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22 दिसंबर 2000 को ‘2 दिसंबर’ को याद करते हुए माओवादी नेता रेणुका का पत्र

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 22, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
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22 दिसंबर 2000 को '2 दिसंबर' को याद करते हुए माओवादी नेता रेणुका का पत्र
22 दिसंबर 2000 को ‘2 दिसंबर’ को याद करते हुए माओवादी नेता रेणुका का पत्र

जब मैं आपको लिख रही थी, एक और 2 दिसंबर बीत गया. मुझे यकीन नहीं हो रहा – एक और साल बीत गई. मुझे ऐसा लग रहा है जैसे 2 दिसंबर मेरे कैलेंडर में अटका हुआ है, आगे नहीं बढ़ रहा. उस रात, चावल खाते हुए, मुझे याद आई – उससे मिले हुए चार महीने हो गए हैं. उसे जल्द ही देखने के ख्याल से मेरा दिल खुशी से भर गया. मैं उसके घर गई और बैठकर समाचार देखने लगी.

पर मैंने कोई धमाका नहीं सुना, आसमान गिरते नहीं देखा. बस एक खबर सुनी. जिस शख्स के बारे में मैं टीवी के सामने बैठकर सोच रही थी… वो खबर मेरे पास बस एक याद बनकर रह गई. वो नाम जो मेरा मन हमेशा गुनगुनाता रहता था – वो नाम मैंने टीवी स्क्रीन पर देखा. फिर कुछ और सुनाई नहीं दिया. मैं चुपचाप घर चली गई. जिंदगी में पहली बार, मैंने खुद को घर में अकेली पाई. सिर्फ घर में ही नहीं – मुझे लगा जैसे मैं पूरी दुनिया में अकेली हूं. मैंने कपड़े बदले और खुद को घर में बंद करके बाहर निकल गई. पर कहां जाऊं ? किससे कहूं ? क्या कहूं ?

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आखिरकार, मैं ‘ए’ के ​​घर गई. मैं बहुत दिनों से उनके घर नहीं जा पाई थी. मुझे देखकर सब हैरान रह गए. वे मुझसे एक के बाद एक सवाल पूछ रहे थे, और मैं जवाब देती रही. काफी देर तक – रात के लगभग ग्यारह बजे तक. फिर किसी ने मुझे छुआ और कहा – ‘मुझे बुखार है !’ – दवाई लाई और पानी पिलाया. फिर मैं खुद नहीं रह पायी… और मुझमें लिखने की भी ताकत नहीं बची. मैं उस दिन के बारे में अब और बात नहीं कर सकती.

मुझे पता है तुम कब से मेरे खत का इंतजार कर रहे हो. मैंने सोचा था कि लिखूंगी, पर लिख नहीं पाई. जब लिखना शुरू किया तो मेरे सिर में बहुत दर्द महसूस हो रही थी. सोची थी कि थोड़ी देर और रोक लूं, फिर लिखूंगी. पर ये जख्म इतनी जल्दी कैसे भर सकते हैं ! जब भी मैं उसके बारे में लिखने की कोशिश करती हूं, मेरा दिल रुक जाता है. और उसके बारे में क्या लिखूं ? ऐसे लिखने की हिम्मत कहां है ?

उनसे मिलना एक चमत्कार था. यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है. अगर उनसे मिलना इतना चमत्कार था, तो उनके जीवन में शामिल होना शब्दों से परे है. जब मैंने उनसे शादी की, तो मैं थोड़ी डरी हुई थी. इतने महान नेता के बगल में खुद की कल्पना करके भी मैं असहज महसूस कर रही थी. लेकिन जैसे ही वे मेरे जीवन में आए, मेरे सारे डर गायब हो गए. मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि वे मुझसे ‘बड़े’ हैं. ऐसा लगा जैसे बचपन से मेरे साथ रहा वो लड़का… था… मैं इसके बारे में लिखना भी नहीं चाहती.

पहली बार उन्हें देखना, पहली बार उनका हाथ थामना – अब भी कितना नया सा लगता है ! सब कुछ ऐसा लगता है जैसे बहुत समय पहले ही हुआ हो. आप किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में इतनी जल्दी कैसे बात कर सकते हैं, उसे बीती बात बनाकर ? फिर भी, ऐसा नहीं हो सकता – हमारे जीवन में कई असाधारण लोगों को साधारण होना ही पड़ता है.

मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रही है. मैंने बहुत दिनों से न तो कोई खबर देखी है और न ही पढ़ी है. मैंने उन तीनों के बारे में कुछ भी लिखा, नहीं देखा. मैंने उनकी कक्षाओं के कैसेट इकट्ठा कर रखे हैं – लेकिन उन्हें सुनने का मन नहीं कर रहा. यहां तक कि उन्होंने मुझे जो खत लिखे थे… मैंने उन्हें 2 दिसंबर के बाद छुआ तक नहीं है. मुझे नहीं लगता कि मैं उन्हें पढ़ पाऊंगी. लेकिन मैं टूटी भी नहीं हूं. मैं रोती भी नहीं. मैं किसी तरह जिद करके आगे बढ़ रही हूं – बिना जख्मों को देखे, बिना उन्हें छुए.

