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मणिपुर की आदिवासी जनता के जंगलों-पहाड़ों पर औधोगिक घरानों के कब्जे की तैयारी के खिलाफ मणिपुर की जनता का शानदार प्रतिरोध

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 12, 2023
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मणिपुर की आदिवासी जनता के जंगलों-पहाड़ों पर औधोगिक घरानों के कब्जे की तैयारी के खिलाफ मणिपुर की जनता का शानदार प्रतिरोध
मणिपुर की आदिवासी जनता के जंगलों-पहाड़ों पर औधोगिक घरानों के कब्जे की तैयारी के खिलाफ मणिपुर की जनता का शानदार प्रतिरोध

मणिपुर का लगभग 89% हिस्सा पहाड़ी है और यहां का कानून है की इस हिस्से में सिर्फ़ आदिवासी (Sedule Tribes, ST) ही बस सकते हैं. मणिपुर में गैर-आदिवासी (मैतेई) जो कि अधिकतर हिंदू समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, उनकी मांग थी कि उन्हें पिछडी जाति की श्रेणी से निकाल कर आदिवासी (Sedule Tribes, ST) का दर्जा दिया जाए ताकि वह भी इन पहाड़ी क्षेत्रों में बस सकें.

भाजपाई मुख्यमंत्री एन. विरेन सिंह ने पहले मणिपुर हाई कोर्ट से मैतेई को जनजाति के दर्जे पर विचार वाला आर्डर करवाया फिर हिंसा भड़कने के एक दिन पहले कुकी जनजातियों की जांच करने और पहाड़ों से बेदखली वाला बयान दिया. ध्यान रहे मैतेई समुदाय को संविधान में जनजाति का दर्जा नहीं दिया गया है.

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मणिपुर की आदिवासी जनता पर हिन्दुत्ववादी ताकतों और पुलिसिया गिरोह का जुल्मोसितम

इसी को लेकर आदिवासी कुकी नागा जो कि अधिकतर ईसाई समुदाय से आते हैं, उनके एक संगठन (ATSUM) ने गैर आदिवासियों को ST में शामिल करने के खिलाफ विरोध मार्च निकाला, सभा किया, जिस पर भाजपाई मैतेई जाति ने आदिवासियों पर हमला कर दिया. जिन लोगों ने आदिवासियों पर हमला किया उन पर कार्यवाही की जानी चाहिए.

गैर-आदिवासियों को आदिवासी में शामिल करना

कृष्ण अय्यर लिखते हैं – देश के अन्य जंगलों और पहाडी भू-भाग जहां आदिवासियों का प्राकृतिक अधिकार मान लिया गया है, असलियत में खनिज संपदा का विशाल भंडार है. उसी तरह मणिपुर के पहाड़ों और जंगलों में भी खनिज संपदाओं का भरमार है. जैसे – लाइमस्टोन, निकेल, कॉपर, क्रोमाइट और बहुत सारे मिनरल, जो दुनिया में मुश्किल से मिलते हैं.

मणिपुर के पहाड़ों और जंगलों में ‘ईसाई’ आदिवासी रहते हैं, जहां ‘धारा 371’ लागू है और इस वजह से ग़ैर आदिवासी पहाड़ी ज़मीन नहीं ख़रीद सकते. यहाँ ‘ग़ैर आदिवासी’ का मतलब ‘मितरो उद्योगपतियों’ से है. अब जब वह जमीन नहीं खरीद सकते तो फिर खनिज पदार्थ पर मालिकाना हक़ जताकर उस की बिक्री कैसे कर सकते हैं ?

इसलिए कानून और न्यायालय का इस्तेमाल कर यकायक मणिपुर के इन हिंदुओं को ‘आदिवासी’ बना दिया गया तो अब ये भी ज़मीन ख़रीदने के हक़दार बन गए. मणिपुर में जारी हिंसा के पीछे मूल कारण है कि यहां के ‘मूल आदिवासियों’ को खेल तुरंत समझ आ गया कि एक बार अगर ‘नए आदिवासी’ ज़मीन ख़रीदने लगे तो ‘मितरों उद्योगपति’ अपना ख़ज़ाना खोल देंगे और मूल आदिवासियों का जंगल से खदेड़ा होना तए है.

