Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

नक़ली दवाओं का जानलेवा धन्धा

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 4, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

नक़ली दवाओं का जानलेवा धन्धा

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के विकास से पहले बीमार होने वाले अधिकतर लोग बिना दवाओं और इलाज के ही मर जाते थे. आज हमारे पास अधिकतर बीमारियों के इलाज के लिए दवाएं मौजूद हैं, जांच की तकनीकें मौजूद हैं, ऑपरेशन के विकसित तरीक़े मौजूद हैं लेकिन आज भी बीमारियों की वजह से करोड़ों लोग हर साल मर रहे हैं. 2016 में हृदय रोगों की वजह से 17.65 मिलियन यानी 1 करोड़ 76 लाख 50 हज़ार लोग मरे थे. कैंसर की वजह से लगभग 90 लाख लोग मरे थे. दूसरी बीमारियों की वजह से भी करोड़ों लोग मरे थे. कुछ लोग तो इतने गम्भीर बीमार होते हैं या फिर बीमारी ही लाइलाज होती है, जिस कारण इन्हें बचा पाना सम्भव नहीं होता. लेकिन दूसरे लोग, जिन्हें बचाया जा सकता था, वे भी अगर मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं तो कहीं न कहीं बहुत गड़बड़ हो रही है.

You might also like

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

अगर हम इसके कारणों की बात करें तो पहले भी बहुत से लेखों में हम इन कारणों की पड़ताल कर चुके हैं. इलाज और दवाओं के महंगा होने की वजह से, सरकार द्वारा सही ढंग से स्वास्थ्य सेवाएं मुहैय्या न करवाये जाने की वजह से, मुनाफ़े की चाह में बीमारियों को बढ़ने देने की वजह से और दूसरे भी बहुत से कारण हैं, जिन पर हम अक्सर चर्चा करते रहे हैं. समय पर सही इलाज न मिलना आज के समय की सबसे बड़ी स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्या है जोकि सीधे-सीधे मुनाफ़े के खेल से जुड़ी हुई है. आतंकवाद और युद्धों से कई सौ गुना व्यक्ति बीमारियों की वजह से असमय मृत्यु का शिकार होते हैं. पहले एक लेख में हमने चर्चा की थी कि किस तरह मुनाफ़े के लिए सस्ती जेनेरिक दवाओं की बजाय महंगी ब्राण्डेड दवाओं को प्रोत्साहित किया जाता है, जिसकी वजह से ग़रीब आबादी इलाज से बिलकुल ही दूर हो जाती है.




कुछ डॉक्टर कहते हैं कि सस्ती जेनेरिक दवाएं असर नहीं करतीं, इसलिए ब्राण्डेड दवाएं ज़्यादा ज़रूरी है लेकिन तमाम शोध यही कहते हैं कि जेनेरिक दवाएं चिकित्सकीय गुणों में ब्राण्डेड दवाओं के बराबर होती हैं. फिर ऐसा क्या है जिसकी वजह से कुछ दवाएं असर नहीं करतीं ? या फिर ऐसा भी होता है कि कोई दवा ऐसे साइड इफ़ेक्ट पैदा कर रही है जो कि उस दवा की वजह से होने ही नहीं चाहिए थे.

2012 में पाकिस्तान में खांसी की दवा पीने के बाद 60 लोगों की मृत्यु हो गयी. दवा की जांच हुई तो पता चला कि यह दो अलग-अलग कम्पनियों की दवाओं को पीने से हुआ था. दोनों ही कम्पनियां अपनी दवा में डेक्सट्रोमेथोर्फ़न (क्मÛजतवउमजीवतचींद) नामक एक साल्ट का इस्तेमाल कर रही थे. इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. यह साल्ट खांसी की बहुत-सी दवाओं का मुख्य हिस्सा होता है और सूखी खांसी के लिए प्रयोग किया जाता है. बहरहाल इस दवा के सैम्पल की जांच हुई तो उसमें पाया गया कि ’दोनों ही कम्पनियां यह साल्ट भारत की एक दवा उत्पादक कम्पनी से मंगवा रही थी. दवाओं की लेबोरेटरी जांच की गयी तो पाया गया कि इन दवाओं में एक और साल्ट मौजूद था, जिसे इस दवा में नहीं होना चाहिए था. इसका नाम है लीवोमेथोर्फ़न (स्मअवउमजीवतचींद). यह साल्ट दर्दनिवारक दवा मॉर्फ़िन की ही तरह का होता है, लेकिन उससे 5 गुना ज़्यादा तेज़ होता है. मॉर्फ़िन अफ़ीम से बनती है और मुख्यतः बहुत तेज़ दर्द, उदाहरण के तौर पर कैंसर के मरीजों को, में देने के काम आती है और इसकी ज़्यादा मात्रा नुक़सानदेह होती है, इतनी कि मृत्यु का कारण भी बन सकती है.’ इसलिए यह दवा सामान्य प्रिस्क्रिप्शन पर भी किसी मेडिकल स्टोर से नहीं मिलती. और अगर इससे भी 5 गुना ज़्यादा तेज़ दवा ओवरडोज़ यानी ज़रूरत से ज़्यादा होकर शरीर में पहुंच जाये तो मृत्यु होने का ख़तरा बहुत ज़्यादा बढ़ जायेगा. पाकिस्तान में यही हुआ था.




