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किसान आंदोलन फिर से लय में आने लगा है !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 18, 2024
in गेस्ट ब्लॉग
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किसान आंदोलन फिर से लय में आने लगा है !
16 अक्टूबर को सुरजीत भवन, नई दिल्ली में संयुक्त किसान मोर्चा की आम सभा मीटिंग में बोलते हुए जोगिन्दर सिंह उगराहां

चुनाव को ‘मैनेज’ करने के हथकंडे अनेक हैं. इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में हेराफ़ेरी के ज़रिए, ‘जनमत’ हांसिल करने, ‘लोकप्रिय सरकार’ बनाने का तरीका हुकूमत ने ढूंढ लिया है. लेकिन लगातार बिकट होती जा रहीं आर्थिक परिस्थितियों से उपजते आक्रोश और बेचैनी को ‘मैनेज’ करना संभव नहीं. जन-विक्षोभ को ‘मैनेज’ करने का कोई फार्मूला होता, तो मानव विकास के इतिहास-क्रम में, वर्ग-विभाजन के पश्चात सत्ता में आए, पहले शासक के वंशज ही आज तक राज़ कर रहे होते. चुनाव ‘मैनेज’ करने का आख़री अंजाम, जन-विक्षोभ के भयंकर, विस्फोटक के रूप में होना निश्चित है.

‘26 नवंबर’ का दिन, ‘संविधान दिवस’ के साथ ही, ‘किसान दिवस’ भी बन चुका है. चार साल पहले, इसी दिन, उत्तर दिशा से, किसानों के विशाल जत्थे, अपने ट्रेक्टरों, और काले कृषि क़ानूनों को रद्द कराने की ज़िद लिए, फैसलाकुन लड़ाई के पक्के इरादों के साथ, दिल्ली की दिशा में निकले थे. रास्ते में लाई गई हर रूकावट को वे पलटते चल रहे थे. पानी की तेज़ बौछारों के बीच, अंबाला कैंट फ्लाई ओवर से, पीले रंग के बड़े पुलिस बैरिकेड को उठाकर नीचे फेंकते किसान युवकों की वह कालजयी तस्वीर हर देशवासी के ज़हन में गुद चुकी है.

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26 नवंबर की चौथी बरसी शानदार ढंग से मनाने और अपने दूसरे एजेंडे पर विचार-विमर्श कर, आंदोलन का आगे का रास्ता तलाशने के मक़सद से, ‘संयुक्त किसान मोर्चे’ की आम सभा, 16 अक्टूबर को, 11 से 4 बजे तक, हरकिशन सिंह सुरजीत भवन, आईटीओ पर हुई, जिसमें ‘क्रांतिकारी किसान मोर्चा’ ने भी शिरक़त की. सभा के एजेंडे को पढ़ने से ही समझ आ जाएगा, कि पिछले 4 वर्षों के आंदोलन के तजुर्बे ने, किसानों को कितना परिपक्व बना दिया है, कृषि क्षेत्र में सरकार की असल मंशा क्या है, इसे समझने में वे कितने जागरुक और अपडेट हैं. सभा की शुरुआत साईंबाबा और दूसरे कई अहम किसान कार्यकर्ताओं की मृत्यु पर उनके सम्मान में दो मिनट के मौन से हुई.

एजेंडा: एसकेएम के मांग चार्टर के आधार पर, भविष्य की कार्यवाही, सेंट्रल ट्रेड यूनियंस के साथ एसकेएम की संयुक्त और समन्वित कार्य योजना, संयुक्त कृषि-श्रमिक आंदोलन के साथ समन्वय, पूरे भारत में राज्य स्तरीय समन्वय को मज़बूत करना, राज्य विधान सभा चुनावों की समीक्षा और आगामी योजना, लखीमपुर खीरी मामले की क़ानूनी कार्यवाही के लिए रिपोर्टिंग और भविष्य की योजना, एसकेएम सचिवालय के मीडिया, वित्त और कार्यालय नेटवर्क का प्रबंधन.