मणिपुर की हिंसा के पीछे केन्द्र की मित्रों-उद्योगपतियों वाली मोदी-शाह सरकार की। यह सोची समझी साज़िश है. ये “हिन्दू-‘ईसाई” की लड़ाई नहीं है…ये मणिपुर के पहाड़ों और जंगलों पर कब्ज़ा करने की साज़िश है. मितरों उद्योगपति वही है जिसे आप समझ रहे है और ये खेल इतनी आसानी से नहीं रुकने वाला.

इस खेल में कोई बाधा न पड़े इसलिए गोदी मीडिया में पूरा सन्नाटा पसरा है और मणिपुर तबाही के आग में जल रहा 54 लोगों के मौत की आधिकारिक पुष्टि हुई है हालांकि कई मीडिया चैनल 100 से अधिक लोगों के मारे जाने का दावा कर रहे हैं.

मणिपुर हिंसा का वर्तमान मामला

दरअसल केन्द्र की भाजपा की मोदी सरकार खुद को तमाम कानूनी बाध्यताओं और संविधान से ऊपर समझती है. उसी तर्ज पर मणिपुर की भाजपा सरकार भी खुद को कानून और संविधान से ऊपर समझती है. लेकिन इसी के साथ वह देश के कानून और संविधान की कमजोरियों का इस्तेमाल करते हुए समूचे देश में अपने ऐजेंडे को लागू करने के लिए इसी कानून और संविधान का सहारा ले रही है.

भाजपा की सरकार किस तरह अपने संघी और कॉरपोरेट घरानों के ऐजेंडों को लागू करने के लिए न्यायपालिका का सहारा ले रही है, मणिपुर की न्यायपालिका इसका बेजोड़ नमूना है, जो भाजपा ऐजेंडों पर थिरक रही है. सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी विजय शंकर सिंह ने अपने सोशल मीडिया पेज पर लिखते हैं –

मणिपुर उच्च न्यायालय की सिंगल जज पीठ में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एम.वी. मुरलीधरन ने एक याचिका की सुनवाई के बाद राज्य सरकार को एक विवादित आदेश के माध्यम से निर्देश दिया था कि ‘राज्य अनुसूचित जनजातियों की सूची में मेइती समुदाय को शामिल करने की सिफारिश करने पर विचार करे.” मणिपुर हिंसा का वर्तमान मामला, मणिपुर हाईकोर्ट के उसी फैसले का परिणाम है. उक्त आदेश के ही कारण, मणिपुर मौजूदा अशांति से जूझ रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 8 मई को, एक याचिका की सुनवाई के दौरान, यह मौखिक टिप्पणी की कि ‘मणिपुर के उच्च न्यायालय के पास राज्य सरकार को अनुसूचित जनजाति सूची के लिए एक जनजाति की सिफारिश करने का निर्देश देने का अधिकार नहीं है.’
यह टिप्पणी तब की गई, जब मुख्य न्यायाधीश सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ, मणिपुर राज्य में चल रही अशांति से संबंधित मामलों की सुनवाई कर रही है.

सुप्रीम कोर्ट की यह पीठ, मणिपुर से संबंधित, दो याचिकाओं पर विचार कर रही है, एक, मणिपुर ट्राइबल फोरम दिल्ली द्वारा दायर एक याचिका जिसमें हिंसा की एसआईटी जांच और पीड़ितों के लिए राहत की मांग की गई है, और दूसरा, मणिपुर विधान सभा की पहाड़ी क्षेत्र समिति (HAC) के अध्यक्ष, डिंगांगलुंग गंगमेई द्वारा दायर एक अन्य याचिका, मणिपुर उच्च न्यायालय के निर्देश को चुनौती देते हुए कि केंद्र सरकार को अनुसूचित जनजाति सूची में मेइती समुदाय को शामिल करने की सिफारिश को आगे बढ़ाया जाए. उल्लेखनीय है कि मेइती को एसटी दर्जे से जुड़े मुद्दे पर पिछले हफ्ते राज्य में दंगे भड़क गए थे.

