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और तभी से अमेरिकी सेना सुरंगों से बहुत डरती है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 15, 2026
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और तभी से अमेरिकी सेना सुरंगों से बहुत डरती है
और तभी से अमेरिकी सेना सुरंगों से बहुत डरती है

और तभी से अमेरिकी सेना सुरंगों से बहुत डरती है. कहानी उस युद्ध की है जब अमेरिका की परमाणु शक्ति को ‘फ़ावड़े-टोकरी’ की तकनीक ने पस्त कर दिया था. साल 1966. वियतनाम में साइगॉन से उत्तर-पश्चिम में क़रीब 30 किलोमीटर दूर अमेरिकी सेना ने अपना एक विशाल सैन्य अड्डा बनाया, जिसका नाम था – कु ची बेस कैंप.

चारों तरफ़ कंटीले तार, वॉच टावर, फ़्लड लाइट, टैंक, और सैकड़ों हेलीकॉप्टर. कुल मिलाकर एक अभेद्य क़िला. फिर, अमेरिकियों के लिए अचानक सबकुछ बदलने लगा. रोज़ रात को वहां सैनिकों के ऊपर मौत नाचने लगी. बैरक के भीतर धमाके होते, गोलियां चलतीं और जब तक अमेरिकी सैनिक संभल पाते, हमलावर ग़ायब हो चुके होते. न कोई सुराग़, न निशान. ऐसा लगता मानो वे भूतों से लड़ रहे हों.

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अमेरिकियों ने पूरा जंगल छान मारा, कुछ नहीं मिला. महीनों बाद एक पेट्रोलिंग टीम को झाड़ियों के नीचे एक छोटा-सा सुराख़ मिला. जब एक इंजीनियर ने रोशनी डाली, तो उसे अंधेरे में उतरती एक सुरंग दिखी. अमेरिका को तब तक अंदाजा नहीं था कि जिस बेस पर वे खड़े हैं, उसके नीचे वियतनामी लड़ाकों ने 250 किलोमीटर लंबी सुरंगों का जाल बिछा रखा है.

ये सुरंगें रातों-रात नहीं बनी थीं. वियतनामी फ़ाइटर 1940 के दशक से ही फ़्रांसीसी बम हमलों से बचने के लिए इन्हें खोद रहे थे. कु ची की मिट्टी लाल मिट्टी थी, जो सूखने पर कंक्रीट जैसी सख़्त हो जाती. वियतनामियों ने फ़ावड़े और टोकरियों से इसे खोदना शुरू किया. वे रात में खुदाई करते और मिट्टी को खेतों में बिखेर देते, ताकि ऊपर से उड़ते विमानों को कुछ पता न चले.

सुरंगें तिमंज़िला थीं. पहला लेवल ज़मीन से 3 मीटर नीचे, दूसरा 6 मीटर और तीसरा स्तर 9 मीटर की गहराई पर था. इन्हें इस तरह डिज़ाइन किया गया था कि अगर अमेरिकी सैनिक बम भी गिराते तो सिर्फ़ ऊपरी लेयर डैमेज होता, नीचे सबकुछ चलता रहा.

यहां ज़िंदगी मुश्किल थी, लेकिन क्रांतिकारी लड़ाकों ने यहां पूरी बस्ती बसा रखी थी. वहां अस्पताल थे, जहां मोमबत्तियों की रोशनी में ऑपरेशन तक किया जाता. रसोइयां थीं, जहां से धुआं सैंकड़ों मीटर दूर जाकर निकलता और हथियार बनाने के कारखाने थे, जहां वे अमेरिकी कारतूसों को ही रीसायकल किया करते.

कहा जाता है कि क़रीब 10,000 लोग इन सुरंगों में वर्षों तक रहे, लड़े, बच्चे पैदा किए, और वहीं मर गए.

हफ़्तों तक सूरज की रोशनी के बिना भी लड़ने की ज़िद पाले वे लोग अमेरिकियों को छकाते रहे.

अमेरिकी सेना ने इन सुरंगों को तबाह करने के लिए सब कुछ झोंक दिया. पहले हज़ारों टन बम गिराए, जंगल जला डाले, लेकिन सुरंगों को कुछ नहीं हुआ. ज़हरीला रसायन छिड़कर पेड़-पौधों को खाक कर दिया, सुरंगों में पानी भरा, लेकिन लड़ाकों ने इन सबकी काट निकाल ली. ज़हरीली गैस छोड़ी, पर सुरंगों की लंबाई और वेंटिलेशन ने उसे बेअसर कर दिया.

यहां तक कि प्रशिक्षित कुत्तों को भेजा गया, लेकिन वियतनामियों ने सुरंगों के मुहाने पर अमेरिकी साबुन, अमेरिकी सैनिकों के कपड़े, सिगरेट के बट और काली मिर्च रगड़ दी, ताकि कुत्तों को या तो ‘फ़्रेंडली’ गंध मिले या फिर सूंघने की शक्ति काम न करे.

हारकर अमेरिका ने एक ख़ौफ़नाक फैसला लिया. उन्होंने अपनी सेना के सबसे छोटे और दुबले सैनिकों को चुना, ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड, फ़िलिपींस से रंगरूट भर्ती किए गए. अमेरिका ने इन्हें नाम दिया ‘टनल रैट’ यानी सुरंगी चूहे. ये सैनिक सिर्फ़ एक टॉर्च और एक पिस्तौल लेकर उन 60 सेंटीमीटर चौड़ी काली अंधेरी सुरंगों में उतरते थे.

बाद के बयानों में इन ‘टनल रैट’ ने सुरंगों का ख़ौफ़नाक वर्णन किया कि कैसे वहां क़दम-क़दम पर मौत का जाल बिछा था. बिच्छुओं और ज़हरीले सांपों के मटके दरवाज़ों पर टंगे हुए थे, जो दुश्मनों के ऊपर गिर जाते. कहीं, ज़हरीले बांस के खूंटे थे, तो कहीं बारूदी सुरंगें.

अंधेरे में सैनिक को यह भी नहीं पता होता था कि उसके ठीक सामने कौन है. कई टनल रैट ने बताया कि उन्होंने अपने चेहरे के पास किसी की सांसें महसूस कीं, लेकिन अंधेरे के कारण वे कुछ देख नहीं पाए.

9 साल की जंग, अरबों डॉलर का ख़र्च और दुनिया की सबसे घातक तकनीक, सब कुछ मिट्टी में मिल गया. 1975 में जब अमेरिकी सेना हारकर वियतनाम से निकली, तब भी वे उन सुरंगों को पूरी तरह नष्ट नहीं कर पाई.

अब ये सुरंगें वहां का टूरिस्ट पॉइंट बन गई हैं, जिन्हें देखने के लिए लोग दूर-दूर से पहुंचते हैं. एक फ़ोटो सुरंग के अंदर की है और दूसरी फ़ोटो सुरंग के मुहाने का है, जहां से लोग सुरंग में उतरते हैं.

सुरंग की कहानी इसलिए सुनाई, क्योंकि ट्रंप कह रहा है कि ईरान में वह पैदल सैनिक भेज सकता है. जानकार कह रहे हैं कि ईरान ने सुरंगों का जाल बिछा रखा है. वियतनाम तो उस समय पुरानी तकनीक पर चल रहा था, ईरान के पास तो आधुनिक जख़ीरे हैं.

  • दिलीप खान

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