कभी-कभी मैं खुद से पूछती हूं – आखिर हुआ क्या था ? अब तक तो हमारे बीच तीन-चार महीने की दूरी थी. अब वो दूरी और बढ़ गई है – और मेरे मरने तक रहेगी. क्या बस इतना ही ? मन से तो वो अब भी था, है, हमेशा मेरे साथ वो मेरे अंदर है. तो फिर फर्क कहां है ?

एक तसल्ली है – मेरी वजह से उसका जीवन सचमुच आनंदमय हो गया. शादी के बाद, उसका काम और भी केंद्रित हो गया – यह उसने खुद कहा था; उसने अपने पत्र में भी लिखा था. चंद्रन्ना (हमारे लिंगमूर्ति) भी कहते थे – शादी के बाद उसके अंदर शांति आ गई, गुस्सा कम हुआ, धैर्य बढ़ा. इन दो सालों में उसमें बहुत सुधार हुआ है. ‘शा’ भी यही कहती थी. जब आप सोचते हैं, तो लगता है – यही शांति है. हम कितने समय तक साथ रहे, यह मायने नहीं रखता – असली बात यही है.

उस समय क्रांतिकारी आंदोलन कितना महान और जरूरी लगता था ! वरना, ऐसे व्यक्ति को खोने का गम मैं कैसे सह पाती ? शायद अगर मैं एक साधारण गृहिणी होती, तो टूटे दिल से ही मर जाती. उस अक्टूबर में तुम्हें देखकर – मुझे और मजबूती मिली. अब मैं ज्यादा स्थिर हूं. लेकिन मैं अकेली नहीं रहती – मैं सबसे बात करती हूं, पहले से ज्यादा. मैं पहले से ज्यादा हंसती भी हूं. बस मेरा पढ़ना कम हो गया है – धीरे-धीरे बढ़ाऊंगी.

कभी-कभी मैं सचमुच अपने माता-पिता को गले लगाना चाहती हूं.

कभी-कभी मेरा मन करता है कि संतोष के माता-पिता को चिट्ठी लिखूं. बिना बताए कि मैं कौन हूं, चिट्ठी लिखने में क्या हर्ज है ? बेटा जिंदा हो या न हो – बेटे की शादी की खबर – किसी भी माता-पिता के लिए खुशी की बात होती है.

मैंने सुना है कि उन्होंने अपने घर की जमीन पर, घर के पीछे वाले रास्ते के किनारे, उसका एक स्मारक बनवाया है. पुलिस आई और सबको मदद न करने को कहा. उन्होंने उनकी मां (संतोष की मां) को बुलाया और उन्हें रुकने को कहा. लेकिन वो नहीं रुकीं. कलोजी ने 1 दिसंबर को इसका उद्घाटन किया. मुझे इससे ज्यादा कुछ नहीं पता.

हां, मैंने केंद्र बदल दिया है – जानते हो ? यहां (विशाखापत्तनम में) महिला आंदोलन बहुत कमजोर है. इसलिए मुझ पर बहुत जिम्मेदारी है. बेशक, मुझे पूरा विश्वास है कि मैं यह काम कर सकती हूं. मैं अभी तक शहर में आंदोलन की स्थिति को पूरी तरह से समझ नहीं पाई हूं. नए केंद्र में मुझे थोड़ा अकेलापन महसूस हो सकता है – क्योंकि मुझे वहां (तिरुपति में) ऐसा कभी महसूस नहीं हुई थी. सभी ने मुझे बहुत प्यार किया. उन्होंने इसे संभालने में मेरी बहुत मदद भी की.

अपने खाली समय में, मैं कंप्यूटर के सामने बैठती हूं – जो मुझे इतने लंबे समय से नहीं मिली थी. मैंने लगभग सब कुछ सीख ली है. मुझे डीटीपी भी आती है.

तुम लिख क्यों नहीं रहे हो ? तुम कभी भी शुरू कर सकते हो. मेरा भी कभी-कभी लिखने का मन करती है. मैंने हाल ही में एक कहानी लिखी है – अभी मेरे पास उसकी कॉपी नहीं है, अगर होती तो भेज देती. संतोष चाहते थे कि मैं लिखूं – तो मैं लिख दूंगी.

मैं और भी बहुत कुछ लिख सकती थी – लेकिन समय बीत गया. खैर, मैं आपके लिए यह पत्र लिख पाई – यही राहत की बात है. शायद थोड़ा उलझ गया – जब लिखने बैठी, तो तय नहीं कर पाया कि पहले क्या लिखूं. मैं फिर लिखूंगी – जब नए केंद्र का काम शुरू होगा, तो वहां के अपने अनुभव भी साझा करूंगी. क्या मैं तब तक वहां रहूंगी ? बताओ, हम कब मिलेंगे ?

प्रेम, तुम्हारा (रेणुका)

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