निमंत्रण संदेश में, इस एजेंडे के आलावा, दो बिन्दू, ‘संकल्प’ शीर्षक से लिखे हुए थे, जिन्हें पढ़कर पाठक समझ जाएंगे कि सत्ताधारी भाजपा के दुष्प्रचार के शिकार, जो लोग किसानों को ‘एवेंई’ या ‘देहाती लट्ठबाज़’ समझते हैं, वे कितने मूर्ख हैं. संकल्प हैं; कृषि के निगमीकरण (कोर्पोरेटाईजेसन) और ‘डिजिटल कृषि मिशन’ पर तथा कृषि को प्रभावित करने वाली बाढ़ और जलवायु परिवर्तन पर, एसकेएम क्या फैसला ले, क्या कार्यवाही की जाए; यह तय करना.
क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा, शुरू से ही, किसान आंदोलन के साथ बहुत शिद्दत से जुड़ा है.

इस मीटिंग की जिस बात ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह थी, अनुशासन. हर वक्ता, 3 से 4 मिनट ही बोलेगा और एजेंडे पर ही बोलेगा, इस मामले में कोई रियायत नहीं थी, भले वह नेता, टीवी पर हर रोज़ ही क्यों ना नज़र आता हो. 5 सदस्यीय अध्यक्ष मंडल के अध्यक्ष थे, भारतीय किसान यूनियन (डकौंडा) के अध्यक्ष, सरदार जगमोहन सिंह, जिनकी आवाज़ इतनी कड़क है, कि वक्ता उसे नज़रंदाज़ कर ही नहीं सकता. स्टेज पर अध्यक्ष मंडल के पीछे दो सदस्य सेक्रेटरी की भूमिका में थे, जो कही गई हर बात को तत्परता से नोट कर रहे थे.

मीटिंग की पूरी कार्यवाही, ऐसे पेशेवराना अंदाज़ में हुई, कि कोई भी उससे प्रभावित हुए बगैर रह ही नहीं सकता. भारतीय किसान यूनियन (एकता उगराहां) के प्रधान, जोगिन्दर सिंह उग्राहां बोल रहे थे, ‘किसानों को खेत-मज़दूरों और भूमिहीन किसानों, पशुपालकों को भी अपने साथ जोड़ना चाहिए, मैं एजेंडे से बाहर की एक बहुत ज़रूरी बात भी बोलना चाहता हूं’. तब ही उन्होंने अध्यक्ष की ओर देखा और मुस्कुराकर बोले, ‘जगमोहन बोल्लन नईं देवेगा, चलो छड्डो!!’ सभागार ठहाकों से गूंज गया.

एआईकेकेएमएस के अध्यक्ष कॉमरेड सत्यवान, एआईकेएस, हरियाणा प्रधान, कामरेड इन्द्रजीत सिंह तथा हरियाणा के एक और किसा नेता ने, मौजूदा वक़्त की किसानों की एक बहुत ही ज्वलंत समस्या की ओर सभा का ध्यान खींचा. धान तथा बाजरे का न्यूनतम ख़रीद मूल्य, क्रमश: रु 2320/ तथा रु 2625 प्रति क्विंटल है. सरकार इन फसलों की ख़रीदी नहीं कर रही, और किसान, अपनी उपज को रु 1,500 प्रति क्विंटल पर बेचने को मज़बूर हैं. कई बार तो आड़ती किसी भी भाव ख़रीदने से मना कर देते हैं.

सोशल मीडिया पर एक विडियो वायरल है जिसमें हरियाणा का एक ग़रीब किसान, मंडी के गेट से बाहर, बाजरे से भरी अपनी गाड़ी में खड़ा रो रहा है; ‘मेरे बाजरे को 1,500 प्रति क्विंटल का भाव भी नहीं मिल रहा. लागत भी वसूल नहीं हो रही. मैं अपने बच्चों की फ़ीस कैसे भरूंगा, क़र्ज़ की किस्त कैसे चुकाऊंगा!!’

