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डार्विन का विकासवाद सिद्धांत : विज्ञान बनाम धर्म

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 9, 2019
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डार्विन का विकासवाद सिद्धांत : विज्ञान बनाम धर्म

रिचर्ड लेंस्की और उनका बेमिशाल प्रयोग

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विज्ञान और धर्म में एक महत्वपूर्ण अन्तर यह है कि विज्ञान मानव जीवन को सरल बनाने में योगदान देता है. वह नये-नये आविष्कार, खोज में लगा रहता है. वह घटने वाली हर घटना के पीछे कारण की खोज करता है और तथ्यों और प्रयोग के आधार पर व्याख्या करता है. वहीं धर्म मानव जीवन को दुरूह बनाने में अपनी कल्पनाओं की उड़ान भरता है और नई-नई कहानी गढ़ता है. मसलन विज्ञान परिवहन के साधनों के तौर पर गाड़ी, रेलगाड़ी, विमान, अंतरिक्ष यान वगैरह का निर्माण करता है, परन्तु भारत में आज भी अघोरी पेड़ उखाड़ कर पूरे दुनिया का परिक्रमा करता है, या यहां से वहां जाता है और फिर वहीं पर पेड़ को लगा देता है. परन्तु, पश्चिमी जगत ने धर्म की कपोल कल्पनाओं की उड़ान पर अंकुश लगाकर विज्ञान के विकास को नवीनतम ऊंचाई तक पहुंचाया और ऐसे ही एक-से-बढ़कर खोज में लगा हुआ है. वहीं हमारे देश में भी 1947 ई.के बाद विज्ञान की खोज को प्रश्रय दिया गया था, परन्तु 2014 ई. में आरएसएस का एजेंट नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा जब से सत्तासीन हुई है, पूरी कहानी ही पलट दी गई है. अब विज्ञान को अछूत बता कर धर्म आधारित देश बनाने की योजना बनाई जा रही है. जहां शिक्षा हासिल करना एक अपराध माना जाने लगा है, किताबें पढ़ना देशद्रोह की श्रेणी में आ गया है. अवैज्ञानिक खोजें मसलन, डायन, ब्रह्मपिशाच, गोबर वगैरह पर खोजें होने लगी है. खुद प्रधानमंत्री पद पर बैठे नरेन्द्र मोदी कभी गटर के दुर्गंध से चाय बनने की बात करते हैं, तो कभी प्राचीन भारत को सभी ज्ञान-विज्ञान से ऊंचा साबित करने पर तुला हुआ है. कभी न्यूटन-आईस्टींन को बेबकूफ बताता है तो कभी डार्विन को ठग बतलाता है.

इसी कड़ी में आरएसएस के एजेंट भारत के केन्द्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री सत्यपाल सिंह का दावा है कि डार्विन गलत थे. कि किसी ने बंदर को इंसान में बदलते नहीं देखा है. कि मानव शुरू है ही इसी तरह है, जैसे कि आज है. कि मानव विकास सम्बन्धी चाल्स डार्विन के विकासवाद का सिद्धांत ‘वैज्ञानिक’ तौर पर गलत है. वहीं राजस्थान के शिक्षा राज्य मंत्री वासुदेव देवनानी ने न्यूटन के गुरूत्वाकर्षण सिद्धांत के बारे में कहा था कि यह सिद्धांत उनसे पहले ब्रह्मगुप्त द्वितीय ने दिया था. सत्यपाल सिंह की ही तरह वासुदेव देवनानी के इस ‘खोज’ पर खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौन सहमति है. सत्यपाल सिंह और वासुदेव देवनानी डार्विन सिद्धांत को गलत ठहराने और गुरूत्वाकर्षण सिद्धांत पर ब्रह्मगुप्त द्वितीय के बारे में कोई तथ्यात्मक जानकारी नहीं देता. बस उनके गोबर दिमाग में यह सपना आया और उगल दिया. किसी भी तथ्य, प्रयोग वगैरह की कोई भी जानकारी देने में अक्षम है अर्थात, यह विशुद्ध रूप से यह संघी एजेंट की कपोल कल्पना है, जो देश की विशाल आबादी को अशिक्षित रखने और चंद ब्राह्मणवादी काॅरपोरेट घरानों को क्षुद्र गुलाम बनाने की एक साजिश है, जिसके लिए प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक को खत्म करने की कोशिश कर रही है और अतीत के ‘गौरव’ का झूठा ज्ञान अलापा जा रहा है.

