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स्कूलों का विलय : देश की आबादी बढ़ रही है स्कूल बंद हो रहे हैं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 22, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
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स्कूलों का विलय : देश की आबादी बढ़ रही है स्कूल बंद हो रहे हैं
स्कूलों का विलय : देश की आबादी बढ़ रही है स्कूल बंद हो रहे हैं

‘स्कूल से थोड़े न मोक्ष मिलता हैं…मोक्ष तो कुम्भ के भव्य आयोजन से मिलता हैं’, शायद यही रामराज्य के शासन प्रणाली का मूलमंत्र हैं. यूपी सरकार ने 5,000 से अधिक स्कूलों को बंद करने की प्रक्रिया शुरू कर दी हैं. कहा जा रहा हैं कि ऐसे स्कूलों का विलय नजदीकी स्कूलों में किया जाएगा. हैं न गज्जब का स्कीम ?

शिक्षा के निजीकरण के पूंजीवादी एजेंडे को बहुत है शातिराना अंदाज में आगे बढ़ाया जा रहा हैं. आंकड़े बताते हैं कि यूपी में 2014-24 के बीच सरकारी स्कूलों की संख्या में 24.1% कमी आई, जबकि निजी स्कूल 14.9% बढ़े हैं. मतलब समझ रहें हैं न ? सरकार को तेजी से इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए कि हर 1 किलोमीटर के दायरे में स्कूल हो, पर सरकार उलटी दिशा में चल रहीं हैं.

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यूपी सरकार का यह फैसला सीधे सीधे शिक्षा के अधिकार अधिनियम का उल्लंघन हैं. शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE ) 2009 के तहत, 6-14 वर्ष के प्रत्येक बच्चे को अपने निवास स्थान से 1 किमी (प्राथमिक) और 3 किमी (उच्च प्राथमिक) के दायरे में स्कूल उपलब्ध होना चाहिए. सरकार का यह निर्णय सीधे तौर पर गरीब, दलित और वंचित बच्चों की शिक्षा को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा.

कोई भी व्यक्ति इस बात को समझ सकता हैं कि गांवों में बच्चे 3-4 किमी दूर स्कूल नहीं जा सकते. इससे बच्चों के ड्रॉपआउट का दर बढ़ सकता हैं. यह ड्रॉपआउट गरीब, वंचित, दलित, आदिवासी का सबसे ज्यादा होगा. कई गांवों में सड़कें खराब हैं, और नदी, नाले या हाईवे जैसी भौगोलिक बाधाएं परिवहन को और कठिन बनाती हैं.

सोचिए, यदि एक गांव का स्कूल बंद हो जाता है और नया स्कूल 4 किमी दूर है, तो छोटे बच्चे, विशेषकर कक्षा 1-5 के, पैदल चलने में असमर्थ हो सकते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन सीमित है, और अधिकांश परिवार साइकिल या अन्य निजी वाहनों का खर्च नहीं उठा सकते. सरकार ने परिवहन सुविधा देने का कोई ठोस वादा नहीं किया हैं.

स्कूलों का विलय और लंबी दूरी की यात्रा बच्चों और अभिभावकों के मनोबल को कमजोर कर सकती है, जिससे शिक्षा के प्रति उनका उत्साह और मनोबल उत्साह कमजोर होगा. इसके आलावा सांस्कृतिक और सुरक्षा कारणों से, ग्रामीण क्षेत्रों में माता-पिता अपनी बेटियों को दूर के स्कूलों में भेजने से हिचकते हैं, जिससे लड़कियों की ड्रॉपआउट दर बढ़ सकती है.

विदित हो कि इससे पहले राजस्थान और मध्य प्रदेश में स्कूलों का विलय किया गया था और इस विलय से ड्रॉपआउट दर बढ़ने के उदाहरण सामने आए हैं. इतना हीं नहीं, स्कूलों के विलय से माता-पिता को बच्चों के लिए परिवहन, यूनिफॉर्म या अन्य खर्चों का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ सकता है, जो उनकी आर्थिक स्थिति के लिए चुनौतीपूर्ण है. कम आय वाले परिवारों के बच्चे स्कूल छोड़कर मजदूरी या घरेलू काम में लग सकते हैं.

सरकार को पता हैं कि यूपी में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे दलित, आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से हैं. इसलिए यह सरकार स्कूलों का विलय कर एक खास एजेंडे के तहत इन समुदायों की शिक्षा तक पहुंच को सीमित कर देना चाहती हैं.

जापान में एक बच्चे के लिए वहां की सरकार ट्रेन चला सकती है लेकिन यूपी सरकार 50 बच्चों के लिए स्कूल नहीं चला सकती. क्योंकि ये बच्चें गरीब, दलित, पिछड़े और वंचित तबके से आते हैं.

सरकार को समझना चाहिए कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल न केवल शिक्षा का केंद्र होते हैं, बल्कि सामुदायिक गतिविधियों का भी हिस्सा हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल सामुदायिक केंद्र के रूप में काम करते हैं. इनके बंद होने से सामुदायिक एकता और सहभागिता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. सामाजिक ताना-बाना प्रभावित होगा. यह सरकार पूरी पीढ़ी को निरक्षर और निकम्मा बनाने पर आमादा हैं.

  • दयानन्द

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