शब्द और अर्थ के बीच लुकाछिपी का खेल अब बहुत हो चुका किंतु-परंतु में हमने काफी वक्त जाया कर दिया...
Read moreDetailsपुष्पराज सरकार के साथ सहकार करिए और पूछिए कि सवाल क्या है ? एक मुख्यमंत्री के लजीज बनिए और कहिए...
Read moreDetailsमां बेटी को फोन करने से डरती है न जाने क्या मुंह से निकल जाए और ‘खुफ़िया एजेंसी’ सुन ले...
Read moreDetailsआखिर तुमने भी मान लिया कि नक्सली सिर्फ वही नही होते जो तुम्हारे खिलाफ सशस्त्र संघर्ष कर रहे है एक...
Read moreDetails1 घुमन्तू जीवन जीते उनका जत्था पहुंचा था घने जंगलों के बीच तेज बहती अनाम पहाड़ी नदी के पास और...
Read moreDetailsअगर मैं जंगल में नहीं होता तो किसी जेल में होता मुझे आज जंगल और जेल में से किसी एक...
Read moreDetailsकोख में बेटियां ही नहीं मारी जाती 'कोख' में कविताएं भी मारी जाती हैं कुछ बेटियां कोख के बाहर भी...
Read moreDetails1 जब इस छोर से आवाज़ दे रहा हो कोई और दूसरे छोर पर मुर्दा ख़ामोशी हो तो समझ आता...
Read moreDetailsतुमने हमें असभ्य और जंगली कहा हमने ध्यान नहीं दिया तुमने हमें आदिवासी नहीं अनुसूचित जनजाति कहा जिसका हमने आज...
Read moreDetailsप्रार्थनायें फलीभूत होती तो दुनिया में कभी भी कुछ बुरा न होता सब जगह प्रार्थनाएं तो भरी हुई हैं प्रार्थनाएं...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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