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Home कविताएं

शिक्षक दिवस पर एकलव्य से संवाद

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 5, 2023
in कविताएं
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1

घुमन्तू जीवन जीते
उनका जत्था पहुंचा था
घने जंगलों के बीच
तेज बहती अनाम
पहाड़ी नदी के पास
और उस पार की कौतुहूलता में
कुछ लोग नदी पार कर गए थे
और कुछ इधर ही रह गए थे
तेज प्रवाह के समक्ष अक्षम
तब तीर छोड़े गए थे
उस पार से इस पार
आख़िरी विदाई के
सरकंडों में आग लगाकर
और एक समुदाय बंट गया था
नदी के दोनों ओर

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कौन है श्रेष्ठ ?

चट्टानों से थपेड़े खाती
उस अनाम नदी की लहरों के साथ
बहता चला गया उनका जीवन
जो कभी लहरों के स्पर्श से झूमती
जंगली शाखों की तरह झूम उठता था
तो कभी बाढ़ में पस्त वृक्षों की तरह सुस्त होता था
पर पानी के उतर जाने के बाद
मज़बूती से फिर खड़ा हो जाता था

उनके जीवन में संगीत था
अनाम नदी के साथ
सुर मिलाते पपीहे की तरह
जीवन पल रहा था

एक पहाड़ के बाद
दूसरे पहाड़ को लांघते
और घने जंगल में सूखे पत्तों पर हुई
अचानक चर्राहट से
उनके हाथों में धनुष
ऐसे ही तन उठती थी

2

हवा के हल्के झोकों से
हिल पत्तों की दरार से
तुमने देख लिया था मदरा मुण्डा
झुरमुटों में छिपे बाघ को
और हवा के गुज़र जाने के बाद
पत्तों की पुन: स्थिति से पहले ही
उस दरार से गुज़रे
तुम्हारी सधे तीर ने
बाघ का शिकार किया था
और तुम हुर्रा उठे थे–
‘जोवार सिकारी बोंगा जोवार !’
तुम्हारे शिकार को देख
एदेल और उनकी सहेलियां
हंडिय़ा का रस तैयार करते हुए
आज भी गाती हैं तुम्हारे स्वागत में गीत
‘सेन्देरा कोड़ा को कपि जिलिब-जिलिबा.’
तब भी तुम्हारे हाथों धनुष
ऐसे ही तनी थी

3

घुप्प अमावस के सागर में
ओस से घुलते मचान के नीचे
रक्सा, डायन और चुड़ैलों के क़िस्सों के साथ
खेत की रखवाली करते काण्डे हड़म
तुमने जंगल की नीखता को झंकरित करते नुगुरों के
संगीत की अचानक उलाहना को
पहचान लिया था और
चर्र-चर्र-चर्र की समूह ध्वनि की
दिशा में कान लगाकर
अंधेरे को चीरता
अनुमान का सटीक तीर छोड़ा था

और सागर में अति लघु भूखण्ड की तरह
सनई की रोशनी में
तुमने ढूंढ़ निकाला था
अपने ही तीर को
जो बरहे की छाती में जा धंसा था

तब भी तुम्हारे हाथों छुटा तीर
ऐसे ही तना था

ऐसा ही हुनर था
जब डुम्बारी बुरू से
सैकड़ों तीरों ने आग उगली थी
और हाड़-मांस का छरहरा बदन बिरसा
अपने अद्भुत हुनर से
भगवान कहलाया

ऐसा ही हुनर था
जब मुण्डाओं ने
बुरू इरगी के पहाड़ पर
अपने स्वशासन का झंडा लहराया था

4

हां, एकलव्य !
ऐसा ही हुनर था ।

ऐसा ही हुनर था
जैसे तुम तीर चलाते रहे होगे
द्रोण को अपना अंगूठा दान करने के बाद
दो अंगुलियों
तर्जनी और मध्यमिका के बीच
कमान में तीर फंसाकर

एकलव्य मैं तुम्हें नहीं जानता
तुम कौन हो
न मैं जानता हूं तुम्हारा कुर्सीनामा
और न ही तुम्हारा नाम अंकित है
मेरे गांव की पत्थल गड़ी पर
जिससे होकर मैं
अपने परदादा तक पहुंच जाता हूं

लेकिन एकलव्य मैंने तुम्हें देखा है

मैंने तुम्हें देखा है
अपने परदादा और दादा की तीरंदाज़ी में
भाई और पिता की तीरंदाज़ी में
अपनी मां और बहनों की तीरंदाज़ी में
हां एकलव्य मैंने तुम्हें देखा है
वहां से आगे
जहां महाभारत में तुम्हारी कथा समाप्त होती है

  • अनुज लुगुन

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