हिल एरिया कमेटी के अध्यक्ष, गंगमेई ने अपनी याचिका ने यह तर्क दिया है कि, ‘किसी राज्य सरकार को अनुसूचित जनजाति ST सूची में किसी समुदाय को एक जनजाति के रूप में शामिल करने का निर्देश देने या सिफारिश करने का अधिकार, उच्च न्यायालय को नहीं है.’ इस प्रकार, मणिपुर हाईकोर्ट ने, ऐसा निर्देश देकर, अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है. ऐसे अनाधिकृत निर्देश का ही परिणाम है कि आज मणिपुर जल रहा है और वहां की कानून व्यवस्था, संविधान के अनुच्छेद 355 के अंतर्गत फिलहाल केंद्राधीन है.

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष, वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े इस मामले में मूल याचिकाकर्ता (उच्च न्यायालय के समक्ष) की ओर से पेश हो रहे थे. सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि, ‘सुप्रीम कोर्ट के ऐसे कई फैसले हैं, जिनमें कहा गया है कि हाई कोर्ट किसी समुदाय को एसटी का दर्जा देने का कोई निर्देश नहीं दे सकता है.’

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि याचिकाकर्ता को, जब हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई चल रही थी, तो, सुप्रीम कोर्ट के ऐसे निर्णयों को, उच्च न्यायालय के संज्ञान में लाना चाहिए था. सुप्रीम कोर्ट के यह निर्णय, हाईकोर्ट के लिए बाध्यकारी हैं.

मुख्य न्यायाधीश ने एडवोकेट हेगड़े से कहा, ‘आपने हाईकोर्ट को कभी नहीं बताया कि उसके पास यह शक्ति नहीं है. यह राष्ट्रपति की शक्ति है.’ सीजेआई चंद्रचूड़ ने महाराष्ट्र राज्य बनाम मिलिंद मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि ‘राज्य सरकारें या अदालतें या न्यायाधिकरण या कोई अन्य प्राधिकरण अनुच्छेद 342 के खंड (1) के तहत जारी अधिसूचना में निर्दिष्ट अनुसूचित जनजातियों की सूची को संशोधित, या बदल नहीं सकते हैं.’

हिल एरिया कमेटी के याचिकाकर्ता, गंगमेई द्वारा दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि इस आदेश के परिणामस्वरूप मणिपुर में अशांति फैल गई है, जिसके कारण 60 लोगों की मौत हुई है और व्यापक स्तर पर लोगों का नुकसान हुआ है.’

याचिका के अनुसार, ‘दिए गए आदेश के कारण दोनों समुदायों के बीच तनाव हुआ और राज्य भर में हिंसक झड़पें होने लगीं जो अब भी हो रही हैं. इसके परिणामस्वरूप अब तक 60 आदिवासी मारे गए हैं, राज्यों में विभिन्न स्थानों को अवरुद्ध कर दिया गया है, इंटरनेट पूरी तरह से बंद कर दिया गया है और अधिक लोगों को अपनी जान गंवाने का खतरा है.’

मेइती समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने का निर्णय एक राजनीतिक निर्णय या कोई राजनीतिक चुनावी वादा है या नहीं, बिना इस विषय पर विचार किए यह कहा जा सकता है कि फिलहाल तो यह अशांति हाईकोर्ट के ऐसे आदेश का परिणाम है, जो उसके क्षेत्राधिकार के बाहर दिया गया है. इसका खमियाजा, आज पूरा मणिपुर भुगत रहा है. अनुसूचित जाति जनजाति में शामिल करने या उसकी समीक्षा करने का अधिकार आयोग की सिफारिश पर सरकार और सरकार के अनुरोध पर राष्ट्रपति को है, न कि, हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को.

जिस तरह से हाईकोर्ट में यह मामला उठाया गया और हाईकोर्ट को, सुप्रीम कोर्ट की उन रुलिंग्स से अवगत नहीं कराया गया, से यह संकेत मिलता है कि इस याचिका का उद्देश्य राजनीतिक है और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अदालत के कंधे पर बंदूक रखी गई है. अभी सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं की सुनवाई चल रही है.

मणिपुर की जनता के जंगलों पहाडों को बेचने के उद्देश्य हेतु अदालत का इस्तेमाल

अर्थात, भाजपा की मणिपुर की सरकार मणिपुर उच्च न्यायालय का बेजा इस्तेमाल अपने राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया है. अगर मणिपुर की जनता मणिपुर उच्च न्यायालय के इस असंवैधानिक आदेश के खिलाफ सड़कों पर नहीं आती और यह मामला सुप्रीम कोर्ट में नहीं जाता तो मणिपुर के जंगलों-पहाड़ों को भी भाजपा की यह सरकार देश के अन्य हिस्सों की तरह भ्रष्ट औद्योगिक घरानों के हाथों कौड़ियों के हाथों बेच चुकी होती.

