
क्या गज़ब की ऑस्कर विनिंग स्क्रिप्ट लिखी गई है भाई साहब ! पर्दे के पीछे बैठे सिस्टम के डायरेक्टरों ने आम जनता और छात्रों को भटकाने का ऐसा चक्रव्यूह रचा है कि बड़े-बड़े फिल्म मेकर भी देखकर शर्म से पानी-पानी हो जाएं. इस पूरे ‘मास्टरस्ट्रोक’ की क्रोनोलॉजी को ज़रा ध्यान से समझिए कि कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया.
शुरुआत में जब लगातार पर्चे लीक हो रहे थे, तो पूरा देश, करोड़ों युवा, शिक्षक, स्वतंत्र पत्रकार और यूट्यूबर्स सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक आग उगल रहे थे. सीधे सरकार और शिक्षा मंत्री की गर्दन नापी जा रही थी कि NTA और CBSE के घोटालों पर जवाब दो ! सरकार पूरी तरह से बैकफुट पर थी और जनता पहली बार एकजुट होकर अपने हक की बात कर रही थी.
लेकिन जब सत्ताधीशों से जवाब देते नहीं बना, तो मीडिया के ‘पत्तलकारों’ को मैदान में उतारा गया. एसी स्टूडियो में बैठीं अंजना ओम चाची ने सरेआम शिक्षकों को ‘दो कौड़ी का’ कह दिया और बस, यहीं से स्क्रिप्ट ने अपना पहला यू-टर्न लिया. जो चर्चा कल तक पेपर लीक और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर थी, वो रातों-रात शिक्षक बनाम गोदी मीडिया बन गई.
लेकिन जब सोशल मीडिया पर जनता भड़क गई और इन झालमुड़ी वाले पत्तलकारों की सरेआम फजीहत होने लगी, लोग इन्हें भर-भरकर गालियां देने लगे, तो इन्होंने अपनी जान बचाने के लिए एक और शातिर चाल चली. रातों-रात मुद्दा शिक्षकों से हटाकर सीधा ‘कोचिंग माफिया’ पर शिफ्ट कर दिया गया.
यानी जो सिस्टम ‘पेपर लीक माफिया’ पर घिर रहा था, उसे बचाने के लिए बड़ी ही चालाकी से सारा ठीकरा ‘कोचिंग माफिया’ के सिर फोड़ दिया गया और असली गुनहगारों को चर्चा से ही गायब कर दिया गया. छात्रों की इस एकजुटता को तोड़ने के लिए फिर एक और तगड़ा ट्विस्ट लाया गया. विवाद को जानबूझकर दो बड़े कोचिंग संस्थानों और उनके शिक्षकों (खान सर और ज्ञान बिंदु वाले रोशन आनंद सर) के बीच मोड़ दिया गया.
कोचिंग संस्थानों में थोड़ा-बहुत मनमुटाव हर प्रोफेशन की तरह आम बात है, लेकिन इस बार इसमें से एक शिक्षक को बलि का बकरा बनाकर जेल भेज दिया गया. नतीजा यह हुआ कि जो बच्चे कल तक पेपर लीक के खिलाफ एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रहे थे, वो आज अलग-अलग खेमों में बंटकर अपने-अपने शिक्षकों के समर्थन में सड़क पर एक-दूसरे से ही भिड़ने लगे.
स्क्रिप्ट यहां भी खत्म नहीं हुई. जब लगा कि मामला शायद ठंडा पड़ जाए, तो इसमें बिहार की सदाबहार ‘जातिगत राजनीति’ का तड़का लगाया गया. सोशल मीडिया पर जानबूझकर यह नैरेटिव सेट किया गया कि किसके इशारे पर ज्ञान बिंदु वाले शिक्षक को गिरफ्तार किया गया और किसके इशारे पर खान सर को बचाया जा रहा है ?
जो छात्र कल तक सिर्फ अपनी पढ़ाई और भविष्य से मतलब रखते थे, उन्हें अचानक याद दिलाया जाने लगा कि फलाना शिक्षक यादव है, ब्राह्मण है, भूमिहार है या राजपूत है. और फिर आया सिस्टम का सबसे अचूक ब्रह्मास्त्र.
जब कुछ समझदार लोग इस पूरी क्रोनोलॉजी को डिकोड करने ही वाले थे कि ये सब स्क्रिप्टेड है, तब इसे सीधा हिंदू-मुस्लिम का रंग दे दिया गया ! कल तक जो ‘गोदी मीडिया’ खान सर को खान सर ही कहती थी, अचानक उनके न्यूज़ और थंबनेल पर फैसल खान लिखा जाने लगा. पलक झपकते ही दो शिक्षकों के बीच का एक सामान्य विवाद जिहाद और धर्म के चश्मे से दिखाया जाने लगा.
इस बहती गंगा में कुछ यूट्यूबर्स ने भी जमकर हाथ धोए. थंबनेल पर आग लगाकर और चंद डॉलर्स के व्यूज़ छापने के लालच में खूब वीडियो पेले गए. किसके इशारे पर यह सब हो रहा है, इसका मास्टरमाइंड कौन है, यह तो भगवान ही जाने ! लेकिन इन डिजिटल मठाधीशों ने व्यूज़ के लिए गुरुओं की जाति और धर्म खोजना शुरू कर दिया.
कड़वी सच्चाई तो यही है कि चाहे खान सर हों या रोशन आनंद सर, ये दोनों हमारे देश के बेहतरीन शिक्षक हैं और हमारी शान हैं. इस तरह शिक्षकों की जाति धर्म ढूंढना, शिक्षा के मंदिर में हिंदू-मुस्लिम का ज़हर घोलना इस देश और समाज के लिए किसी कैंसर से कम नहीं है.
इस पूरी साज़िश में असल नुकसान सिर्फ और सिर्फ उस आम विद्यार्थी का हो रहा है, जिसकी जवानी पेपर लीक और सड़क के धरने में बर्बाद हो रही है. लेकिन इस पूरे ड्रामे के बीच, लाशों के इस ढेर पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले, अपनी जेबें भरने वाले और सिस्टम की ‘दलाली’ करने वालों की सच में मौज ही मौज है.
जो लोग ज़मीनी हकीकत जानते हैं, वो बखूबी समझ रहे हैं कि पेपर लीक के मुख्य मुद्दे को दबाने के लिए किस तरह से मीडिया का इस्तेमाल हुआ, कैसे जाति का रंग पोता गया और कैसे इसे अंत में ‘हिंदू-मुस्लिम’ बना दिया गया. अभी तो इस ड्रामे का असली क्लाइमैक्स आना बाकी है, हो सकता है कल को खान सर की भी गिरफ्तारी हो जाए.
आप इस पूरी क्रोनोलॉजी और रची गई स्क्रिप्ट को किस नज़रिए से देखते हैं ?
- दीपु पटेल
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