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Home गेस्ट ब्लॉग

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 10, 2026
in गेस्ट ब्लॉग
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आज से 22 साल पहले चीन यात्रा के दौरान पेकिंग विश्वविद्यालय के एक चीनी मूल के हिंदी प्रोफेसर ने बातचीत के दौरान कहा कि एक बार मुंबई की यात्रा में मैंने देखा कि वहां गगनचुम्बी इमारतों के पास ही बड़ी-बड़ी झुग्गी बस्तियां भी थीं जहां हजारों हजार गरीब और फटेहाल लोग रहते थे. मेरे लिए यह आश्चर्य की बात थी कि गरीब लोग अपने ही पड़ोस अमीरों के ऐसे आलीशान भवन कैसे सहन कर लेते हैं. हमारे चीन में तो ऐसा मुमकिन ही नहीं है.

मुझे भी लगता है कि भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है. अमीरी चाहे जैसे भी हासिल की गई हो वह हमारे लिए वरणीय है, पूजनीय है. वही हमारा लक्ष्य है. हमारी लगभग सभी पौराणिक कथाओं के माध्यम से ईश्वर से सुख और समृद्धि का ही वरदान मांगा जाता है.

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सत्यनारायण की लोकप्रिय कथा का पाठ और उपवास हिंदू इसी उम्मीद में करता है कि गरीबी के कष्ट से मुक्त हो सके और जल्दी से जल्दी अमीर बन सके. संभवतः यही कारण है कि जो जितना अधिक अमीर होता है, चाहे अमीरी जैसे भी हासिल हासिल की हो वही हमारा आदर्श है.

हम यह सवाल कभी नहीं पूछते कि उसने अमीरी कैसे हासिल की है. इसकी एक वजह यह भी है कि श्रम के प्रति जितना निरादर भारत (खास तौर पर हिंदू समाज में) में है, वैसा शायद ही किसी अन्य देश और अन्य समाजों में हो. पूरी वर्ण व्यवस्था का आधार भी यही है. जो हाथ से काम करता है वह शूद्र है और जो दूसरों के श्रम पर निर्भर वर्ग इन मेहनतकश वर्गों पर शासन करते हैं, वे सवर्ण कहलाते हैं.

1947 में जब देश का नया संविधान बन रहा था तब जो संगठन लोकतंत्र, समानता और सामाजिक न्याय पर बनने वाले संविधान का विरोध कर रहा था और मनु स्मृति लागू करने की मांग कर रहा था, भारत में आज उन्हीं का शासन है और पिछले 12 सालों में उनकी भरसक कोशिश मौजूदा संविधान को अर्थहीन बना देने का रहा है.

शिक्षा और रोज़गार के क्षेत्रों से सरकार द्वारा लगातार हाथ खींचना और दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्यवस्था को धीरे धीरे शून्य तक ले जाना इसी सोच का नतीजा है. एक और लगातार बढ़ती बेरोजगारी और गैर बराबरी, शिक्षा संस्थाओं का लगातार बंद होते जाना और उत्पादन, व्यवसाय और सेवा के लगभग क्षेत्रों से सरकार का हाथ खींचते जाना इसी श्रमविरोधी और ब्राह्मणवादी सोच का नतीजा है जिसकी स्वीकृति पिछले कुछ दशकों से बढ़ी है.

अमीरी के प्रति सहनशीलता ही नहीं उसके प्रति आदर और सम्मान का भाव इतना अधिक है कि भारत में अगर कोई एक वर्ग यदा कदा फूटने वाले जनता के क्रोध से सबसे अधिक सुरक्षित है तो यह पूंजीपतियों और इजारेदारों का वर्ग है.

  • जवारीमल परख

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