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मौत से रोमांस

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 11, 2021
in लघुकथा
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मौत से रोमांस

Kanak Tiwariकनक तिवारी, वरिष्ठ अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, छत्तीसगढ़

वह रोज़ आती है. आती क्या, साथ रहती है. उसे अपनी आंखों से देखा है – निराकार निर्गुण ईश्वर के अहसास की तरह. तड़के अंधियारा वक्त. अम्मा को चाय की आखिरी तलब लगी है. चाय उनकी ज़रूरत और आदत बनते-बनते सुबह का अलार्म बन गई थी – ‘बेटा, चाय पिला दो. तबीयत बहुत घबड़ा रही है.’ मैं और दीदी भागते जाते हैं.

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सामने के पुराने मकान में गंगा है, अपने स्तनों से झरती करुणा का अनन्त विस्तार लिए हमें देख रम्भाने लगती है. मेरे हाथ में लालटेन और दीदी के हाथ में गंगा के पिछले पैरों को बांधने की रस्सी तथा दूध दुहने छोटी बाल्टी. दीदी बमुश्किल पाव भर दूध निकालती हैं. हम हड़बड़ाते हुए वापस पहुंचते हैं.

दूर से अम्मा को सांसों की धौंकनी चलाते देखता हूं. अम्मा कातर निगाहों से मुझे निहारती हैं. ’बेटा !’ उनके अस्फुट स्वर हैं – ’अब हम जा रहे हैं. नहीं रुक पाएंगे. ये हमको लेने आ गई हैं. कह रही हैं – जल्दी चलो, वक्त गुजर रहा है.’

दीदी गिरती-पड़ती चाय बना लाती हैं. तश्तरी में डाल-डालकर फूंकते हुए अम्मा को चाय पिलाती हैं. एकाध घूंट मुंह में भरने के बाद वे गुटक नहीं पातीं. दम फूलने लगता है. दमा का आखिरी हमला दम पर हो जाता है. अम्मा फिर कहती हैं, ’बेटा, प्राण जा रहे हैं. ये कह रही हैं किसी के इशारे पर कि अब बिल्कुल नहीं रुकें.’

वे पथराई आंखें छत की ओर कर देती हैं. वहां कोई है. उसके अदृश्य रहने पर भी आंखों से उसे महसूसते हैं. अम्मा को ले-जाने आई है. हमें भी ले जाएगी. सबको ले जाएगी. हम अम्मा के पुत्र यानी पिता को चीखकर बुलाते हैं लेकिन वह तो अम्मा को लेकर चली गई.

पंद्रह वर्ष की उम्र में आंखें उस दिन इशारे करनेवाली को महसूस कर रही हैं. वह भी आंखें मुझ पर गड़ाए हुए है. हर समय उकसाती रहती है. उससे हमबिस्तर होता हूं. लिखने बैठता हूं. कलम में परकाया-प्रवेश करती है. मेरी आंखों में फैल जाती है. जो मुझे मिलता है, छूटते ही कहता है – ’आंखें तुम्हारी एकदम सूनी और उदास क्यों लग रही हैं ?’

चार बजे हम अम्मा को फूंक आए थे. वहां भी खड़ी वह बस केवल मुझसे अठखेलियां कर रही थी. मैं उससे डरकर भागा, तो सीधे घर आकर दम लिया. वह घर पर पहले से हाज़िर थी. दीदी ससुराल से आई थी, गौना कराकर चली गईं. वह अब मेरे पीछे क्यों पड़ी है ? अम्मा के कमरे पर अब मेरा एकाधिकार है. एकाधिकार भी कहां है ? वह भी पसर गई है. आंखों से नहीं दिखती, पर है. कान उस पर लगाए हुए हूं. उसकी खिलखिलाहट दिल पर चोट करती है. मैं दिल में उसे टटोलता हूं. वह छू-छूकर पूरे कमरे में मुझे आंखों पर पट्टी बांधकर खेल खिलाती रहती है.

आठ बजे रात खाने पर सब जुटते हैं, तब उससे मुक्त हो पाता हूं बस कुछ देर के लिए. रोज शाम चार बजे से रात आठ बजे तक मेरा उसका सम्भोग होता है. उसे भोगता हूं अपनी इन्द्रियों में, इन्द्रियार्थों में. वह मुझे अनाड़ी से ज्ञानी बनाने की कोचिंग क्लास चला रही है. मैं डाॅक्टर पंकज लाल से मिलता हूं.

