भुखमरी बेरोजगारी हत्याएं बलात्कार मंदी भ्रष्टाचार अशिक्षा कुपोषण बीमारी हमारा आंतरिक मामला है हमें किसी बाहरी हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं...
Read moreDetailsतुमने बेच दी जमीर अपनी, तो क्या जरूरी है कि मैं भी बेच दूं, शर्म का परित्याग कर दिया तूने,...
Read moreDetailsआप हमें झट पहचान लेते हैं अपने ब्रह्म भोज में पूड़ी-बूंदी के इंतज़ार में ज़मीन पर बिछे हम पत्तल हैं...
Read moreDetailsरूको बच्चो रूको ! सड़क पार करने से पहले रुको तेज रफ़्तार से जाती इन गाड़ियों को गुज़र जाने दो...
Read moreDetailsहां मुझे चरित्रहीन औरतें पसंद है ... हां मुझे भी चरित्रहीन औरतें पसंद हैं… बेहद… बेहद.. खूबसूरत होतीं है...
Read moreDetailsहरेक कविता निर्वासन में ही लिखी जाती है हरेक कवि निर्वासन में ही रहता है अनाम गोत्र फूलों के जंगल...
Read moreDetailsहमारे बुद्ध, उनके वाले जैसे नहीं हैं हमारे बुद्ध मुंह से बाभन नही पैदा करते न ही पैरों से शूद्र...
Read moreDetailsआवारा और बरबाद तो हो ही चुका हूं करीब-करीब. यह दुष्ट नगर, अंतियोक, मुझे खा गया, यह हत्यारा नगर और...
Read moreDetailsदुनियां के सारे घिनौने काम चलो कर देते हैं राम के नाम ! चलो ! देश बाटें, समाज बाटें !...
Read moreDetailsऎसा ज़माना आ गया है उल्टा कि कोई तुम्हें रास्ता बताए तो शक करो वह तुम्हें लूट सकता है सुनसान...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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