केरल के तंकमणी गांंव की घटनाओं पर 22.2.1987 के इलेस्ट्रेटिड वीकली में छपे वेणु मेनन के लेख के प्रति आभार...
Read moreDetailsतुम धरती हो बिछी हो जिस पर मैं चलता हूं तुम वृक्ष हो झुकी हो, जिससे लिपट मैं अकसर सो...
Read moreDetailsआत्म निर्भर शब्द का क्या वही मतलब है जो कल घोषणा के पूर्व था या आज जो घोषणा के बाद...
Read moreDetailsमेरे अंदर बसती है एक चरित्रहीन लड़की जो पार करना चाहती है सभी सीमाओं को वह दौड़ती है खुले...
Read moreDetailsभूख पुरानी नहीं पड़ती बासी रोटी की तरह भूख से सनी कविताएंं भी डेग डेग पर गुंंथी रहती हैं तुम्हारे...
Read moreDetailsवह मैं हूंं ! मुंह-अंधेरे बुहारी गई सड़क में जो चमक है.. वह मैं हूंं ! कुशल हाथों से तराशे...
Read moreDetailsमां ! मैंने खाये हैं तुम्हारे तमाचे अपने गालों पर, जो तुम लगाया करती थी अक्सर, खाना खाने के लिए....
Read moreDetailsअदालत के आदेश पर जांंच चल रही है हत्या, या आत्महत्या ? अगर ये हत्या है तो मक्तूल के इर्द...
Read moreDetailsमैं किसान हूं तुम्हारे खाने के लिए रोटी उगाता हूं क़र्ज़ में डूबता हूं बाबुओं की गाली, पुलिस की गोली...
Read moreDetailsजब एक दिन मार दिया जाएगा आख़िरी जुनैद और रक्ताभिषेक करके सारे राष्ट्रीय चिन्हों के ऊपर हुआ तो राष्ट्रध्वज में...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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