Monday, September 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

परलोक सुधारने गए, परलोक सिधार गए

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 5, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
Subrato Chatterjeeसुब्रतो चटर्जी 

कुंभ में मृतकों की संख्या छुपाई जा रही है. कौन सा क्रिमिनल अपने अपराधों की सूची को सार्वजनिक करता है ? क्या सुप्रीम कोठा कुंभ के सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग मंगवाकर सुनिश्चित करेगा कि वास्तव में कितनी मौतें हुईं हैं ? कभी नहीं. क्योंकि ऐसा करने पर क्रिमिनल लोगों और न्यायपालिका के नेक्सस पर चोट पहुंचेगी.

मैं यह देख कर हैरान हूं कि भारत के शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे हुए अफ़सरों और न्यायाधीशों की क्या दुर्गति हो गई है. यहां पर मैं क्रिमिनल लोगों की सरकार की बात नहीं कर रहा हूं क्योंकि केंद्र से लेकर भाजपा शासित राज्यों तक जो भी शीर्ष पद पर बैठे हैं, सारे या तो क्रिमिनल हैं या भंडुवे.

You might also like

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

जनता अनपढ़ हो सकती है, अंधविश्वासी और क्रिमिनल पूजक हो सकती है. जनता को जिस हाल में शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक हालात में स्वतंत्रता के बाद से आज तक रखा गया है, उससे उसका दोष बहुत ज़्यादा नहीं है.

असल दोषी हमारे प्रशासनिक अधिकारी और न्यायपालिका ही है. पुलिस जन्मजात करप्ट है, इसलिए उसकी बात करना बेकार है. दोषी वे हैं जो संविधान प्रदत्त अधिकारों के तहत नेताओं और जनता के अधिकारों के बीच check and balance का काम करते हैं. न्यायपालिका भी इसी दायित्व को निभाने के लिए बनी है. चुनाव आयोग और सीएजी जैसी संस्थाओं का भी यही काम है, लेकिन सब के सब मर चुके हैं.

बात ज़मीर जागने की नहीं है. भारतीय प्रशासन और न्यायपालिका का ज़मीर भारत का संविधान है, न कि कोई व्यक्तिगत चीज़. दरअसल, समस्या दूसरी जगह पर है. भारत का संविधान पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ एक उद्घोषणा है, भले ही वह सांकेतिक ही क्यों न हो, और विकृत, आवारा पूंजीवादी दौर में हमारी न्यायपालिका और ब्यूरोक्रेसी को यह अपने वर्ग स्वार्थ में नापसंद है.

इन हालातों में संविधान की रक्षा करने की राहुल गांधी की लड़ाई को बहुत कम समर्थन मिलने की संभावना है. आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस की लड़ाई को समर्थन मिल रहा है, लेकिन वह भी तभी तक मिलेगा जबतक न कांग्रेस सत्ता में आ जाए. जिस दिन कांग्रेस सत्ता में आ जाएगी, उसी दिन से यही लड़ाई उस पर भारी पड़ जाएगी क्योंकि कांग्रेस के पास कोई ठोस आर्थिक नीति नहीं है. कांग्रेस पांच किलो राशन के बदले युवाओं को बेरोज़गारी भत्ता देने की बात करती है, लेकिन पूंजी के विकेंद्रीकरण की बात नहीं करती है.

असल लड़ाई समाजवादी विचारधारा और पूंजीवादी विचारधारा के बीच है, जिसे detract करने के लिए अलग-अलग पूंजीवादी खेमे अलग-अलग alternative समय समय पर पेश करती है. फिर भी यह तो कहा ही जा सकता है कि कांग्रेस भाजपा की तरह क्रिमिनल, हत्यारों, रेपिस्ट और लुटेरों का निर्लज्ज गिरोह आज भी नहीं है. शायद इसके पीछे इसकी आज़ादी की लड़ाई की विरासत है जो कि नंगे और लंपट संघियों के पास नहीं है.

