आदमख़ोरों के नाम पत्र प्यारे आदमख़ोरों मत खीजो उस आदमी पर जो रेल के डिब्बे में महज़ बैठने की जगह...
Read moreDetailsघास काटकर नहर के पास, कुछ उदास-उदास सा चला जा रहा था गरीबदास. कि क्या हुआ अनायास... दिखाई दिए सामने...
Read moreDetailsआसान है करना प्रधानमंत्री की आलोचना मुख्यमंत्री की करना उससे थोड़ा मुश्किल विधायक की आलोचना में ख़तरा ज़रूर है लेकिन...
Read moreDetailsपहाड़ियों के खुले हुए जबड़ों के अंदर तुम बना रही हो मेरे लिए एक अदद रोटी और आटे में जोरन...
Read moreDetailsसिलबट्टे मैं सिलबट्टे पर लिखी पोस्ट लाइक नहीं करती मुझे सिलबट्टे पर पिसे मसाले से मध्यकालीन सामंती युग की महक...
Read moreDetailsज़िंदगी मेरी तेरी यादों की एक साझा विरासत थी तुमने खो दिया उसे और मैंने संजो कर रखा अब हम...
Read moreDetailsमैं भी काफिर, तू भी काफिर मैं भी काफिर, तू भी काफिर, मैं भी काफिर, तू भी काफिर फूलों की...
Read moreDetailsमैं कौन हूं कहां से आया हूं इन सवालों का जवाब मजहब भी देते हैं लेकिन सच्चे सवालों के वो...
Read moreDetailsलकड़बग्घा हंस रहा है... फिर से तपते हुए दिनों की शुरूआत हवा में अजीब सी गन्ध है और डोमों की...
Read moreDetailsमैं एक सैनिक की भूमिका में आज भी हूं पानी में बहते हुए सितारे दूर जा रहे हैं मुझसे समय...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.