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Home गेस्ट ब्लॉग

आजादी चरखे से नहीं आई, यह सच है…

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 7, 2024
in गेस्ट ब्लॉग
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आजादी चरखे से नहीं आई, यह सच है...
आजादी चरखे से नहीं आई, यह सच है…

छोटा सा अंदाजा लगायें. सन 2024 में देश में 1330 जेलें है, जिनमें 5.25 लाख कैदी है. यह तब, जब उनमें अधिकतम क्षमता से दो-तीन गुने कैदी हैं. तो सवाल यह कि सन 1920 या 1940 में देश मे कितनी जेलें होंगी ?? उन जेलों की कितनी क्षमता होगी ? याद रखिए देश की पॉपुलेशन, तब बत्तीस करोड़ थी. अगर 1% भी लोग जेल जाने को तैयार हो गए तो 32 लाख जेलार्थी होते हैं. और जेल जाकर आने वाले से पूछिए. फिल्मों में ही देख लीजिए, जेल मुफ्त छात्रावास की तरह है. आपका खान पान, कपड़े, लत्ते, बीमारी सबकी जिम्मेदारी सरकार की है. लेकिन जेल जाने से डर नहीं लगता साहब, उससे खत्म हो जाने वाले मान सम्मान से लगता है.

सजायाफ्ता अपराधी की इज्जत खत्म, कोई नौकरी, छोकरी, व्यापार नहीं देता. आपके चरित्र पर गिरावट की स्थायी मुहर लग जाती है. तो जेल डराती है. पर क्या होगा… जब जेल जाना इज्जत की बात हो जाये ?? उनसे पूछिये, जिनके दादे परदादे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जेल गए थे. उनके वंशज दशकों बाद भी उनका नाम सीना फुलाकर बताते हैं. दरअसल सीना तो उनका पिचका है, जिनका कोई पूर्वज जेल नहीं गया. उस कायर सावरकर का नाम सिर्फ इसलिए ही रिंग में उछाला जाता है, क्योंकि गैंग का एकमात्र आदमी है, जो जोश जोश में जेल गया था. तो यह गांधी की करामात थी, जिसने उस दौर में आम आदमी का जेल जाना, इज्जत का सबब बना दिया.

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वे दरअसल, जेलें भरना चाहते थे. क्योंकि दमन गोली से होगा, या जेल से. अब गोली से अंग्रेज 30 करोड़ लोग मार नहीं सकते. ये जर्मनी नहीं था. बंदूक चलाने वाले, यहां फौज और पुलिस में 90% भारतीय थे. और जेल में तो 50 लाख भी रखना असंम्भव है. 5-10 लाख जेल अभिलाषियों में सरकार की चूलें हिल जाती. पर इस जज्बे में, काम में बीस साल लगे. गांधी स्वयं जेल गए. बड़े कांग्रेसी जेल गए. जेल जाना, बड़प्पन का, नोबल सोल होने का प्रतीक बन गया.

लेकिन जेल के लिए अपराध चाहिए. कैसा अपराध करें ?? क्या हम थाने जलाएं, कलक्टर, एसपी, पटवारी को मारें ? नही, उसमें सजाएं हार्श हैं. मौत, लंबी जेल, या आजीवन कारावास. गांधी ने हल्के अपराधों का चयन किया. नमक कानून तोड़ो. गली गली, सड़क में, सरकार को दिखाकर… पुलिस वालों के सामने- नमक बनाओ, गिरफ्तार हो जाओ. धारा 144 का उल्लंघन करो, गिरफ्तार हो जाओ. राजद्रोही भाषण दो, पर्चे लिखो, अखबार चलाओ, गिरफ्तार हो जाओ. शराब दुकान खुलनें मत दो. मार खाओ, गिरफ्तार हो जाओ. इसके बीच, पवित्र अहिंसा का संदेश, आपके अपराध को जघन्यता की तरफ न जाने देने के लिए था. यह अंग्रेजों का नहीं…आपका सुरक्षा चक्र था.

