाव डाला, जिसके कारण आदिवासियों को लकड़ी मिलती है. इसी तरह, जब आदिवासी घरों के निर्माण के लिए रेत लाने की कोशिश करते हैं, तो राजस्व विभाग उन्हें ऐसा करने से रोकने की कोशिश करता है.
“पुलिस अत्याचार नियमित रूप से होते हैं, और इसके कारण आदिवासियों में डर है. पुलिस कहीं से भी यादृच्छिक रूप से उठाती है, और नक्सलियों के साथ संबंधों का आरोप लगाती है. कभी-कभी, पुलिस अधिकारी सादे कागजात पर लोगों के अंगूठे के छाप लेते हैं, यह बताए बिना कि ये क्या है. नक्सल कम से कम हमें अनावश्यक रूप से परेशान नहीं करते हैं. वे केवल पुलिस सूचनार्थियों पर हमला करते हैं. इसके अलावा, हमें उनसे किसी भी समस्या का सामना नहीं करना पड़ता है.”

23 अप्रैल के मुठभेड़ में मारे गए शीर्ष नक्सल नेता नंदू , “स्थानीय कॉलेज में 2003-04 में 12 वीं कक्षा में नंदू विज्ञान धारा में शीर्ष स्थान पर रहे. हालांकि, हमारे पास आगे की शिक्षा के लिए कोई पैसा नहीं था. युवाओं के लिए उपलब्ध अगला कैरियर विकल्प नक्सलियों में शामिल होना है, और यही वह है जो उसने किया था. यहां कई बच्चे आश्रमशाल (जनजातीय बच्चों के लिए सरकारी आवासीय विद्यालय) जाते हैं. वे इन स्कूलों में खाद्य और सुरक्षा की बुरी स्थिति के बावजूद अध्ययन पूरा करते हैं. वे नौकरी पाने में असफल होते हैं, या तो क्योंकि वे मराठी को सही तरीके से नहीं बोल सकते हैं या क्योंकि उनके पास सरकारी नौकरियों के लिए रिश्वत देने के लिए पैसा नहीं है, उन्हें तेंदु पत्तियों को फेंकने के लिए गांवों में लौटना पड़ता है. ”

पारंपरिक टैटू के सहारे लड़कियों के खूबसूरत चेहरों को पुलिस हमलों से बचाने के लिए “माता-पिता अपनी लड़कियों के खूबसूरत चेहरों को विकृत करते हैं.” महाराष्ट्र के रिमोट गडचिरौली जिले में, आदिवासियों के एक वर्ग का कहना है कि नक्सल उन्हें अपने अधिकार सुरक्षित रखने में मदद करते हैं.

– S B S I Mission

Read Also –

माओवादियों को खत्म करने के नाम पर आदिवासियों को भूख से मारने की तैयारी में झारखण्ड की भाजपा सरकार
गढ़चिरौली एन्काउंटर: आदिवासियों के नरसंहार पर पुलिसिया जश्न

[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

Previous Post

LG ने पुलिस से पूछा, “कैसे ‘आप’ के विधायक बरी होते जा रहे हैं ?”

Next Post

आरएसएस की पाठशाला से : गुरूजी उवाच – 2

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

by ROHIT SHARMA
September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

by ROHIT SHARMA
August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

by ROHIT SHARMA
August 27, 2026
Next Post

आरएसएस की पाठशाला से : गुरूजी उवाच - 2

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

सवर्ण आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट : कोर्ट ब्रह्म नहीं होता

November 10, 2022

8 मार्च : सद्दाम हुसैन को याद करते हुए

July 15, 2019

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

August 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बारे में संक्षिप्त जानकारी

August 26, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.