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पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सामाजिक राजनैतिक माहौल की एक झलक : अतीत और वर्तमान

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 3, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
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हिमांशु कुमार, सामाजिक कार्यकर्त्ताहिमांशु कुमार

उत्तर प्रदेश पुलिस की एक टीम पौने बारह से 1:00 बजे तक मेरे कमरे में रही है. धर्म, जाति, बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म सभी पर अच्छी चर्चा हुई. वह धर्म और जाति पर मेरे विचारों से नाराज थे. मैं उन्हें संविधान की बात बताता रहा. अभी गुड नाइट बोलकर गए हैं.

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कल रात पौने बारह बजे उत्तर प्रदेश पुलिस के दो सिपाही जौनपुर नगर में स्थित मेरे हिंदी भवन के कमरे पर आए जहां में साइकिल यात्रा करते हुए ठहरा था.

उन्होंने पूछा – ‘आप अर्बन से आए हैं क्या ?’

मैंने कहा – ‘नहीं यह यात्रा दिल्ली से आई है.’

वे चले गए. मैं समझ गया यह मेरे ही लिए आए हैं क्योंकि किसी ने इन से कहा होगा कि कोई अर्बन नक्सल यहां आया हुआ है. थोड़ी देर बाद वे फिर आए और बोले –

‘रजिस्टर में आपका पता हिमाचल का लिखा है.’

मैंने कहा – ‘मैं हिमाचल में रहता हूं लेकिन यह यात्रा दिल्ली से आई है.’

उन्होंने अपने साहब से फोन पर बात की और फिर नीचे चले गए. 15 मिनट बाद फिर से दरवाजा जोर-जोर से खटकाया गया. मैंने उठकर देखा तो इस बार 5 – 6 लोग थे. साथ में तीन स्टार वाले एक वर्दीधारी अधिकारी श्री मिथिलेश कुमार मिश्रा भी थे.

उन्होंने बातचीत शुरू की. फिर उन्होंने कहा – ‘इधर से जाने का आपका रूट ही नहीं बनता. आपको बनारस से सीधे अयोध्या जाना चाहिए था.’

मैंने हंसते हुए पूछा – ‘क्यों इधर से जाना गैरकानूनी है क्या ?’

तो वह देर तक मुझे देखते रहे.

उन्होंने मुझे फेसबुक की आईडी पूछी और उस पर बोधगया आंदोलन का वीडियो देखकर बोले – ‘आप बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे हैं और हिंदू धर्म का विरोध कर रहे हैं ?’

मैंने कहा – ‘बोधगया बौद्धों का है. मैं न्याय का पक्ष ले रहा हूं. किसी धर्म का विरोध नहीं कर रहा.’

मैंने कहा – ‘अगर मैं कोई गैर कानूनी काम कर रहा हूं तो आप मुझे अरेस्ट कर लीजिए.’

वे देर तक मुझे देखते रहे और फिर उन्होंने अपने साहब को फोन करके बताया कि मैं हिंदू धर्म का विरोध कर रहा हूं. मुझे मालूम नहीं उनके साहब ने उन्हें क्या आदेश दिया. इसके बाद कि बातचीत में उन्होंने आरक्षण का विरोध किया और कहा कि ‘बाबा साहब के कारण भारत में जातिवाद है.’

मैंने उन्हें बताया कि आरक्षण को एफर्मेटिव एक्शन कहा जाता है जो सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए जरूरी है और जाति बाबा साहब से भी पहले और भारत का संविधान बनने से भी पहले मौजूद थी लेकिन वह सहमत नहीं हुए.

तब मैंने उन्हें याद दिलाया कि आरक्षण की व्यवस्था संविधान में की गई है और एक पुलिस अधिकारी को संविधान का पालन करना है.

उन्होंने यह भी कहा कि गांधी की सबसे बड़ी गलती यह थी कि उन्होंने मुसलमानों को भारत में ही रखा. उन्हें मुसलमानों से कह देना चाहिए था कि जब तुम्हारा अलग देश बन गया तो तुम सब पाकिस्तान में जाओ.

उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान में मुसलमानों ने हिंदुओं को खत्म कर दिया है. आधा प्रतिशत भी नहीं बचे हैं.

मैंने कहा – ‘आपकी जानकारी का स्रोत बताइए या आप व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ज्ञान से अपनी राय बनाते हैं ?’ तब वे चुप हो गए.

उन्होंने मेरा फोन नंबर नोट किया और सुबह मेरे यहां से अगले पड़ाव पर निकलने का समय और अगले पड़ाव की जानकारी ली और चले गए.

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अभी-अभी अगले पड़ाव वाले पुलिस वालों का फोन आया. मुझसे पूछ रहे थे कल सुबह आप कितने बजे निकलेंगे ? कितने बजे पहुंचेंगे ? किसके घर में ठहरेंगे ?

मैंने हंसते हुए कहा – ‘अभी कुंभ में उत्तर प्रदेश में पूरे भारत से 67 करोड लोग आए लेकिन सरकार को कोई चिंता नहीं हुई. लेकिन एक 60 साल का आदमी खादी का कुर्ता पजामा पहन कर साइकिल पर सद्भावना की बात करते हुए गुजर रहा है तो पूरी सरकार उसके आगे पीछे होने लगी. क्या बात है ?’

उन्होंने मेरी बात अनसुनी कर दी और बोले मैं आपको दोबारा फिर फोन करूंगा.