और चरखा…मन मजबूत करने को. सुबह बैठकर प्रार्थना करते हैं, ईश्वर को समीप पाते हैं. फिर वह दिन भर साथ रहता है. आपकी साइकोलॉजी में बैठा रहता है. सुबह चरखा चलाइये. गांधी आपके समीप आ जाएंगे. आजादी का जज्बा भीतर प्रविष्ट होगा. दिन भर, आपकी साइकोलॉजी में बैठा रहेगा. आप अंग्रेजों की नकार, और राष्ट्रभाव के सकार में रहेंगे. द्रोण की मूर्ति की तरह, सुबह जब चरखा आपके सामने होगा. आप एकलव्य की तरह, हर पल आजादी के संधान की प्रैक्टिस करेंगे. लिखने, बोलने, प्रदर्शन में जाने, पिटने, जेल भरने को तैयार होंगे.

देश मे करोड़ों लोग चरखा चला रहे थे. कपड़ा नहीं बना रहे थे. तकली के हर घुमाव के साथ वे अपने भीतर स्टील के तार बुन रहे थे. मजबूत हो रहे थे. और कुछ बरसों तक चरखा चलाने वाला हर शख्स, खुद गांधी बन चुका था. 1942 में जब पूरी कांग्रेस जेल में भर दी गयी…देश के कोने कोने से गांधी निकल आये. बलिया का गांधी, कोई गया का, पटना के गांधी, मुम्बई के गांधी. हर गांव, हर शहर, हर प्रदेश, जिसके सर पर सफेद टोपी, वही बना था गांधी. वो सबसे मजबूत आंदोलन था. उसे रोकने, दिशादर्शन को गांधी मौजूद नहीं था, तो कई जगहों पर वह दिशा भी भटका. नेगोशिएशन के लिए लन्दन से मिशन पर मिशन भेजे जाने लगे. गांधी ने इस बार आंदोलन रोकने की अपील न की.

अब जनसैलाब के सामने, एक ही दीवार थी – सेना. लेकिन अंग्रेजों और उनके वफादार भारतीय सैनिकों के बीच की डोर भी टूट गयी. आजाद हिंद फौज के अफसरों पर लाल किला ट्रायल उल्टे पड़े. नेवी का विद्रोह हुआ. जब बांध दरकने लगे, और पीछे खड़े सैलाब की ताकत का आपको अंदाजा हो, तो क्या करेंगे ? भाग खड़े होंगे. जाहिर है- अंग्रेज भाग खड़े हुए. उस सैलाब से डरकर, जो हर इंसान के दिल में था. जिसने लाखों भारतीयों को जेल और मौत से बिना डरे, लड़ना सिखा दिया था. आजादी चरखे से नहीं आई, उस सैलाब से आई. आप समझ सकें, तो समझिये, कि गांधी का चरखा…कपड़ा नहीं बुनता था जनाब, वह सैलाब बुनता था.

क्या गांधी बंटवारे के जिम्मेदार थे ?

जब 1947 में आजादी मिली, हम उन्हें श्रेय देते हैं, तो 1947 बंटवारे का दोष क्यों नही देनी चाहिए ? सवाल वाजिब लगता है. अगर बचपन में स्कूल गए हैं, BODMAS फार्मूला पढा होगा, किसी कॉम्प्लेक्स इक्वेशन को सॉल्व करने के लिए. पहले ब्रेकेट, फिर ऑर्डर ऑफ रूट्स एंड पॉवर, फिर भाग, फिर गुणा करना है. इसके बाद ही जोड़ना है, अंत में घटाने का जतन…हिंदी माध्यम के लिए दोहा भी है –

‘का करके पुनि भाग कर, फिर गुण लेहू सुजान,
ता पीछे धन ऋण कर, भिनं रीति जान.

