
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा यह युद्ध केवल दो देशों की सेनाओं की लड़ाई नहीं है. यह उस दुनिया का भयावह आईना है, जहाँ सत्ता, पूंजी, साम्राज्यवादी हित और भू-राजनीतिक वर्चस्व के खेल में सबसे सस्ती चीज अगर कोई है, तो वह है—आम आदमी की जिंदगी.
फरवरी 2022 से लेकर इस सितंबर 2026 तक यूक्रेन की धरती ने जो देखा है, वह किसी भी संवेदनशील मनुष्य को भीतर तक हिला देने के लिए पर्याप्त है.
संयुक्त राष्ट्र के सत्यापित आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 तक यूक्रेन में कम-से-कम दसियों हजार नागरिक मारे जा चुके हैं और 68 हजार से अधिक नागरिक हताहत हो चुके हैं. अकेले जुलाई 2026 में 437 नागरिक मारे गए और 2,610 घायल हुए. यह मई 2022 के बाद किसी एक महीने में नागरिक मौतों का सबसे बड़ा आंकड़ा था. उसी महीने 17 बच्चे मारे गए और 166 घायल हुए.
लेकिन आंकड़ों के पीछे इंसान हैं. वह बूढ़ी माँ है, जिसका बेटा मोर्चे पर मारा गया. वह सैनिक की गर्भवती पत्नी है, जो अपने 21 वर्षीय पति की कब्र के सामने खड़ी है. वह बच्चा है, जिसकी किताब के बीच अब पढ़ाई नहीं, बल्कि हवाई हमले की चेतावनी दर्ज है. और वह परिवार है, जिसने अपना घर, अपना शहर और अपनी आजीविका खोकर किसी दूसरे देश में शरण ली है. एक देश उजड़ रहा है.
लगभग 57 लाख यूक्रेनी शरणार्थी विदेशों में और लगभग 37 लाख लोग देश के भीतर विस्थापित थे. 2025 के UNHCR आंकड़ों के अनुसार, लगभग एक करोड़ इंसानों की जिंदगी युद्ध ने विस्थापन और अनिश्चितता में धकेल दी.
और बच्चों का क्या ?
युद्ध ने यूक्रेन के स्कूलों को भी युद्धभूमि बना दिया है. हजारों शिक्षण संस्थान क्षतिग्रस्त हुए हैं. सितंबर 2026 में नया स्कूल वर्ष शुरू हुआ तो कीव में बच्चों के स्वागत के बीच भी हवाई हमले के सायरन बज रहे थे. राजधानी में ही 318 शैक्षणिक संस्थान क्षतिग्रस्त हो चुके हैं और देशभर में हजारों बच्चे अब भी ऑनलाइन या हाइब्रिड शिक्षा पर निर्भर हैं. यानी युद्ध केवल आज के सैनिकों को नहीं मारता, बल्कि वह आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा, मानसिक शांति और भविष्य को भी घायल करता है.
और सैनिक ?
रूस प्राकृतिक संसाधनों से लेकर अपने हर क्षेत्र में इस पृथ्वी पर इकलौता महाशक्ति देश है. इस सच्चाई को स्वीकार न करने से रूस के महाशक्ति होने पर रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता. खुद नाटो खेमे का मीडिया दबी जुबान में इस युद्ध के दौरान तुलनात्मक तौर पर यूक्रेनी सैनिकों की मौतों के मुकाबले रूसी सैनिकों की मौतों को लगभग 10 फीसदी बताता है. पश्चिमी मीडिया में यह भी कहा गया है कि ज़ेलेंस्की अपने सैनिकों की मौत के आंकड़े छिपाते हैं.
ज़ेलेंस्की ने फरवरी 2026 में लगभग 55 हजार सैनिकों की मौत की बात बताई थी, जबकि एक यूक्रेनी मीडिया संस्थान ने 3 लाख 29 हजार सैन्य परिवारों और मृतक सैनिकों की विधवाओं की सूची जारी की थी. बाद में ज़ेलेंस्की प्रशासन के एक सैन्य अधिकारी ने उस मीडिया संस्थान के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए, जिसके फलस्वरूप उस मीडिया तंत्र से जुड़े कई पत्रकारों के लापता होने की खबरें सामने आईं.