होम्योपैथी के बड़े डाॅक्टर कहते हैं – ‘इसी वक्त यदि कोई मौत से मुखातिब होता रहता है तो उसे लायकोपोडियम बीमारी हो जाती है. उसका इलाज भी लायकोपोडियम दवा है.‘ मैं लायकोपोडियम-परिवार में शामिल हो गया हूं. वर्षों बाद लायकोपोडियम खाना छोड़ दिया लेकिन उसने वह मुझे नहीं छोड़ा.

चौबीसों घंटों की इस संगति से आजिज़ आ गया हूं. सुबह उठा. ’कोई नहीं है मेरा इस दुनिया में’ वाला गाना रेडियो पर बज रहा है. कहती है, ’सुना ? मैं हर समय तुम्हारे साथ हूं. ऐसे गाने मत सुना करो !’ मैं बाथरूम में नहा रहा हूं. वहां आ जाती है. कहती है, ’इतने कम पानी से क्यों नहाते हो ? अम्मा को जलाकर नदी में नहाने में कैसा लगा था ? चलो, वहीं फिर नहाएं.’

उसके साथ नदी तक जाने को तैयार हो जाता हूं. कहती है – ’मुझे तुमसे प्रेम है. तुम मुझसे बचने के लिए क्यों डाॅक्टरों-वाक्टरों के चक्कर में पड़े हो ? क्या डाॅक्टर तुम्हें मुझसे ज़्यादा जानते हैं ? क्या मैं लायकोपोडियम दवा से डरती हूं ? सोचो, भला सौ बरस बाद तुम और तुम्हारा ये डाॅक्टर कहां रहेंगे ?’

मैं सिहर जाता हूं. मुट्ठी-भर राख नहीं बनना चाहता. बीमार पड़ जाने, बूढ़ा हो जाने और मर जाने की आदिम चिन्ताएं वह एक-एक थाल में अलग-अलग परोसकर लाई है. सुन्दर मखमली कवर हटाती जाती है और ठीक मेरा भविष्य मुझे ही दिखाती जाती है. मुझसे कहती है, ’कानों को आवाज़ की ज़रूरत सुनने के लिए नहीं होती. यह मैंने तुम्हें सिखाया. बिना देह के छुआ जा सकता है न ! तुम मुझे आंखों के बिना देख पा रहे न ?’

मैं सपने में अफ्रीका के जंगलों में कबीलों का भोज्य पदार्थ बन रहा हूं. वे मुझे रस्सियों से बांधकर आग में भून रहे हैं. ठीक एक क्षण पहले वह मुझे उठा लाती है. कहती है, ’पसीना-पसीना क्यों हो रहे हो ? तुम खुद मुझसे बचने वहां क्यों गए थे ? मुझसे बचने की कोशिश क्यों करते हो आखिर ? कोई नहीं साथ देगा तुम्हारा मेरे सिवाय. तुम कभी किसी के नहीं हो सके. मुझे आजमाकर देखो. अपने-आप पर भरोसा छोड़ दोगे.

मैं दौड़ता हांफता चन्द्रशेखर पंडित जी के पास पहुंचता हूं. देखूं तो कितनी सच्ची है या फ़कत डींग हांक रही. पंडित जी कुंडली देखकर बताते हैं, ‘भैय्या, तीन अल्प हैं तुम्हारी जन्मपत्री में. एक तो इसी महीने निकल गईं. दो और हैं, लेकिन खतरा टल जाएगा. पूरी उम्र जिओगे यार.’ वह पंडित जी के घर से मेरे पीछे-पीछे चलती फुसफुसाती रही है, ‘सुनो यह पंडित कब तक है ?’

मुझसे पूछो. ‘मैं धड़धड़ाता कमरे में आकर दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लेता हूं. वह दरार से छुप जाती है. बांहें फैलाए आलिंगन करने की मुझे मादक दावत देती है – ‘आओ ! दूर मत रहो ! मैं मन, वचन, कर्म से तुम्हारे साथ हूं. मुझसे दूर क्यों भागते हो ? विश्वास न हो तो अम्मा से बात कराऊं ?’