ग़रीब किसान परिवार द्वारा अपने खून-पसीने से उपजाया यह अनाज, जैसे ही उसके हाथ से निकलकर, व्यापारी के गल्ले में पहुंच जाएगा, वैसे ही उसके भाव दो गुने हो जाएंगे. उपभोक्ता को ये अनाज 50 रु प्रति किलो की थैलियों में ही मिलेगा. आज भी फ़रीदाबाद में बाजरे का भाव रु 44 प्रति किलो है. पूरे सीजन, भूखा प्यासा, पसीने में लथपथ किसान परिवार, मंहगे बीज, खाद, बिजली, डीज़ल लगाकर 1,500 रु प्रति क्विंटल भाव पा रहा है. व्यापारी उसे ख़रीदकर, चंद महीने स्टॉक करेगा और रु 3,500 प्रति क्विंटल मुनाफ़ा कमाएगा !! क़र्ज़ ना भर पाने वाला किसान क्यों खुदक़शी कर रहा है ? अडानी, सारी कृषि-उपज ख़रीदने को क्यों जीभ लपलपा रहा है ? इन सवालों के उत्तर जानना कोई राकेट साइंस नहीं है.

हर फ़सल के ख़रीदी सीजन में, किसानों की सक्षम हस्तक्षेप कमेटियां बनें, और एमएसपी की गारंटी हांसिल करने के लिए निर्णायक संघर्ष छिड़े, इस बात पर सभी वक्ताओं की सहमति नज़र आई. अगले महीने, 26 नवंबर को, किसान आंदोलन को शुरू हुए 4 साल पूरे हो जाएँगे. उस दिन को बहुत ही ख़ास अंदाज़ में मनाया जाए, इस बात पर सभी सहमत थे, लेकिन उसके तौर-तरीक़े पर अलग मत थे. कुछ किसान नेताओं का कहना था कि जिलेवार प्रोग्राम लिए जाएं, जबकि कुछ, उस कार्यक्रम को प्रदेश स्तर पर, बहुत बड़े अंदाज़ में करने के पक्ष में थे, जिससे वह सारे समाज को नज़र आए.

समार्ट मीटर के नाम पर, बिजली बिल बढ़ाने के फर्ज़ीवाड़े को भी निशाने पर लेने का, किसानों ने ऐलान किया. किसानों की सबसे बड़ी जत्थेबंदी के प्रधान, जोगिन्दर सिंह उग्राहाँ ने बताया कि उनके संगठन से जुड़े, पंजाब और हरियाणा के किसान, 26 नवंबर को इकट्ठे मनाएंगे, और उस कार्यक्रम में दूसरे किसान, मज़दूर संगठनों को भी शामिल किया जाएगा. उन्होंने ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ को भी उस कार्यक्रम में शिरक़त करने का न्यौता दिया है, जिसे मोर्चे ने स्वीकार कर लिया है. किसान-मज़दूर एकता को व्यापक और मज़बूत बनाना; पहला एजेंडा है.

13 महीने चले ऐतिहासिक किसान आंदोलन में भी मज़दूरों की प्रभावी भागीदारी थी. देहात में तो किसानों और भूमिहीन किसान- पशुपालक- मज़दूरों, खेत-मज़दूरों में अंतर करना संभव ही नहीं. उस आंदोलन की आभासी जीत ने, जो अब अर्थहीन हो चुकी है, किसानों को एक अहम सबक़ सिखाया है; किसान आंदोलन में, हर स्तर पर, मज़दूरों की सक्रिय भागीदारी के बगैर, स्थाई और मुकम्मल जीत असंभव है. वैसे भी 90% छोटे, सीमांत किसानों और मज़दूरों में अंतर ही कहां रह गया है.

एक-दो जत्थेबंदियों का यह तर्क कि किसान आंदोलन, किसानों का ही आंदोलन रहना चाहिए, जिसमें मज़दूरों को भी भागीदारी की छूट रहे; सभा द्वारा ध्वनी मत से ना-मंज़ूर कर दिया गया. मध्य प्रदेश के किसान नेता, सुनीलम ने, सभा में सहमति बने मुद्दों को बताते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि किसानों के अलावा, खेत मज़दूरों, पशु-पालकों, मछली-पालकों आदि सभी मेहनतक़श तबक़े को किसान आंदोलन में सहभागी बनाया जाएगा. ‘किसान एकता केंद्र’ के कॉमरेड प्रवीण ने भी किसान-मज़दूर एकता के महत्त्व को रेखांकित किया.