2013 में पराग्वे में ऐसी ही एक घटना घटी. यहां 44 बच्चों को सांस लेने में दिक़्क़त के चलते एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया. पूछने पर पता चला कि इन सभी बच्चों ने खांसी की दवा पी थी. तुरन्त जांच की गयी और विश्व स्वास्थ्य संगठन का डाटाबेस खंगाला गया तो ज्ञात हुआ कि ’इसमें भी उसी भारतीय कम्पनी द्वारा भेजा गया साल्ट डेक्सट्रोमेथोर्फ़न मौजूद था. पता चला कि यह भी लिवोमेथोर्फ़न से दूषित था. पराग्वे के इस अस्पताल में डॉक्टरों ने तुरन्त इन बच्चों का इलाज शुरू किया और इन्हें बचाने में सफल रहे.’

इस केस में तो डॉक्टरों को पता चल गया था कि दवा में कुछ ग़लत चीज़ मिली हुई है और समय पर इलाज भी शुरू हो गया. लेकिन अगर यही न पता चले कि गड़बड़ क्या है तो क्या होगा ? मान लीजिए कोई एण्टीबायोटिक दवा है, और उसमें जो एण्टीबायोटिक साल्ट होना चाहिए उसकी बजाय कोई और चीज़ मौजूद है या फिर साल्ट की ही मात्रा कम है तो क्या होगा ? ज़ाहिर है, दवा वह असर नहीं करेगी जो उसे करना चाहिए था और इन्फे़क्शन बढ़ता चला जायेगा. या फिर ये भी हो सकता है कि न तो दवा असर ही करे और साथ में दवा की वजह से अलग नुक़सान भी हो जाये.

एक तो वैसे ही एण्टीबायोटिक रेजिस्टेंस यानी एण्टीबायोटिक दवाओं के खि़लाफ़ जीवाणुओं की प्रतिरोधक क्षमता एक गम्भीर समस्या बनकर खड़ी है, ऊपर से घटिया, नक़ली और मिलावटी दवाओं ने समस्या को इतना बढ़ा दिया है कि आने वाला समय बहुत मुश्किल होने वाला है, मरीजों के लिए भी और डॉक्टरों के लिए भी. दूसरा ये कि इस तरह की मिलावटी और नक़ली दवाएं एण्टीबायोटिक रेजिस्टेंस का एक मुख्य कारण है. ’नक़ली, घटिया क्वालिटी की और मिलावटी दवाएं सिर्फ़ एक हिन्दुस्तान या पाकिस्तान की समस्या नहीं हैं बल्कि पूरी दुनिया इस बीमारी से पीड़ित है. ख़ासतौर पर ग़रीब मेहनतकश जनता, जिन्हें पता ही नहीं होता कि उन्हें क्या दवा दी जा रही है और इसका क्या असर रहेगा.’




विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नक़ली दवाओं की परिभाषा दी है. इसके अनुसार ये वे दवाएं हैं जिनमें जानबूझकर धोखे की नियत से उनकी पहचान और/या स्रोत की जानकारी से सम्बन्धित ग़लत लेबल लगाया जाता है. यह परिभाषा उत्पाद, इसकी पैकेजिंग या पैकेजिंग व लेबल पर मौजूद किसी भी अन्य जानकारी पर लागू होती है. इस तरह की जालसाजी ब्रॉण्डेड और जेनेरिक दोनों तरह के उत्पादों के साथ हो सकती है और इस तरह के जाली उत्पादों में सही घटकों वाले या ग़लत घटकों वाले, बिना सक्रिय घटक वाले, अपर्याप्त सक्रिय घटकों वाले या नक़ली पैकेजिंग वाले उत्पाद शामिल हैं.