मैं गहमागहमी, भागदौड़ और पलायन से निढाल हूं. समर्पण करना चाहता हूं. वह अच्छी लगने लग गई है. क्या मैं उसका नया मुरीद हूं ? वह मेरी अंकशायिनी हो रही है. पहल अब मैं करने लगा हूं. वह तत्पर भी होती है और समर्पित भी. कल रात बिस्तर पर करवट लेकर मुझसे मुख़ातिब थी. मैं उसे बताता हूं मेरे सब दोस्त अकेले सोते हैं. उनसे बार-बार पूछता हूं कि ‘क्या उन्हें नींद लाने के लिए इस कच्ची उम्र में हमबिस्तर होने की इच्छा नहीं होती ?’ वे हंसते हैं. कभी झिड़क भी देते हैं. कहते हैं, ‘बेटा, बताएं क्या बाबूजी से ? अभी से चस्का लग रहा है ?’

वह कहती है, ’बच्चे हैं, जाने दो. उस दिन अपनी तीन आदिम चिन्ताओं को लेकर तुम पशोपेश में थे न ? मैं देह से नहीं, मन से खेलती हूं. मुझसे अभिसार किए बिना मन की कोई गति है ? तुमसे गहरी संवेदना इसी से है कि सांसारिक रिश्तों में तुम बेहद उथले हो. तुम्हारी घबराहट, तुम्हारा चिड़चिड़ाना, रातों की तुम्हारी निरन्तर अनिद्रा, अन्दर-अन्दर भागकर धंसते जाने की तुम्हारी वृत्तियां – ये सब तुम्हारे लाक्षणिक श्रृंगार हैं. तुम्हारी उम्र ही क्या है ! जब तुम अम्मा के पास जाओगे, तब भी तुम्हारी क्या उम्र होगी भला ! तुम धीरे-धीरे अपने को मेरे लिए रच रहे हो.’

मैं सोचता हूं – कितनी चुप्पा बदमाश है ! कुछ करती-धरती नहीं और मुझे अन्दर से कहीं बांधे हुए है. लेकिन लगती कितनी मीठी है ! इसे देखो, साथ रहती है मेरे कमरे में. क्या मजाल कि इसके साथ रहने की भनक किसी को लग पाए ! रिश्तों को पोशीदा रखने से बड़ी और कोई दोस्ती होती है क्या ?

मैं आज स्कूल नहीं जाना चाहता. सिर-दर्द का बहाना करके कमरा अच्छी तरह से कमरा अन्दर से बन्द कर बिस्तर पर लेट जाता हूं. मैं कहता हूं, ‘अन्दर जब कभी अपना कोई वांछित दूसरों की निगाह बचाकर छिपाए रखना हो, तो उन दरवाज़ों की हर सांकल पर ताला जड़ देना चाहिए, जो द्विअर्थी संवाद की तरह खोलने और बन्द करने के दोहरे काम आती हो.’

वह पहली बार ज़ोर से हंसी. कहने लगी, ‘बच्चू, अब मेरा जादू तुम्हारे सर चढ़ रहा है. बोलेगा भी किसी दिन.’ हम एक-दूसरे की आग़ोश में हैं. कोई दुराव नहीं है मन में. वह तो खैर दुराव-बचाव कुछ जानती नहीं. मैं धीरे-धीरे अपने संकोच की चादर से बाहर आकर उससे लिपटना चाहता हूं. वह कहती है, ‘स्पर्श प्रेम की खिड़की नहीं है. उसमें लास्य है. स्पर्शहीन प्रेम के बिना क्या तुम नहीं रह सकते ?’

मैं कहता हूं, ‘मेरे प्रेम की पहली सीढ़ी अम्मा थी, जिन्होंने ठीक तुम्हारे सामने मेरे सिर पर स्नेह का हाथ फेरा था. दूसरी सीढ़ी बाई थीं, जिन्होंने मुझे मातृविहीन बनाने के पहले इसी तरह हाथ फेरा होगा. क्या ममता स्पर्श के बिना फलदायी हो सकी है ? मां की गोद होती मैडम, तो क्या मैं तुम्हारे इश्क के चक्कर में पड़ जाता ? मन स्पर्श की डोरियों में बंधने पर ही सम्पत्ति या वस्तु की तरह चुपचाप चला आता है.’

वह तो घाघ है. कह उठती है, ‘यह बाज़ारू शब्दावली तुम्हें किसने सिखाई ? तुम पचड़े को प्रेम, कीचड़ को जीवन और अनन्त को मृत्यु समझने लग गए हो. तुम्हारे यार दोस्त तुम्हें नहीं समझ पाते और तुम मुझे. तुम मुझे छूकर क्या जानना चाहते हो ? तुम जानने की केवल आत्मतुष्टि करना चाहते हो. इसे तुम ज्ञान कहते हो ? बिना छुए स्पर्श का बोध तुम करो. मेरे साथ लेटो, मुझे आलिंगनबद्ध करो, लेकिन रहो निस्संग, बल्कि बनो निस्संग.

