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Home गेस्ट ब्लॉग

‘सप्ताह में 90 घंटा काम करो…अपनी नहीं दूसरे की बीबी को निहारो’

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 12, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
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चेयरमेन साब की ख़ुद की सैलरी 51 करोड़ है पिछले साल की. अपने कर्मचारियों, सॉरी मज़दूरों से 5434.57 गुना ज़्यादा. ज्ञात-अज्ञात कारणों से इनकी पत्नी इनकी सुदर्शन मुखाकृति एक दिन भी नहीं देखना चाहती तो इसकी खुन्नस यह सब पर निकाल रहे. अपनी पत्नी न निहारें, सन्डे को भी ऑफिस आएं और दूसरों की पत्नियां निहारें और लाइफ के लेंटर लगा लें. मतलब, बहुत रिस्की स्कीम है.

वैसे इस तरह की बयानबाज़ी कर चर्चा बटोरने के OG मूर्ति दम्पति हैं. बीच में स्कूटर बम वाला ओला मालिक भी आया था मार्केट में. अब ये दरअस्ल इनका बस चले तो मज़दूरों के गले में लोहे का तौक और हाथ-पैरों में बेड़ियां डालकर पीठ पर चाबुक मारकर काम कराएं. वही इनका फेटिश होता है.

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टेन कमांडमेन्ट देखी हो किसी ने, क़रीब 70 साल पहले आई थी. रैमसेस फेरो को एक नया शहर बनाकर तोहफ़े में देना चाहता है. वह फैरो का वारिस है, पर मोज़ेस ज़्यादा प्रतिभासम्पन्न, कुशल नेतृत्व-क्षमता वाले (फ़लाने जी जैसे कुशल नेत्रुत्व वाले नहीं) योग्य और जनता में लोकप्रिय हैं.

इसलिये रैमसेस अपने नम्बर बढ़ाने के लिये ग़ुलामों को दिन-रात अमानवीय स्थितियों में काम करने को मजबूर करता है लेकिन शहर बनने का काम फिर भी उसकी उम्मीद से कहीं धीमा चल रहा है. वह अत्याचार बढ़ा देता है. भूखे-प्यासे ग़ुलाम, बीमार, बूढ़े सब बिना रुके काम में जोते रखे जाते हैं. कितने ही मर जाते हैं, कितने ही मरणासन्न हैं. मोज़ेज़ जब साइट विज़िट करने जाते हैं तो उनका कलेजा कट कर रह जाता है.

एक बार को धार्मिक मिथक अलग भी रख दिये जाएं. मसीहा आने की भविष्यवाणी भूल जाएं, भूल जाएं मोज़ेज़ यहूदी हैं, रैमसेस के सगे भाई नहीं हैं, फिर भी दया-करुणा से भरा कोई भी मनुष्य दूसरे मनुष्य की यातनाएं और कष्ट देखकर द्रवित हो ही उठेगा, अगर वह पर्याप्त मनुष्य है तो, उसके लिये मसीहा या पैग़म्बर होना ही ज़रूरी नहीं.

मोज़ेज़ रैमसेस को एक फ्रेंडली एडवाइज़ देते हैं कि भाई भूखे और बीमार लोग कम काम करेंगे, धीमे बनाएंगे शहर और मरे हुए बिल्कुल नहीं. काम में क्वालिटी और तेज़ी चाहते हो तो मज़दूरों का ख़याल रखो. बेहतर ट्रीट करो उन्हें. वे अनाज के भंडार खोल देते हैं, सबको खाना-पानी मुहैया कराते हैं, बूढ़ों, बीमारों के इलाज की व्यवस्था और सभी मज़दूरों को काम के बीच ब्रेक और छुट्टी की व्यवस्था करते हैं.

आप अगर ग़ुलाम हैं तो फिर चाहे धार्मिक न भी हों, आस्तिक न भी हों, तो भी कोई आपके लिये सोचे, इतनी सुविधा दे दे, रहम का मुआमला करे, आपको जानवर की बजाय इंसान समझे, बल्कि न सिर्फ़ इंसानों बल्कि जानवरों से भी बेहतर तरीक़े से पेश आए तो आप उसे पुरुषोत्तम, मसीहा, देवता, पैग़म्बर मान ही लेंगे. यही मोज़ेस के साथ हुआ.

इससे पहले किसी ने उन ग़ुलामों की सुध नहीं ली थी. उन्हें इंसान तक नहीं समझा था इसलिये मोज़ेस आते ही छा गए, जिसे रैमसेस ने अपने लिये ख़तरे की घण्टी समझा, अपनी सत्ता हाथ में आने से पहले ही निकलती हुई महसूस की इसलिये षड्यंत्र रचे, फैरो के कान भरे कि मोज़ेस ग़ुलामों को आपके ख़िलाफ़ भड़काकर तख़्ता-पलट करना चाहता है.

जबकि वास्तविकता यह थी कि मोज़ेस ने बस वही किया जो एक सच्चा लीडर करता है. एम्पलॉइज़ को बेटर वर्किंग कंडीशन प्रोवाइड कराना, उनकी लॉयल्टी हासिल करना ताकि अल्टीमेटली प्रोडक्टिविटी बढ़े और फ़ायदा कम्पनी को ही हो. मरे-थके मज़दूर न सिर्फ़ ख़ुद दुःख और कष्ट झेलेंगे बल्कि प्रोडक्ट की क्वालिटी और क्वांटिटी दोनों डेमेज ही करेंगे.

वैसे सुना है, चेयरमैन साब के पास केंद्र की योजना जल शक्ति मिशन का अरबों रुपये का टेंडर है और ये कॉन्ट्रैक्टर्स से काम कराकर पइसा न देने के लिये भी कुख्यात हैं. लेकिन चूंकि फ़लाने जी के क़रीबी हैं तो सुब्बू भाई के आगे कोई कुछ बोल सकता है क्या, सुब्बू भा…ई…!

वैसे भी इन तमाम पर उपदेश कुशल बहुतेरों के गिरोह की पड़ताल करेंगे तो भ्रष्टाचार, बेईमानी के पुरातन पापी ही पाएंगे इनको. शक्ल नहीं लगा रही, नहूसत टपक रही है उससे. इनको कौन ही निहारेगा. अब जिनके पास निहारने का ऑप्शन भी नहीं होता, उनका 18-18 घण्टे काम करना समझ भी आता है.

  • नाज़िया ख़ान

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