नक़ली दवाओं यानी बवनदजमतमिपज कतनहे में और दोषपूर्ण दवाओं यानी कममिबजपअम कतनहे में अन्तर समझना भी ज़रूरी है. दोषपूर्ण दवाएं वे होती हैं जो बनायी तो क़ानूनी तरीक़े से जाती हैं लेकिन इनके उत्पादन की प्रक्रिया बनावट में ख़राबी आ जाती है. इसके अलावा घटिया क्वालिटी की दवाएं यानी ेनइेजंदकंतक कतनहे होती हैं. ये वे होती हैं जिनके घटक तो सही होते हैं लेकिन इनकी या तो गुणवत्ता ख़राब होती है या फिर सक्रिय घटक की मात्रा ही इतनी कम होती है कि ये दवा असर ही नहीं करतीं. इसके अलावा इस तरह की तमाम दवाओं में मिलावट भी हो सकती है. इनमें भारी धातुओं की मिलावट हो सकती है.

2010 में कोरिया में हुई एक स्टडी में पाया गया था कि ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से ऑनलाइन चलने वाली फ़ार्मेसियों की 26 प्रतिशत दवाओं में ऐसी चीज़ें पायी गयी हैं जो कैंसरकारक हैं; गुर्दों, लीवर और केन्द्रीय स्नायु तन्त्र के लिए हानिकारक हैं. इसमें ज़हरीले पदार्थों जैसे कीटनाशकों की मिलावट भी हो सकती है. 2009 में नाइजीरिया में ऐसी दवा से 84 बच्चों की मृत्यु हो गयी थी. इनमें धूल, मिट्टी, टेलकम पाउडर की मिलावट भी हो सकती है. या फिर, जैसा कि हम पहले ही बात कर चुके हैं, सक्रिय घटक कम हो सकते हैं या फिर ऐसा भी हो सकता है कि सक्रिय घटक हो ही न. 2012 में फ़ार्मास्यूटिकल सिक्योरिटी इंस्टिट्यूट (च्ैप्) नामक एक ग़ैर लाभकारी संगठन ने अनुमान लगाया था कि 523 अलग-अलग तरह की दवाओं में इस तरह की जालसाजी होती है. 2012 से 2019 तक 7 साल में तो यह संख्या और भी अधिक बढ़ चुकी होगी.




इस तरह की दवाएं नुक़सान क्या करती हैं ? हर वो नुक़सान जो दवा न मिलने की वजह से बीमारी करती है. और साथ में अतिरिक्त नुक़सान जो इस तरह की दवाओं की मिलावट की वजह से होता है. अगर कोई इस तरह की दवा ले तो मृत्यु हो सकती है. 2012 में अमेरिका में एक मज़दूर को दर्द का इंजेक्शन दिया गया था और कुछ समय के बाद उसकी मृत्यु हो गयी. कारण यह था कि जिस दवा का इंजेक्शन दिया गया था, वह एक फफून्द से दूषित थी. इंजेक्शन के साथ फफून्द उसके शरीर में चली गयी और फफून्द के इन्फे़क्शन की वजह से उसके दिमाग़ में सूजन आ गयी. पता चला कि इस कम्पनी की इस दवा की वजह से अमेरिका में 800 लोगों को दिमाग़ी सूजन हो गयी थी, जिनमें से 64 लोग मर गये थे.

अगर किसी एण्टीबायोटिक दवा में मिलावट है, या फिर उस दवा में सक्रिय घटक की मात्रा ही कम है, तो ज़ाहिर है कि यह दवा मरीज को देंगे तो इसकी ख़ुराक़ कम रहेगी और यह पर्याप्त असर नहीं करेगी. इसके अलावा एण्टीबायोटिक रेजिस्टेंस के उभरने का एक कारण अपर्याप्त ख़ुराक़ देना भी है. इस तरह से अगर किसी जीवाणु में इस दवा के खि़लाफ़ एण्टीबायोटिक रेजिस्टेंस ज़्यादा हो गया तो शुद्ध दवा भी उस जीवाणु पर असर नहीं करेगी. इसका सीधा-सीधा असर ये होगा कि दवा के असर से प्रतिरोधित जीवाणु का प्रसार ज़्यादा हो जायेगा और फिर दवा उन मरीजों में भी काम करना बन्द कर देगी जिन्होंने यह दवा कभी ली ही नहीं थी. मतलब इस तरह की नक़ली, मिलावटी या घटिया क्वालिटी की दवाएं पूरी मानवता के लिए ख़तरा बन रही हैं.

हमारा देश आज के समय में पूरी दुनिया में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा निर्यातक है और जेनेरिक दवाओं के साथ-साथ नक़ली दवाओं का कारोबार भी सबसे ज़्यादा हमारे देश में ही होता है. यहां से पूरी दुनिया में नक़ली दवाएं भेजी जा रही हैं. 2013 में रैनबैक्सी नामक भारतीय दवा कम्पनी पर 500 मिलियन अमेरिकन डॉलर का जुर्माना लगा था, क्योंकि इस कम्पनी ने ग़लत डाटा उपलब्ध करवाया था और यह सुरक्षा मानकों पर खरी नहीं उतर रही थी. 2014 में जर्मनी ने भारत की 80 दवाओं को इसी आधार पर प्रतिबन्धित कर दिया था.