अर्थात मृत सैनिकों की असली संख्या चाहे जो हो, एक बात निर्विवाद है कि लाखों परिवारों के घरों में युद्ध ने मौत, अपंगता और कभी न खत्म होने वाला गहरा दुःख पहुंचाया है.
फिर सवाल उठता है—यह युद्ध आखिर किसके लिए है?
वास्तविक दृष्टि से युद्ध को केवल राष्ट्रवाद के चश्मे से देखना अधूरा है. युद्ध के पीछे हथियार उद्योग है. ऊर्जा और संसाधनों का सवाल है. भू-राजनीतिक प्रभाव का सवाल है. बाजारों और आर्थिक हितों का सवाल है. साम्राज्यवादी शक्तियों के प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा है. और इन सबके बीच सबसे कमजोर आदमी—मजदूर, किसान, बच्चा, बूढ़ा और आम नागरिक—अपने जीवन की कीमत चुकाता है.
जो युद्ध का निर्णय लेते हैं, वे अक्सर मोर्चे पर नहीं मरते. मरता है वह नौजवान, जिसके हाथ में कल तक किताब या औजार था और आज बंदूक थमा दी गई. मरती है वह माँ, जिसने अपना बेटा खोया. मरता है वह बच्चा, जिसकी दुनिया बमों और सायरनों के बीच बड़ी होती है.
एक ज्वलंत सवाल है—क्या इस युद्ध के लिए केवल पुतिन जिम्मेदार हैं?
जवाब है—नहीं.
रूस द्वारा यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने का सैन्य आक्रमण और नागरिक क्षेत्रों पर हमले एक कठोर ऐतिहासिक और नैतिक जिम्मेदारी पैदा करते हैं. राष्ट्रपति पुतिन ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के एकाधिकार को दुनिया से खत्म करने का साहस उठाया. नतीजतन, आज दुनिया सीधे तौर पर रूसी खेमे और अमेरिकी खेमे में दो-फाड़ होती दिखाई दे रही है. इसके विपरीत, ज़ेलेंस्की ने आधी दुनिया से हथियार हासिल करने के बावजूद भी कुछ हासिल नहीं किया, उलटे यूक्रेन को अगले कई दशकों के लिए खंडहर में तब्दील कर दिया.
ज़ेलेंस्की की सैन्य लामबंदी और संसाधनों के कथित नाजायज इस्तेमाल से उपजे इस महासंग्राम को इतिहास किस रूप में दर्ज करेगा, यह भविष्य तय करेगा. संभव है कि इतिहास ज़ेलेंस्की के राष्ट्रवाद को हिटलर और मुसोलिनी के राष्ट्रवाद के संदर्भ में भी परखे. किसी भी शासक को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह राष्ट्रवाद के नाम पर जनता से अंतहीन बलिदान मांगता रहे और हर असहमति को देशद्रोह घोषित कर दे.
यदि किसी सत्ता के निर्णयों के कारण नागरिकों और सैनिकों की मौत बढ़ती है, यदि भ्रष्टाचार या सत्ता के केंद्रीकरण के आरोप उठते हैं, यदि शांति के संभावित रास्तों पर पर्याप्त राजनीतिक प्रयास नहीं किए जाते, तो उस सत्ता की जवाबदेही तय होनी ही चाहिए.
ज़ेलेंस्की को इतिहास के कटघरे में खड़ा करने के लिए प्रचार नहीं, बल्कि तथ्यों, निर्णयों और उनके परिणामों की जांच हमेशा लंबित रहेगी.
फिर भी यह जरूर सोचा जाना चाहिए कि क्या असली अपराधी ज़ेलेंस्की ही हैं?
जवाब है—नहीं!
शायद सबसे बड़ा अपराधी किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं है. सबसे बड़ा अपराधी वह राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था है, जिसमें इंसान से ज्यादा महत्वपूर्ण बाजार हो जाता है, जिंदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक हित हो जाते हैं और शांति से ज्यादा लाभदायक युद्ध हो जाता है. यूक्रेन की धरती पर गिरने वाला हर बम हमें यही सवाल पूछने को मजबूर करता है—क्या राष्ट्रों की सीमाओं से ज्यादा मूल्यवान इंसान की जिंदगी नहीं होनी चाहिए?
