Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

सरकार और समाज दोनों में एक स्थाई कॉन्फ्लिक्ट है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 24, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
सरकार और समाज दोनों में एक स्थाई कॉन्फ्लिक्ट है
सरकार और समाज दोनों में एक स्थाई कॉन्फ्लिक्ट है (चित्र- बेस्टिल का पतन)

सरकार और समाज दोनों में एक स्थाई कॉन्फ्लिक्ट है. समाज बदलाव चाहता है. लोगों की बेहतरी, उसके जीने की परिस्थितियों में लगातार बदलाव, स्तर में ऊंचाई के लिए नियमित अपडेशन पर निर्भर है. तो उसके सवाल, अपेक्षाएं, डिलीवरेबल्स बदलते रहते हैं. जो डिलीवर सरकार को करना है. आसान काम नहीं, तो सरकार जनता की मनोस्थिति पर ही नियंत्रण चाहती है.

नई अपेक्षाओं का प्रसार, और उसके संघर्ष को धीमा रखना चाहती है. या कहें, सरकार यथास्थिति को बरकरार रखना चाहती है. बदलाव की चाह, और यथास्थिति बनाये रखने की कोशिश, इन दो पाटों के बीच वक्त चलता है. यह बात देशी, विदेशी, लोकतांत्रिक, तानाशाही, संवैधानिक या रॉयल किंगशिप-हर तरह की गवर्मेंट, हर दौर पर लागू है. बदलाव की कोशिश के दो टूल है.

You might also like

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

पहला है- संचार माध्यम : विचार प्रवाह के लिए एक दौर में मजमें और बैठकें होती. बदलाव का आकांक्षी घूम घूमकर लोगों से सीधे बात करता- वन टू ग्रुप या वन टू वन, जिसे उनके चेले, किताबों या साहित्य के माध्यम से प्रकाशित कर लोगों तक पहुंचा देते.

ईसा, वुद्ध, नानक सबने यही किया. वे बदलाव के मीडिया थे. लेकिन बाबे, पादरी, मदारी जिन्हें सौ लोग बैठकर सुने, वे भी संचार का माध्यम थे. मार्टिन लूथर जैसों को छोड़ दें, तो ये ठहराव का मीडिया होते.. राज्य पोषित. उनका इंस्टिट्यूशन, रेजीम से चंदे पर ही चलता. वे भटकाव भी करते ताकि लोग, बदलाव की इच्छा को वह अपनी किस्मत, ईश्वर, और रेजीम के चरणों मे तिरोहित कर दें.

दौर बदला, अखबार, टीवी, सोशल मीडिया संचार के टूल्स हुए. यहां भी इसमें बदलाव का मीडिया और ठहराव/भटकाव का मीडिया- दो भाग हैं.

बदलाव का दूसरा टूल है संगठन : सबसे मजबूत संगठन सरकार के पास होता है. फौजी/पुलिस संगठन. यह डंडा है. और सिविल प्रशासनिक संगठन. जहां पैसा है. जो टैक्स वसूल, इन संगठनों का खर्च निकालता है. मंत्री, सूबेदार, जिलेदार, लम्बरदार, जमींदार..धन लेकर सत्ता को सपोर्ट करते हैं. ताकत और कानून के जरिये, बदलाव रोकते, यथास्थिति बनाये रखते हैं.

उधर जनता के पास संगठन बनाने, चलाने का कोई तरीका नहीं सिवाय (1) विचारधारा (2) धर्म के. ये 2 ऐसे तत्व है, जिससे जनसंगठन बन सकता है.

पर विचारधारा से सबका माइंडसेट बदलना कठिन है. फ्लॉलेस फलसफे, नियम, संयम और आचार व्यवहार सुनिर्धारित करना, लोगों को उसमे फिट होने को प्रेरित करना दुरूह है. कम लोग कर पाए. आसान तो है बदलाव को धार्मिक मोटिव, ईश्वरी मैंडेट बताना. रेस, रंग, भाषा के आधार पर संगठित करना. किसी का डर दिखाना.

जब जनसंगठन पैदा होते है तो रेजीम को भय होता है. ईसा से तेगबहादुर तक, गांधी से विपक्षी राजनैतिक दल तक…भिंडरवाले से अलकायदा तक, ये संगठन, उसके सदस्य, नेतृत्वकर्ता, सरकारों के लिए खतरा होते हैं.

तो दो बातें समझ ली आपने. पहला- सरकार और समाज में एक स्थाई कॉन्फ्लिक्ट होता है. दूसरा- बदलाव की के दो टूल है. संचार माध्यम और संगठन.