आपने गलत क्रम में हल किया, एक कोष्ठक की राशियां, दूसरे से मर्ज कर दी, तो उत्तर हमेशा गलत आयेगा. सही हल करने का क्रम, बस एक है. गलत गणना के हजारों. चरणबद्ध विचारण का नियम हर फील्ड में लागू है. जो काम्प्लेक्स सब्जेक्ट को गलत क्रम में हल करते है, मिक्सअप करके, गलत निष्कर्ष, गलत नतीजे, गलत फैसले पर पहुंचते हैं. तो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की गतिविधियां, समीकरण में एक कोष्ठक है. बंटवारा दूसरा कोष्ठक. यह ठीक, कि समय रेखा पर दोनों पद 1947 में एक साथ बैठे हैं. इससे दोनो चीजें एक नहीं हो जाती. यह ठीक से समझें.

आजादी, स्वराज (अपना राज) पाने का उपक्रम थी, जो 1947 नहीं, 1909 से ही आना शुरू हो गया थी, जब हमें नगरपालिकायें चलाने की इजाजत मिली. 1919 में हमें स्टेट और सेंट्रल एसेम्बली मिली. 1935 में स्टेट गवर्मेन्ट चलाने को मिली. अंततः केंद्र सरकार, हमें 1947 में मिली. हर कदम के पीछे एक आंदोलन है. 1905 का बंग भंग आंदोलन, 1914-18 के एजिटेशन, 1929 का सत्याग्रह, और 1942 का आंदोलन. इसे SST के ‘सम्विधान का विकास’ नाम के चेप्टर में पढ़ेंगे, जो 1776 के रेगुलेटिंग एक्ट से शुरू हो, 1950 के संविधान तक जाता है. गांधी इस ब्रेकेट के खिलाड़ी हैं.

अलग ब्रेकेट भी है, राष्ट्रीयता डिफाइन करने का. यहां धर्म के आधार पर देश डिफाइन हो रहा है. मुस्लिम नेशन, हिन्दू नेशन. दलित नेशन खेलने वाले भी हैं. सबको सेपरेट इलेक्ट्रोरेट चाहिए. पर ये तो सिर्फ ब्रिटिश इलाको में न…जो आप सदा भूल जाते हैं, कि 50% जमीन पर रजवाड़े हैं. यहां हैदराबाद नेशन अलग है, जूनागढ़ नेशन भी, ऐसे 600+ नेशन हैं. इनका क्लेम भी है, एसेम्बली में उनका भी पक्ष है. यह है- इक्वेशन का दूसरा ब्रेकेट..गांधी यहां भी खिलाड़ी है. उनका नेशन एक है. हिन्दू, मुस्लिम, रजवाड़ा, दलित…सिंधी, मराठी, तमिल, उड़िया- इस भूमि पर जो खड़ा है, सब भारतीय है. यह नेशन एक है – सिर्फ एक…भारत.

उनकी सरपरस्ती में कांग्रेस, इस विचार को बढ़ा रही है. खुशकिस्मती से वही डोमिनेन्ट फोर्स है. बदकिस्मती से, ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ है. ब्रिटिश सत्ता, बिखरा नेशन चाहती है. कम्युनल इलेक्टोरेट देना चाहती है. धर्म, जाति आधार पर निर्वाचन, ताकि नेता बंटे रहे. उनके पीछे जनता बंटी रहे. अंग्रेज दबाव में नगरपालिका, असेम्बली, स्टेट गवर्मेन्ट सब दे रहे हैं, पर प्रशासनिक संगठन यूं गढ़ना चाहते हैं, कि हर स्तर पर कम्युनल और जातिगत झगड़े कायम रहें. कम से कम क्रेंद्र उनके हाथ में रहेगा.