अगर उत्तर ‘हाँ’ है, तो फिर हमें उन तमाम शक्तियों से सवाल करना होगा, जो युद्ध को रोकने के बजाय उसे लंबे समय तक चलाने में अपना हित देखती हैं. क्योंकि इतिहास में साम्राज्य आते-जाते रहे हैं. राष्ट्राध्यक्ष आते-जाते रहे हैं. पूंजीपति आते-जाते रहे हैं. लेकिन युद्ध की राख में हमेशा दबा मिलता है—आम आदमी!
हमारा पक्ष उन बच्चों का होना चाहिए, जो स्कूल में पढ़ना चाहते हैं. उन माताओं का होना चाहिए, जो अपने बेटों को जिंदा घर लौटते देखना चाहती हैं. उन मजदूरों का होना चाहिए, जिन्हें युद्ध नहीं, रोटी चाहिए. और उन करोड़ों इंसानों का होना चाहिए, जिन्हें साम्राज्यों की शतरंज में मोहरा बनने से इनकार करने का अधिकार है. क्योंकि किसी भी विचारधारा की अंतिम परीक्षा यह नहीं कि वह कितने झंडे खड़े करती है— बल्कि यह है कि वह कितनी इंसानी जिंदगियां बचाती है.
और अंत में उन लोगों की बात, जिन्होंने पूंजी और युद्ध के इस रिश्ते को बहुत पहले पहचान लिया था. कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र में लिखा है ‘पूंजीवादी राज्य की कार्यपालिका, बुर्जुआ वर्ग के सामान्य मामलों का प्रबंध करने वाली समिति मात्र है.’
यानी सत्ता को केवल संसद, चुनाव और राष्ट्रवाद के बाहरी आवरण से नहीं समझा जा सकता. यह देखना होगा कि सत्ता के पीछे आर्थिक शक्ति किसके हाथ में है और उसके फैसलों से लाभ किसे मिलता है.
लेनिन ने साम्राज्यवाद को पूंजीवाद की उस अवस्था के रूप में समझाया, जिसमें पूंजी का केंद्रीकरण, वित्तीय पूंजी और विश्व के आर्थिक क्षेत्रों पर प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा युद्धों को जन्म देती है. उनका प्रसिद्ध कथन है- ‘साम्राज्यवाद पूंजीवाद की एक विशेष ऐतिहासिक अवस्था है.’
और माओ ने युद्ध और राजनीति के संबंध को एक बेहद कठोर वाक्य में व्यक्त किया— ‘राजनीतिक सत्ता बंदूक की नली से निकलती है.’
इन विचारों का अर्थ आज भी हमारे सामने खड़ा है. जब आर्थिक शक्ति और राजनीतिक सत्ता एक-दूसरे की रक्षा करने लगें, जब हथियार उद्योग और भू-राजनीतिक हित मानव जीवन पर भारी पड़ने लगें, तब युद्ध केवल सीमा पर नहीं लड़ा जाता, बल्कि वह मजदूर की जेब, किसान के खेत, बच्चे की किताब और परिवार की जिंदगी के भीतर भी लड़ा जाता है. इसलिए यूक्रेन को केवल रूस बनाम यूक्रेन के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं है.
जागरूक समाजों को पूछना चाहिए कि इन युद्धों से किसकी सत्ता मजबूत हुई? किसका हथियार बिक रहा है? किसकी पूंजी बढ़ रही है और किसकी संतान मर रही है? इतिहास का सबसे बड़ा प्रश्न यही है. मनुष्य व्यवस्था के लिए नहीं बना है—व्यवस्था मनुष्य के लिए होनी चाहिए. और जिस व्यवस्था में मुनाफा, इंसान से बड़ा हो जाए, वहां संघर्ष केवल युद्ध रोकने का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था को बदलने का प्रश्न बन जाता है.
- सिद्धेश्वर चौहान
लेखक स्वयं यूक्रेन में मेडिकल के छात्र रहे हैं और इस समय महाराष्ट्र में सेवारत हैं
(हिन्दी अनुवाद और जरूरी एडिटिंग- ए.के.ब्राइट)
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