इसके ठीक उलट विज्ञान को प्राथमिकता देने वाले देश विज्ञान के एक-एक प्रयोगों पर लाखों करोड़ों की न केवल धनराशि ही खर्च करती है, बल्कि इसके लिए प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक व वैज्ञानिक शिक्षण-प्रशिक्षण तक की अधिसंरचना भी तैयार करती है. जिसमें लाखों-करोड़ों लोग जुटे हुए हैं. शिक्षा व वैज्ञानिक प्रयोगों को एक से बढ़कर एक ऊंचाई तक पहुंचा रही है. विज्ञान के उन्नति के ऐसे ही वक्त में जब भारत में डार्विन सिद्धांत पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं, पृथ्वी को पूरे ब्राह्मण्ड का केन्द्र घोषित किया जा रहा है, यहां तक पृथ्वी को चपटी बताया जा रहा है, अमेरिका के एक प्रयोगशाला में डार्विन सिद्धांत पर जबर्दस्त प्रयोग किया गया है. यह महान वैज्ञानिक प्रयोग अमेरिकी वैज्ञानिक रिचर्ड लेंस्की ने प्रयोगशाला में 24 फरवरी, 1988 ई. को ई-कोलाई नामक एक साधारण बैक्टीरिया, जो समान्यतः हमारी आंतों में भी रहता है, पर शुरू किया था, जिसकी खोज और निष्कर्ष इस कूपमंडूक संघी गुंडों के ज्ञान पर एक जोरदार तमाचा लगाती है.

‘द वायर’ वेबसाईट पर प्रकाशित एक लेख जिसे सुप्रीत सैनी, जो आईआईटी बॉम्बे में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं, रिचर्ड लेंस्की के प्रयोग के बारे में लिखते हैं कि हम लेंस्की के प्रयोग को समझें. हमें डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत को थोड़ा समझना होगा. मान लीजिए कि कोई आबादी किसी क्षेत्रफल (जैसे जंगल मे जानवर) में रहती है. ऐसे में अगर कोई ऐसा नवजात पैदा हो, जो उस इलाके में रहने के लिए ज्यादा तंदुरुस्त न हो, तो वो रह नहीं पाएगा और लुप्त हो जाएगा. पर ऐसी आबादी में अगर कोई ऐसा नवजात हो जो वहां रहने में अपने मां-बाप से भी ज्यादा सक्षम हो, तो वो उस क्षेत्रफल पर अपना कब्जा कर लेगा. डार्विन ने इसी सिद्धांत की खोज 1859 में की थी.

इसी सिद्धांत पर काम करते हुए रिचर्ड लेंस्की ने एक शीशे के फ्लास्क में पानी भर कुछ तत्व डाले और उसमें कुछ बैक्टीरिया छोड़ दिए. ऐसे में यह बैक्टीरिया गिनती में बढ़ते जाएंगे और कुछ हो घंटों में फ्लास्क के सारे पोषक तत्व समाप्त कर देंगे. ऐसा होने पर प्रयोग वहीं समाप्त हो जाएगा. ऐसा न हो, इसलिए पोषक तत्व खत्म होने पर लेंस्की ने पहले फ्लास्क से कुछ बैक्टीरिया निकालकर एक नये फ्लास्क में डाल दिए. इस नए फ्लास्क में वही तत्व थे, जो पहले में थे – जिस कारण नये डाले गए बैक्टीरिया भी अब गिनती में बढ़ सकते थे. ऐसा करने से रोज बैक्टीरिया की लगभग 10 पीढ़ियां देखी जा सकती हैं. दरअसल ऐसा कर लेंस्की एक चतुर प्रयोग कर रहे थे. वे जानते थे कि गिनती बढ़ने की दौर में ऐसा जरूर होगा कि अचानक ऐसा कोई बैक्टीरिया पैदा हो जाएगा, जो उनके शुरुआती बैक्टीरिया से तेजी से बढ़ता हो. ऐसा हो जाने पर ये बेहतर बैक्टीरिया पोषक तत्वों को जल्दी निगलकर अपने प्रतिद्वंदी बैक्टीरिया को समाप्त कर देगा. इसी प्रक्रिया को प्राकृतिक चयन का सिद्धांत कहते हैं.