भारत के मुख्य दवा नियन्त्रक ने बयान दिया कि अमेरिका के मानकों पर अगर हम चलने लगे तो हमें सभी दवाएं बन्द कर देनी पड़ेंगी. हालांकि यह कम्पनियों के बचाव में दिया गया बयान था, लेकिन इसने यह साबित कर दिया कि भारत और अन्य विकासशील देशों में कोई भी दवा मानकों पर खरी नहीं उतरती इसलिए मानकों को ही निम्नस्तर पर ला दिया गया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कम और मध्य आय वाले देशों में कम से कम 10 प्रतिशत दवाएं घटिया गुणवत्ता की हैं.

ज़ाहिर है कि यह सारा खेल मुनाफ़े पर टिका हुआ है. ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने के चक्कर में दवाओं की क्वालिटी के साथ समझौता किया जाता है, मानकों को नीचे लाया जाता है, जो मानक हैं उनके अनुसार भी काम नहीं किया जाता. इसकी वजह से दवा की क्वालिटी ख़राब होती है या फिर जानबूझकर मिलावट की जाती है, ग़लत लेबलिंग की जाती है. पहले से ही बर्बाद स्वास्थ्य ढांचा वैसे ही बीमारियों से लड़ नहीं पा रहा था, नक़ली और घटिया दवाओं के कारोबार ने उसे बिलकुल ही पंगु बना दिया है. इन सबका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ रहा है भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की आम मेहनतकश आबादी को.

यूं ही मेहनतकश को स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलती हैं, ऊपर से अगर अपनी दिन-रात की हाड़तोड़ मेहनत से की हुई कमाई से अगर दवा ख़रीदने की नौबत आ जाये तब भी उसे मिलता है दवा के रूप में ज़हर. मतलब यह कि ग़रीब मज़दूर पर तो तिहरी मार पड़ रही है. श्रम की लूट, सेहत की लूट और फिर कमाई की लूट के बदले में ज़हर की सप्लाई. बल्कि इस ज़हर का शिकार सिर्फ़ मेहनतकश नहीं बल्कि मध्यवर्गीय आबादी भी है. पूंजीवाद ने धरती की हवा प्रदूषित कर दी है, पानी प्रदूषित कर दिया है, जैव सन्तुलन बिगाड़ दिया है और जनता की सेहत से खिलवाड़ भी किया जा रहा है. यह तब तक जारी रहेगा, जब तक मुनाफ़े पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था मौजूद है. यह व्यवस्था कैसे ख़त्म हो, इस विषय पर हम सबको मिलकर काम करना होगा. डॉक्टरों को, मज़दूरों को, छात्रों को, आम जनता को, सबको. आखि़र यह हम सबसे जुड़ा हुआ मसला है.

(मज़दूर बिगुल, मार्च 2019 अंक में प्रकाशित)




Read Also –

भारत सरकार आदिवासियों के खिलाफ रासायनिक हथियारों का उपयोग कर रही है ?
भ्रष्टाचार में आकंठ डुबा है IGIMS का MS मनीष मंडल
दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति भूखमरी, गरीबी व बीमारी से पीड़ित देश के साथ सबसे बड़े भद्दे मजाक का प्रतीक है
“प्लीज, इस कॉलेज को बंद करो” – डॉ. स्मृति लहरपुरेे का सुसाइड नोट
मैक्स अस्पताल के लाईसेंस रद्द करने के केजरीवाल सरकार की शानदार कार्रवाई के खिलाफ भाजपा और अनिल बैजल का निजी चिकित्सा माफियाओं से सांठगांठ का भंडाफोर 





[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]




Previous Post

पत्रकारिता की पहली शर्त है तलवार की धार पर चलना

Next Post

AFSPA पर कांग्रेस ने ऐसा क्या कह दिया कि BJP देश तोड़ने का आरोप लगा रही है ?

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

AFSPA पर कांग्रेस ने ऐसा क्या कह दिया कि BJP देश तोड़ने का आरोप लगा रही है ?

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

अब सबसे बडी हेलीकाप्टर सेवा प्रदाता कम्पनी पवनहंस की बिक्री

May 2, 2022

इजरायल ने जिस थाली में खाया उसी में छेद किया, हर्जाना तो भरना ही होगा !

June 20, 2025

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.