लोकल ट्रेन से उतरते हमने सिगरेट जलाने के लिए एक साहब से माचिस मांगी, तभी किसी भिखारी ने हमारी तरफ...
Read moreDetailsअक्सर पिछले दरवाज़े से मैं दाख़िल होता हूं अपने ही घर में नहीं चोरी कर देर रात घर नहीं लौटता...
Read moreDetailsसंभव हो तो आ जाओ मैं वेट कर रहा हूं मानसून के धीमे होने तक यही रुकूंगा अपना छाता लेते...
Read moreDetailsसंघ-भाजपा का राष्ट्रवाद मनुष्यताविहीन राष्ट्रवाद की एक ऐसी कल्पना है, जहां मनुष्य का अर्थ दास-गुलामों का झुंड होना है. जिसके...
Read moreDetailsऎ औरत ! वह तुम्हारा ही रक्त है जो तुम्हारे स्वप्न और पुरुष की उत्कट आकांक्षाओं को शिशु के रूप...
Read moreDetailsटेस्ट रिपोर्ट मिले सात साल हो गये जिस बीमारी का जो थोड़ा बहुत संदेह था कन्फर्म हो गया है. तथाकथित...
Read moreDetailsमत कहो आकाश में कुहरा घना है नदी, थोड़ा आराम कर लो कब से लाशें ढो रही हो पहाड़, थोड़ा...
Read moreDetailsवहां सूअर का मांस महंगा हो गया और यहां दाल महंगी हो गई गोकशी की इजाज़त कुछ गिनती के...
Read moreDetailsरेशम के कोए से बाहर निकला कीड़ा, उसने रेशम बनाने से इंकार कर दिया, मालिकों से कहा कि बढ़ाओ पगार,...
Read moreDetailsउसका ही नहीं किसी का भी अपना बन नहीं पा रहा हूं कुछ तो है अंदर जो नहीं है कोयले...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.