अभी मैं गांव में महिलाओं के बीच बातचीत करने आया तो वहां स्थानीय महिला कार्यकर्ता को फोन आया और पूछ रहे थे खाना कहां खाएंगे, खाने में क्या खायेंगे, कितने बजे वहां से निकलेंगे ? मेरी इतनी चिंता तो मेरी मां ने भी नहीं की.

अभी भी जहां ठहरा हूं, बाहर सिपाही सादी वर्दी में तैनात हैं.

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अपने चाचा जी के पास बैठा था. वो पुराने किस्से सुनाने लगे. चाचा जी ने मुझे बताया कि सन चालीस के लगभग की बात है. एक बार तेरे दादा जी मुज़फ्फरनगर में घर के सामने बैठे थे, तभी दुल्ला कसाई एक लंगड़ी गाय लेकर जा रहा था.

हमारे घर की भैंस कुछ दिन पहले मर चुकी थी. घर में दूध की दिक्कत थी. दादा जी ने आवाज़ लगा कर कहा – ‘अरे कितने में लाया भाई इस गाय को ?’

दुल्ला ने कहा – ‘जी दस में लाया.’

दादा जी ने कहा – ‘ले, ग्यारह रुपये मुझ से ले ले और गाय यहां बांध दे.’

कुछ महीनों की खिलाई पिलाई से गाय बिल्कुल स्वस्थ हो गई. फिर वह ग्याभन हुई और दस लीटर दूध देने लगी.

मैने चाचा जी से पूछा – ‘क्या तब गाय काटने पर हिन्दु कोई झगड़ा नहीं करते थे ?’

चाचा जी ने बताया – ‘झगड़े का कोई सवाल ही नहीं था.’

ये उनका खाना था, वो खा सकते थे. हिन्दु कसाई भी थे. वो खटीक कहलाते थे. मुस्लिम लीग का हेड आफिस मुज़फ्फरनगर था. उनका चुनाव चिन्ह बेलचा था. लोग उन्हें बेलचा पार्टी कहते थे. तो उस गाय ने बछिया को जन्म दिया.

घर में सफाई के लिये आने वाली जमादारिन ने हमारी दादी से कहा चाची जी ये बछिया मुझे दे दीजिये. दादी ने कहा खोल ले और ले जा. वो बछिया वहां उनके घर पर ब्याह गई और एक दिन में पन्द्रह लीटर दूध देने लगी.

एक दिन मैं और अब्बा जी शामली अड्डे से घर की तरफ आ रहे थे. हमारे सब से बड़े ताऊ जी को पूरा शहर अब्बा जी के नाम से जानता था.अब्बा जी वकील थे. स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानी थे उनके मुंशी मुसलमान थे.

उनका बेटा हमारे ताऊ जी को अब्बा जी बोलता था. उनकी देखा देखी घर के सारे बच्चे उन्हें ‘अब्बा जी’ कहने लगे. रास्ते में अब्बा जी को जमादारिन ने रोक लिया, और बोली – ‘पन्डत जी जो बछिया आप से लाई थी, उसका दूध पी के जाओ.’

मैनें उत्सुकतावश पूछा – ‘क्या अब्बा जी ने वहां दूध पिया ?’

चाचा जी ने बताया – ‘हां. वो गांधी जी का ज़माना था. आज़ादी की लड़ाई में लगे लोगों के लिये जात पात और हिन्दु मुसलमान का भेदभाव मिटाने का बहुत जोश था.

चाचा जी आगे सुनाते रहे. सन् पचपन की बात है. मुझे ऊन का कताई केन्द्र शुरू करने के लिये रुड़की के पास मंगलोर भेजा गया. वहां पास में एक मुसलमानों का गांव था. गांव में बस एक हिन्दु बनिया था, जो दुकान चलाता था.

गांव के प्रधान एक मुस्लिम थे. मुस्लिम प्रधान ने चाचा जी से कहा – ‘पंडत जी कहो तो आपके रहने खाने का इंतज़ाम बनिये के यहां करवा दूं ? मैं तो मुसलमान हूं.’

चाचा जी ने कहा – ‘आप मेरे बड़े भाई जैसे हैं. मुझे आपके घर पर रहने खाने में कोई आपत्ति कैसे हो सकती है ?’

चाचा जी वहां छ्ह महीना रहे. गूजरों के गांव में जाकर भेड़ की ऊन खरीदना और उसे गांव की महिलाओं से चर्खे पर कतवाना और उससे कंबल बनवाना उनका काम था. केन्द्र शुरू करने के छह माह बाद उनका शुरूआती काम पूरा हुआ.

गांव छोड़ते समय चाचा जी ने अपने मुस्लिम मेजबान से हाथ जोड़ कर कहा भाई साहब मेरे रहने खाने का पैसा ले लीजिये. गांव के उस मुस्लिम प्रधान ने कहा – ‘पंडत जी आपने मेरी गांव की महिलाओं को रोज़गार दिया, मेरे गांव के लोगों की खिदमत की और मुझे बड़ा भाई कह रहे हो. बताओ मैं अपने छोटे भाई से पैसे कैसे ले सकता हूं ?’ बताते हुए नब्बे साल के मेरे चाचा जी अपनी आंखों में भर आया पानी पोंछने लगे थे.

मुझे उस समय के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सामाजिक राजनैतिक माहौल की एक झलक मिली जिसे साझा करने का लोभ मैं रोक नहीं पाया और आपके साथ बांट रहा हूं.

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