इस बात पर भी ज़ोर दिया गया कि जैसे एसकेएम की राष्ट्रीय कमेटी व्यवस्थित रूप से काम कर रही है, उसी तरह राज्य इकाईयां भी काम करें, यह ज़िम्मेदारी भी एसकेएम के केंद्रीय नेतृत्व की ही है. साथ ही, एक और बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे पर सहमति बनी. केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ ही, मज़दूरों में काम कर रहे, अन्य छोटे संगठनों को भी आंदोलन का सहभागी बनाया जाएगा. सभी को शामिल करते हुए, जिला स्तर पर कमेटियां बनेंगी जिससे केंद्रीय स्तर पर लिए गए हर फैसले को सही माने में कार्यान्वित किया जा सके.

किसान भूले कुछ नहीं. लखीमपुर खीरी का दर्द आज भी उसी तरह महसूस करते हैं. उसके लिए क़ानूनी विशेषज्ञों, वकीलों की कमेटी बनाना चाहते हैं, जिसमें प्रशांत भूषण को भी शामिल किए जाने पर सहमति बनी. एक मुद्दा लेकिन अधूरा रहा. पंजाब के एक किसान नेता ने पंजाब में खेती कार्य करने आने वाले, प्रवासी मज़दूरों और किसानों के बीच संघर्ष का मुद्दा उठाया, लेकिन वह, वहीं दब कर रह गया. किसानों को, हर मेहनतक़श तबक़े, हर मज़दूर को अपना साथी मानते हुए, अपने साथ जोड़ना पड़ेगा, भले वे किसी भी सूबे के क्यों ना हों. तब ही उनका आंदोलन, अखिल भारतीय तथा मेहनतक़श-वर्गीय स्वरूप ले पाएगा. उसके बगैर मेहनतक़श किसान-मज़दूर की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त नहीं हो पाएगा.

देश के लगभग सभी राज्यों से आए, 60 प्रतिनिधियों ने सभा में बहुत सक्रिय भागीदारी की, जिससे साबित हुआ कि किसान आंदोलन राष्ट्रीय स्वरूप ले चुका है. यह तहरीक़ बहुत दूर तलक जाने की संभावनाएं रखती है. दर्शन पाल, कृष्णा प्रसाद, उमेश सिंह, प्रवीण कुमार, दिनेश कुमार, डॉ सुखदेव सिंह, आशीष मित्तल, अफ़लातून अफ़लू, अशोक पेठा, शशिकांत, राजिंदर सिंह अशोक प्रसाद, धीरज गाबा आदि ने सभा को संबोधित किया. आगामी 26 नवंबर को मोदी सरकार को दो टूक शब्दों में कहा जाएगा कि किसानों की मांगों को मान लेने के लिए आपके पास 5 महीने का वक़्त है. आप यदि ये भाषा समझ नहीं आई, तो शहीद-ए-आज़म भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव के शहादत दिवस 23 मार्च से दिल्ली की ओर कूंच करने का फ़ैसला लिया जाएगा.

सभा का हांसिल-ए-महफ़िल और सबसे आनंददायक लमहा था, साथी बल्ली सिंह चीमा द्वारा गाया गया, उनका एक ताज़ा क्रांतिकारी गीत –

‘हमारा नरक सा जीवन गया यूं भी है और यूं भी
दिया है हमको क्या उसने जो हमसे छीन लेगा वो,
अमीरों का ख़ुदा हमसे खफ़ा यूं भी है और यूं भी
हरापन मर नहीं सकता, हरे को मारने वालो,
तुम्हें दिखता नहीं जंगल, हरा यूं भी है और यूं भी
अमीरों का ख़ुदा हमसे ख़फा यूं भी है और यूं भी …..

  • सत्यवीर सिंह

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