अब इन दो ब्रेकेट को अलग-अलग हल कीजिए. हर खिलाड़ी, हर इंटीजर की वैल्यू, उसके प्लस माइनस साइन के साथ हल कीजिए. देखिए कि कौन स्वराज और वन इंडिया के लिए लड़ रहा है. कौन कम्युनल इलेक्ट्रोरेट और ब्रिटिश हित के साथ हैं. तस्वीर साफ होगी.

15 अगस्त, 1947 को दोनों ब्रेकेट खुलते हैं. दो फैसले होते हैं. ब्रिटिश जाएंगे और 2 नेशन बनेंगे. एक तीसरा फैसला भी- सभी रजवाड़े भी आजाद होंगे. पर उन्हें दो नेशन में किसी एक से मर्ज होना पड़ेगा. यही इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट है.

370 हटने पर फारुख अब्दुल्ला कुछ नहीं कर सकते. बिहार टूटकर झारखंड बनने पर लालू यादव कुछ नहीं कर सकते क्योंकि अथॉरिटी उनकी नहीं, केंद्र सरकार की थी. वैसे ही बांटने वाली अथॉरिटी, मुस्लिम लीग, कांग्रेस, या हिन्दू महासभा नहीं, ब्रिटिश थे. अगर वे देश न बांटते तो स्थानीय दल और नेता क्या ही कर लेते ? दंगे ?? कौन करता ? कांग्रेस ?? आपके समीकरण का जवाब यहां है. याने बांटने का बहाना, किसने दिया ?? उत्तर-मुस्लिम लीग- मुस्लिम राष्ट्र के पैरोकार. हिन्दू महासभा- हिन्दू राष्ट्र की पैरोकार.

आज सत्ता, मीडिया, सीबीएसई, यूनिवर्सिटी हिन्दू महासभा के पुत्रों के हाथ है तो वे ढिठाई से दोष कांग्रेस पर डालते हैं. गांधी पर डालते हैं और आप उन्माद में वही सवाल दोहराते हैं, जबकि इस समीकरण में, एक आदमी, एक दल था…जो वन इंडिया का पैरोकार था. तो गणित के विद्यार्थियों…आज का सबक. बंटवारे का ब्रेकेट अलग है. उसे नेशनल मूवमेंट के ब्रेकेट में घुसाकर कंफ्यूजित न होइए. (अब शुरू से दोबारा पढ़े).

मैंने गांधी को क्यूं मारा – नाथूराम गोडसे

विश्व के सबसे भचीड़ इंसान और गोयबल्स के सच्चे वारिस, श्री श्री 1008 अमित मालवीय का ट्वीट देखा. इस किताब को पढ़ने का आव्हान करते हैं. तर्क है, गोडसे द्वारा गांधी को मारने की कोई तो वजह रही होगी. पढ़कर जानना चाहिए. हम लोगों को पढ़कर और भी बहुत कुछ जानना चाहिए, जैसे कि –

– मैंने इंदिरा को क्यूं मारा- बेअन्त सिंह
– मैनें बच्चों का रेप और मर्डर क्यों किया- रंगा-बिल्ला
– मैनें दर्जनों महिलाओं का कत्ल क्यो किया- जैक द रिप्पर
– मैनें मातृभूमि के दो टुकड़े क्यों लिए-मोहम्मद अली जिन्ना
– मैनें अनुसुइया का शीलभंग क्यों किया- इंद्र
– मैनें सीता का हरण क्यों किया- रावण

पर इन किताबों को लिखा नहीं गया. बदले में आप दूसरी किताब पढ़ सकते हैं- ‘मैनें दंगे क्यो करवाये- अनगिनत लेखक हो सकते हैं. हर कत्ल, बलात्कार, चोरी, छिनैती, दंगे के पीछे कोई कारण तो होगा. पर क्या किसी अपराध के पीछे अपराधी की मानसिकता जानना जरूरी है ? आप यौनेच्छा कन्ट्रोल न करने के कारण बलात्कार करें, नफरत में हत्या करें, गरीबी में चोरी डकैती छिनैती करें. अपराधी तो सदा एक नोबल कारण गिनायेगा. मजबूरी गिनायेगा. खुद को मजलूम, मजबूर बतायेगा. पूछकर देखिए, क्रिया के विरुद्ध प्रतिक्रिया का सिद्धांत मिलेगा. पर क्रिया और प्रतिक्रिया का विज्ञान, बेजान धातुओं पर लगता है. उनपर, जो बायलोजिकल नहीं होते.