अंग्रेज बुद्धिमान थे. तो पुलिस एक्ट, IPC पैनल तो बहुत बाद बाद 1860, 1861 में लाये. 1799 में वे प्रेस सेंसरशिप एक्ट लाये. 1860 में सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट. ढाई साल पहले, वहाबियों के संगठन ने कम्पनी राज उखाड़ फेंका था. अब क्राउन खुद सत्ता सूत्र हाथ में ले चुका था. रिस्क नहीं लेना था.

अब संगठन बनाना है, तो उसके लीडर, मेंबर, ऑफिस, पते सब बताओ. उसके नियम, उद्देश्य, पर्पज एप्रूव कराओ, उसके खर्चे, चंदे, का सालाना ब्यौरा पेश करो. यह कानून तब से आज तक लागू है. सब पर लागू है. आजादी के बाद की सरकारें एक संगठन पर यह कानून लागू करने में फेल रही. उसका नतीजा सामने है.

पैसे का स्रोत मायने रखता है. आधुनिक दौर में करेंसी, या ट्रांसफर के जरिये एक देश से दूसरे देश में धन भेजना आसान है. विदेशी ताकतें, इन संगठनों का इस्तेमाल, घरेलू शासन को अस्थिर करने को कर सकती हैं.

इंदिरा को इमरजेंसी पूर्व हुए अराजक आंदोलन में विदेशी धन लगे होने के प्रमाण थे. आज वे प्रमाण, सार्वजनिक हो चुके हैं. पर तब, यह एक घिरे हुए नेता का उल जलूल आरोप जैसा प्रतीत होता था. फिर भी इंदिरा एक एक्ट लाई. फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट. कोई भी संगठन, विदेशी धन लेने के लिए सरकार से अनुमति लेगा. एक पंजीयन कराएगा.

खास खाते में ही राशि लेगा. जिसका नम्बर सरकार के पास होगा. विदेशी धन के खर्च का सालाना हिसाब देगा. साथ ही बैंक भी उसे वेरिफाई करेगा. ऐसा न करने पर बड़े खतरनाक सजाये थी. इसमें नियम है कि राजनीतिक उद्देश्यों के लिए विदेशी धन नहीं लिया जा सकेगा. 2010 में इसमें प्रावधान और कड़े हुए. नए जमाने के धन विनिमय के तौर तरीकों के अनुसार यह अपडेट हुआ. भारत में विदेश से धन लेना, छुपा लेना इतना आसान नहीं है.

USAID एक चैरिटेबल संस्था है. इसकी आड़ में वे खेल खेलते हैं, यह भी सच है. लेकिन भारत में जैसे कानून और सिस्टम है, सरकार मिनट में किसी का कच्चा चिट्ठा सामने रख सकती हैं. एक रुपये की बेईमानी है, तो जेल भेज नेता का करियर खत्म कर सकती है.

कांग्रेस पर विदेशी धन लेने के आरोप वैसे ही हैं, जैसे राहुल गांधी पर एक सांसद को धक्का देने का आरोप. धक्के की बात जोर शोर से चलाई जाती है, पर सीसीटीवी के फुटेज नहीं दिखाये जाते. झूठ पकड़ा जो जाएगा.

बहरहाल, यह भी एक भटकाव है. वर्तमान से ध्यान हटाने के लिए, पीछे औरंगजेब और सम्भाजी हैं. तो आगे 2047 का सपना…वर्तमान की बात में फंसा जा सकता है. आखिर 2022 में किसान की आय दोगुनी नहीं हुई, 2023 में सबको अपना घर मिला नहीं. तो अब लक्ष्य 2047 है. उस वक्त तक फेलियर पर सवाल करने को न मौजूदा वोटर रहेगा, न जवाब देने को नेता.

लेकिन सवाल करना, उम्मीद रखना, जवाब मांगना मानवीय धर्म है, सामाजिक कर्तव्य है. इंसानी बेहतरी, उसके जीने के हालात में उठाव व्यवस्था के नियमित अपडेशन पर निर्भर है और इसलिए, सरकार और समाज…में एक स्थाई कॉन्फ्लिक्ट है.

  • मनीष सिंह 

Read Also –

 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लॉग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate

 

Previous Post

हिंदी-उर्दू विवाद: ‘फूट डालो, राज करो’ का एक और प्रयास

Next Post

आभाषी अमीरी

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

आभाषी अमीरी

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

नीतीश कुमार की बेचारगी और बिहार की सत्ता पर कब्जा करने की जुगत में भाजपा

April 1, 2022

Rhetoric and Reality

January 21, 2024

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.