कृष्ण अय्यर लिखते हैं कि मणिपुर की राजधानी इम्फाल में हिंदुओं ने अपनी दुकानों पर ‘हिंदु दुकान’ लिख कर पोस्टर लगाए. दंगों में हिंदुओं की दुकानों पर हमला नहीं हुआ. बग़ल वाली दुकानें जो ईसाई आदिवासियों की थी, उन्हें लूट कर जला दिया गया. किसने जलाई आदिवासियों की दुकान ? ये मैं नहीं कह रहा हूं ये गोदीमीडिया दिखा रहा है. कर्नाटक चुनावों में मैसेज दिया जा रहा है कि देखो हमने कैसे आदिवासियों को मारा है. मोदी ने एक ऐसी सरकार बनाई है जो अपने ही मुल्क की ‘अवाम के एक हिस्से के ख़िलाफ़ हिंसा तशदुदा फैला रही है.

भाजपा सरकार और हिन्दुत्ववादी ताकतें मिलकर मणिपुर की मूल आदिवासी समुदाय के खिलाफ हिंसा, दंगा, फसाद, आगजनी और लोगों के घर जलाए जा रहे हैं. पूरी तरह से लॉ एंड ऑर्डर फेल हो चुका है, 8 ज़िलों में कर्फ्यू लगा है और आदिवासियों पर जुल्म की कहानियां सार्वजनिक न हो इसके लिए इंटरनेट सेवा भी बंद कर दी है जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी व गृहमंत्री अमित शाह जी मुंह फेरे कर्नाटक चुनाव में रैली कर रहे हैं.

उदय केसरी लिखते हैं कि मणिपुर में हिंसा की आग धधक रही है, पर आपने प्रधानमंत्री साहब की कोई शांति अपील सुनी ? कर्नाटक में उनकी ननस्टॉप चुनावी सभाओं में कोई जिक्र सुना ? नहीं ! हां, आपने कुछ दिनों पहले गृहमंत्री अमित शाह के मुख से यह जरूर सुना होगा- ‘कर्नाटक में कांग्रेस जीती तो दंगे होंगे.’ तो अब बताइए, मणिपुर में दंगे क्यों हो रहे हैं ? वहां तो कांग्रेस नहीं जीती, बीजेपी जीती और वहां उसी की सरकार है ?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने पद पर बने रहने का मौलिक अधिकार खो चुके हैं. उन्हें फ़ौरन अपने पद से इस्तीफ़ा देना चाहिए. अब भाजपा की मणिपुर की सरकार को भी सत्ता में बने रहने का हक़ नहीं है. इस सरकार को फौरन बर्खास्त करके तुरंत अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राष्ट्रपति शासन लागू कर देना चाहिए.

मणिपुर की आदिवासी जनता के पास विकल्प क्या है ?

उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट हो गया है कि केन्द्र की मोदी सरकार और उसके सिपहसालारों ने मिलकर हिन्दुत्व के नाम मणिपुर की आदिवासी जनता को उजाड़ कर उनकी विशाल खनिज संपदा और जंगलों-पहाड़ों को औद्योगिक घरानों को कौड़ियों के मोल बेचने का आत्मघाती योजना लिया है, जिसके विरोध में न्यायोचित ही मणिपुर की आदिवासी जनता ने प्रतिरोध का सराहनीय कदम उठाया है.

लेकिन यह अपर्याप्त प्रतिरोध है. मणिपुर की जनता को भारत की एक मात्र आशा की किरण सीपीआई (माओवादी) के साथ एकजुट होकर सशस्त्र प्रतिरोध का रास्ता अख्तियार करना होगा, और इन धूर्त सत्ताधारी हिन्दुत्ववादी शोषक ताकतों के आतातताई गिरोहों को उखाड़ फेक कर अपनी जनताना सरकार की स्थापना करें. तभी वह इन समस्याओं से पूरी तरह मुक्ति पा सकेंगे. मुक्ति के लिए एकमात्र मुक्तियुद्ध ही विकल्प है.

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