जो जिंदा है, धड़क रहे हैं. और जिनके बदन पर इंसानी स्पीशीज होने की तोहमत भले ही मजबूरन लगी हो, वहां क्रिया के बाद विचार, समझ, सलाहियत, इंसानियत, रिकनसीलियेशन जैसे भाव आते हैं. क्योंकि मानवीय समाज है. बेजान वस्तुओं का विज्ञान नहीं है. तो सीता के हरण से लेकर गांधी के मरण तक, कारणों की लकीर हर जगह होगी. पर क्या वे इंसानी मस्तिष्क को पढ़ाये जाने चाहिए ?सिवाय तब, जबकि आप स्थिर चित्त से, एक मैच्योर एज में, क्रिमिनल साइकोलॉजी का अध्ययन कर रहे हों, आम तौर पर ऐसे साहित्य से दूर रहना चाहिए. वाय आई किल्ड गांधी से तो पूरी तरह दूर रहना चाहिए.

यह किताब उस भाषण पर आधारित है, जिसे गोडसे ने कोर्ट में दिया था. कहा जाता है कि यह भाषण उसे सावरकर ने लिखकर दिया था, क्योंकि उसकी शब्दावली सावरकर की सिग्मेचर शैली से मिलती है. तो यह गोडसे का कथन नहीं. असल हत्यारे का है. जो बाई डिफाल्ट झूठा है. गांधी हत्या, जिसे बेशर्मी से ‘गांधी वध’ कहकर गोडसे को श्रीराम और श्रीकृष्ण के बगल में खड़ा करने की हिमाकत की जाती है, वह गोडसे के छठवें प्रयास में हो पाई.

पहला प्रयास 1934 में हुआ, जब पूना में गांधी की कार में बम फेंका गया. दूसरा 1940 में जब गांधी की ट्रेन की पूना के पास पटरी उखाड़ी गयी. तीसरा जब 1941 में जब गोडसे गांधी पर छुरा लेकर दौड़ा. इसके बाद 1945 में एक और 1948 में दो प्रयास हुए, जिस दूसरे में हत्यारे अंततः सफल हुए.

इस किताब में गांधी हत्या के लिए पाकिस्तान का निर्माण, उसे 55 करोड़ रुपये देने का दबाव, 15 किलोमीटर का गलियारा देकर पूर्वी- पश्चिमी पाकिस्तान को जोड़ने का प्रयास जैसे कारण गिनाए गए हैं. पर सारे कारण क्या 1941 में मौजूद थे ?? 1934 में मौजूद थे ?? अगर नहीं, तो हत्यारे तब से ही गांधी को मारने की कोशिश में क्यों थे ?? गांधी की हत्या का असल कारण आपको उनकी हत्या के पहले प्रयास से समझना होगा. यह डेट 1934 है. क्या था 1934 के पहले, जो 1916, 1920 या 1930 में नहीं था ?? पूना पैक्ट.

गांधी ने हिन्दुओं की 149 सीटें दलितों को देने का पैक्ट किया. इसके बाद एक खास मराठी ब्राह्मण वर्ग उनके खिलाफ हो गया. कल्याण जैसी पत्रिकाएं गांधी के विरुद्ध आग उगलने लगी. गोडसे उसी वर्ग से था, जिसके ‘हक’ की सीटें गांधी ने दलितों को दे दी. जिन्हें मन्दिर में घुसाने और अस्पृश्यता दूर करने के अभियान में 1934 में दलित चेतना यात्रा निकाल रहे थे. तो यह किताब झूठ का पुलिंदा है. गोडसे का भाषण झूठ का पुलिंदा है. यह भाषण, इसके तथ्य कोर्ट ने खारिज कर दिए. गोडसे को उसके कर्म की सजा दी.