लेंस्की की प्रयोगशाला में यह प्रयोग 1988 से लेकर आज तक जारी है. इस बीच के 30 सालों में उन्होंने बैक्टीरिया की लगभग एक लाख पीढ़ियों का अध्ययन किया है. लेंस्की 1988 में जब यह प्रयोग शुरू किया था तो उन्होंने केवल एक फ्लास्क से यह शुरू नहीं किया था, बल्कि उन्होंने 12 फ्लास्क में यह प्रयोग करना शुरू किया था. उनकी प्रयोगशाला में कोई वैज्ञानिक सहकर्मी रोज सुबह आकर, हर एक फ्लास्क में से कुछ बैक्टीरिया निकालकर एक नए फ्लास्क में डालता है, इस कारण ये एक लाख पीढ़ियों का प्रयोग उन्होंने केवल एक बार नहीं, एक दर्जन बार किया है.

अब सवाल यह उठता है कि क्या उनके एक दर्जन प्रयोगों का नतीजा एक जैसा आया है या फिर हर बार प्रयोग करने पर कुछ अलग ही हो जाता है ? प्रयोग के शुरुआती नतीजे आने लगे और अब 30 साल बाद बेहद दिलचस्प नतीजे भी सामने आए हैं. प्रयोग का सबसे दिलचस्प नतीजा यह रहा है कि 12 में से 1 प्रयोग में ई-कोलाई बैक्टीरिया से इजाद होकर बैक्टीरिया की एक अलग नस्ल बन गया है. उसमें 1 लाख पीढ़ी के दौरान कुछ ऐसे परिवर्तन आए हैं कि अब उसे ई-कोलाई बैक्टीरिया कहना शायद सही नहीं होगा. दिलचस्प बात यह है कि बाकी 11 प्रयोगों में वह बदलाव नहीं आए हैं – और वो अब भी यकीनन ई-कोलाई ही हैं. पर एक लाख पीढ़ियां बहुत होती हैं. सभी अपने-अपने तरीके से बदले हैं. सभी के सभी शुरुआत के बैक्टीरिया के मुकाबले बहुत तेजी से बढ़ते हैं. और एक सूक्ष्म तरीके से देखने पर पता चलता है कि शुरुआती और अब के बैक्टीरिया में बहुत अंतर है. महान वैज्ञानिक लेंस्की का यह प्रयोग डार्विन सिद्धांत की स्वीकार्यता को और मजबूती से स्थापित करता है. रिचर्ड लेंस्की के प्रयोग के बारे में यहां पढ़ सकते हैं.

लेंस्की ये प्रयोग 30 साल से भी अधिक समय से कर रहे हैं. वे बताते हैं कि शुरुआती दौर में उन्हें इस प्रयोग के लिए पैसा एकत्रित करने में कितनी तकलीफ हुई. पर अब, जबकि 30 सालों में इस प्रयोग ने बेहद रोमांचक नतीजे सामने ला रखे हैं, पैसा कोई मुद्दा नहीं है. इस प्रयोग की अगली चुनौती तब होगी जब लेंस्की के बाद किसी को इसकी जिम्मेदारी उठानी होगी. इतने महान व महत्पूर्ण वैज्ञानिक प्रयोग जो डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को मजबूती से स्थापित करता है, क्या भारत में किसी भी संघी ने डार्विन के विकासवाद के महान सिद्धांत को झुठलाने के विरूद्ध किसी भी प्रयोग का हवाला देता है ? केवल निर्लज्जता से डार्विन सिद्धांत को नकारने मात्र से काम नहीं चलेगा. इस संघी गोबरों ने क्या कभी अघोरियों के पेड़ से उड़ने की बात साबित कर सकता है ? क्या कोई संघी डायन, पिशाच, ब्रह्मराक्षस जैसी परिकल्पना के समर्थन में कोई वैज्ञानिक प्रयोग की उपलब्धियों को सामने ला सकता है ? अगर नहीं तो इन संघियों को वैज्ञानिक प्रयोगों के माध्यम से स्थापित हो रही सच का सामना करना चाहिए, और देश की विशाल आबादी को अशिक्षित रखने की साजिश के कारण देश और उसकी जनता से माफी मांगनी चाहिए. यह नहीं चलेगा कि संघी अपने बेटे-बेटियों को उच्चतर शिक्षा हासिल करने के लिए विदेश भेजे और देश की विशाल आबादी की बेटे-बेटियों को अशिक्षित रखने के लिए देश के शिक्षण व्यवस्था को बर्बाद कर ब्राह्मणवादी-काॅरपोरेट घरानों को आहार बनाने के लिए मूर्खों की श्रेणी में धकेल दे.

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