आज के समय में देश को इसलिए कांग्रेस की ज़रूरत है. संभव है कि सत्ता मिलने के बाद कांग्रेस अपनी पुरानी पूंजीवादी नीतियों को तिलांजलि देकर नये समाजवादी नीतियों को लागू करे. फिर भी कांग्रेस का सबसे बड़ा दायित्व इन क्रिमिनल लोगों को बिना ट्रायल के उपर से नीचे तक सरेआम फांसी देना होगा. क्या कांग्रेस ऐसा कर पाएगी ?

जिस तरह से गंगा के तट पर हज़ारों कोरोना के शिकार लोगों के शव गाड़ देने के एवज़ में गोबरपट्टी ने भाजपा को यूपी में दुबारा जीता दिया, ठीक उसी तरह से, मुझे पूरा विश्वास है कि कुंभ में हज़ारों अपनों को खोने वाले पुनः क्रिमिनल लोगों की सरकार ही चुनेंगे. मृतकों के प्रति जब उनके परिजनों के मन में ही कोई संवेदना नहीं है तो हम घड़ियाली आंसू बहा कर क्या कर लेंगे ?!

यह देश स्वैच्छिक ग़ुलामों का है और ग़ुलामी पसंद जनता संगठित प्रतिरोध नहीं कर सकती है. मोदी के पिछले दस सालों में क़रीब पच्चीस करोड़ नये ग़रीबों को पैदा किया गया है. लोग नोटबंदी, तालाबंदी और जीएसटी की मार से मरते रहे और अपनी नौकरियां खोते गए. आप जिन अस्सी करोड़ लोगों को लाभार्थी कहते हैं, दरअसल वे सही मायने में भिखार्थी बनाए गए हैं.

फिर भी जनता सड़कों पर नहीं उतरती है. इसका सीधा मतलब यह है कि जनता अपने को जानवरों और भिखारियों से ज़्यादा कुछ नहीं समझती है. धर्म और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर संपूर्ण गधत्व को प्राप्त जनता को संपूर्ण लंपटत्व को प्राप्त सरकार, संपूर्ण कुकुरत्व को प्राप्त मीडिया और संपूर्ण बेकारत्व को प्राप्त युवा पीढ़ी ही मिलती है. इतिहास में इसका कोई अपवाद नहीं है और न कभी मिलेगा.

आज मैं मुतमइन हूं कि इस देश की जनता की लड़ाई नहीं लड़नी चाहिए, इनको मरने के लिए ही छोड़ देना चाहिए. कम से कम दुनिया के मानचित्र से सबसे ज़्यादा बेगैरत लोगों की संख्या तो बहुत कम हो जाएगी. बिना जनविरोधी हुए भी मुझे ऐसी जनता के मुंह पर सिर्फ़ थूकने का मन करता है.

Read Also –

कुलीन कुंभ के अंदर – कोई भीड़ नहीं, कोई अराजकता नहीं, केवल वीआईपी संगम, 5-सितारा आध्यात्मिकता
यह कुंभ है, महाकुंभ नहीं है योगी-मोदी
कुंभ बनाम यूरो कप में भीड़ का विवाद और मीडिया
महाकुम्भ : जो संस्कृति तेजी से बदलते हुये समय में हमें बचा न सके, उसे बचाने की कोई आवश्यकता नहीं है 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate

Previous Post

कुलीन कुंभ के अंदर – कोई भीड़ नहीं, कोई अराजकता नहीं, केवल वीआईपी संगम, 5-सितारा आध्यात्मिकता

Next Post

माओ त्से-तुंग की चुनिंदा कृतियां : चिंगकांग पर्वतों में संघर्ष

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

by ROHIT SHARMA
September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

by ROHIT SHARMA
August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

by ROHIT SHARMA
August 27, 2026
Next Post

माओ त्से-तुंग की चुनिंदा कृतियां : चिंगकांग पर्वतों में संघर्ष

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

विकास का दावा और कुपोषण तथा भूख से मरते लोग

October 4, 2018

ये बचाएंगे

January 26, 2021

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

August 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बारे में संक्षिप्त जानकारी

August 26, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.