लेकिन एक जनश्रुति और है…जिस पर आने वाले वक्त में एक वेबसीरीज मशहूर दृश्य आधारित हुआ. गोडसे ने जब अपना भाषण खत्म किया, जज साहब पोडियम से उतरकर कटघरे के पास आये. गोडसे को जमकर दो झापड़ लगाए और कहा – लोमड़ी के…अब तो सच बोल दे लोमड़ी के !!

कैसी मौत चाहिए गांधी को ?

कैसी मौत चाहिए गांधी को ? ऐसी, कि एक तरफ से खंजर से हमला हो, दूसरी ओर से सिर पर कुल्हाड़ी का वार, हर तरफ से हर तरफ से लात-घूंसे, लाठियां और गालियां !!! ये मौत, गणेश शंकर विद्यार्थी, को नसीब हुई थी. दंगों में मारे गए. गांधी ने ईर्ष्या जताई. कहा कि मेरी भी मौत हो, तो ऐसी ही शानदार हो.

गणेश शंकर कानपुर के पत्रकार थे. कभी महावीर प्रसाद द्विवेदी के साथ सरस्वती में सहायक सम्पादक थे. फिर कानपुर आकर प्रताप नाम का अखबार निकाला. बड़ा नाम था अखबार का, और पत्रकार, लेखक, साहित्यकार के रूप में गणेश शंकर की खासी इज्जत थी. किसी को न छोड़ते. एक बार लिखा- ‘हमें जानबूझकर मूर्ख नहीं बनना चाहिए और गलत रास्ते नहीं अपनाने चाहिए. हिंदू राष्ट्र- हिंदू राष्ट्र चिल्लाने वाले भारी भूल कर रहे हैं. इन लोगों ने अभी तक राष्ट्र शब्द का अर्थ ही नहीं समझा है.’

तो अगली बार लिखा- ऐसे लोग जो टर्की, काबुल, मक्का या जेद्दा का सपना देखते हैं, वे भी इसी तरह की भूल कर रहे हैं. टर्की, काबुल, मक्का या जेद्दा उनकी जन्मभूमि नहीं है. उनकी कब्रें इसी देश में बनेंगी. और अगर वे लायक होंगे तो उनके मरसिये भी इसी देश में गाए जाएंगे.’

जाहिर है, उनके दुश्मन हिन्दू थे, मुस्लिम भी. अंग्रेज तो थे ही. लिखने के लिए कभी राजद्रोह लगा, कभी कुछ. मोतीलाल दौड़े आते मुकदमा लड़ने. कभी सजा से बचा लेते, कभी नही बचा पाते. 5 बार जेल गए गणेश शंकर…क्योंकि वे लेखक थे, कांग्रेस के मेम्बर भी थे, और क्रांतिकारियों के खैरख्वाह भी.

एक बार वांटेड क्रांतिकारी, अपनी प्रेस के गुप्त कमरे में, कई माह छुपाए रखा. जब पुलिस की दबिश होने वाली थी, उसे भगा दिया. एसपी को पता चला, उसने तलब किया. पूछा- ऐसा क्यों किया तुमने ??? गणेश शंकर विद्यार्थी ने कोई ना नुकुर नहीं की. सीधे कहा – ‘वही किया जनाब, जो आयरलैंड में आप लोग करते हैं.’ साहब स्पीचलेस. वे आयरिश थे और ब्रिटेन का आयरलैंड पर भी कब्जा था. आयरिश ब्रिटिश से वहां लड़ रहे थे. तो ऐसे धाकड़ थे विद्यार्थी…

लाहौर में ब्याह के लिए परिवार वालों की जिद से बचकर भागे, भगतसिंह का पहला ठिकाना, गणेश शंकर विद्यार्थी की प्रेस थी. वहां 1924 में बलवंत के छद्म नाम से भगतसिंह, ‘प्रताप’ में कॉलम लिखते रहे. प्रेस के दीगर काम भी करते. और यहीं से गणेश शंकर विद्यार्थी ने (सावरकर नहीं, जैसा संघी गप्पो में बताया जाता है) आजाद, अशफाक समेत तमाम HSRA के क्रांतिकारियों से भगत का सम्पर्क कराया.

कौन जानता था कि उनका भाग्य भगतसिंह से जुड़ा हुआ है. 25 मार्च 1931 को मौत बदी थी भगतसिंह की. लेकिन मौत से इंतजार हुआ नहीं. 23 की रात ही लाहौर में गुपचुप फांसी लगा दी गयी. दंगेबाजों को बहाना चाहिए. कानपुर में हिन्दू मुस्लिम शुरू हो गया. गणेश शंकर से रहा नहीं गया. वे दंगाग्रस्त इलाकों में घूमते रहे. 25 मार्च को सफेद कुर्ते में उनकी लाश मिली.

चश्मदीदों ने जो बताया, वह गांधी की लेखनी में ‘यंग इंडिया’ में यूं छपा – ‘मैं नहीं जानता कि क्या गणेश शंकर विद्यार्थी का बलिदान बेकार गया ? उनकी शख्सियत मुझे हमेशा प्रेरणा देती रही. मुझे उनके बलिदान से बड़ी ईर्ष्या होती है. दुःख की बात है कि यह देश और गणेश शंकर पैदा नहीं करता. उनके बाद यह शून्य भरने को कोई नहीं है. गणेश की अहिंसा, शुद्ध अहिंसा थी. मेरी अहिंसा भी उसी दिन शुद्ध मानूंगा, जब सिर और कुल्हाड़े के वार से शांतिपूर्वक मरूं. मैं तो ऐसी मौत का स्वप्न देखता हूं.

‘क्या शानदार मौत होगी…कि एक तरफ खंजर का वार आये, दूजी ओर कुल्हाड़ी. किसी और तरफ से लाठी का घाव हो. लात घूंसे गालियां चारो ओर से पड़ें. तब मुझमें साहस होगा, तो मैं अहिंसक और शांत बना रहूंगा. तभी मुझे हक होगा कि औरों से ऐसी अहिंसा की अपेक्षा करूं. और मर जाऊं, एक खुशनुमा मुस्कान के साथ. तभी मेरी अहिंसा शुद्ध और पूर्ण बनेगी. मैं ऐसे ऐसे अवसर की लालसा कर रहा हूं. और चाहता हूं कि हर कांग्रेसजन ऐसे अवसर की तलाश में रहें.’

41 साल की उम्र में गणेश जान दे गए. पत्रकारिता का जो मानक वो स्थापित करके गए, वो आज भी इस प्रोफ़ेशन का शिखर माना जाता है. रही गांधी की, तो उनकी इच्छा अंग्रेजी राज में कभी पूरी न हो सकी. मगर आजाद भारत में, अपनी सरकार में, अपने लोगों ने, उनके ही धर्म के एक युवा ने, उन्हें शानदार मौत दी. उनकी अहिंसा पूरी हुई. पर मारने वालों का जी न भरा. वे गंदे हाथ, गंदे पैर, गंदे ख्याल, दिल में ईर्ष्या और हाथ में फूल लेकर राजघाट पहुचते हैं. कसम दोहराने को…कि हर दिन, हर पल, गांधी को उनकी इच्छित मौत देंगे. आज भी वे पहुंचेंगे. आप उन्हें शानदार कपड़ों से पहचान सकते हैं.

  • मनीष सिंह

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