‘तुममें भावनाओं का भूचाल आए, चाहो तो ज्वालामुखी उगाओ, लेकिन मेरी छाती की एक-एक धड़कन ठीक उसी समय इस तरह सुनो कि भूकम्प और ज्वालामुखी ध्वनिहीन हो जाएं. तुम मेरे सांवले रूप पर लट्टू हो गए हो. ध्यान से रात को कभी देखा है ? आंखों से सौन्दर्य को देखने की तुम्हारी कच्ची उम्र अभी दूध-पीती है. मेरे सम्पर्क में रहकर भी तुम जीवन की रूमानी हवेलियों में रहना चाहते हो जिनकी टूटती दीवारें कभी भी भरभराकर गिर जाने की प्रतीक्षा में हैं.’

मैं आज बन्द कमरे में रोशनी के बिना उजास-पर्व मना लूं तो कैसा रहे ? इसकी डींग मारने की आदत की परीक्षा भी हो जाएगी. अपना क्या, फिसल पड़े तो हर गंगा, नहीं तो जो है, सो है. वह कह उठती है, ‘रहे निरे बुद्धू के बुद्धू ! कमरे में घटाटोप अंधेरा घेर लिया है तुमने. रात रच ली है तुमने. जो खुद अंधियारा ओढ़ ले, उजास-पर्व उसके ही मन में है. अब किस रात की प्रतीक्षा है ?

‘मैं तुम्हें अम्मा और बाई के कारण मिली हूं न ? यह जड़ता तुममें है, मुझमें नहीं है. खुद जड़ हो और मुझ पर अविश्वास करते हो ! मैं तुम्हारी हम उम्र बन जाऊं, तब मेरी भाषा समझोगे ? तुम शरीर से उन्मत्त हो जाओगे और जीवन के रहस्य खो दोगे. हर एक प्रिय को खो देने का भाव लिये हो, तो पाओगे कैसे ? जीवन तिजारत नहीं है और न ही मैं डंडी मारने में विश्वास रखती हूं. विषाद से भरते जाते हो और मेरे साथ रासलीला करने की सोचते हो !’

बड़ी अजीब है ! चैन से जीने भी नहीं देती और मेरी भाषा में मेरी आकांक्षाएं नहीं समझती. हर काम उसके लिए हवस है. खुद साफ-पाक बनी दर-दर की ठोकरें खाती फिरती रहती है. बूढ़ों पर डोरे डालती है, उनसे किन्तु-परन्तु नहीं करती. मैं तरुण हूं तो क्या इसीलिए अविकसित हूं ? जीवन इसीलिए तो ठूंठ होता जाता है, क्योंकि उसमें तारुण्य का फैलाव और अहसास दोनों इसके कहने से ग़ायब हो जाते हैं.

मैं शब्द-छल का चितेरा नहीं, लेकिन पारखी ज़रूर हूं. जो मुझे स्पर्श, आलिंगन, गंध के प्राथमिक संवेगों से च्युत करे, उसके झांसे में मैं नहीं आनेवाला. मैं अपना चरित्र, स्वभाव, कौल सब छोड़ दूं इसके कहने से ? इसके चक्कर में तो खाली हाथ ही चले जाना होगा. एक प्याला चाय तक तो अम्मा पी नहीं पाईं, गंगा के दूध से उपजी प्यास कौन मिटाएगा ? सांसों में आरोह-अवरोह नहीं हो, फिर भी इसके अनुसार उद्दाम होना चाहिए ? नसों में खून नहीं दौड़े, फिर भी जीवन अकुलाने का ढोंग करे ? ललक और पुलक दोनों बहनें किसी भाई के जीवन-हाथ को राखी नहीं बांधें और उत्सवधर्मिता के ढोल-ताशे बज जाएं ! भाड़ में जाए यह प्रयोगधर्मिता, यह नया तिलिस्म, वह लायकोपोडियम और हमउम्र बन गईं ये कातिल अदाएं !

वह छू लेती है सिर को हौले से. मैं सिहर उठता हूं बर्फ की सिल्लियों में दब गए अहसास की तरह. वह फुसफुसाती है, ‘देखा ? स्पन्दनहीन स्पर्श कितना विद्युत्मय होता है ! मैं अकारण तुम्हारे नैसर्गिक विकास की अन्तःकथा का क्लाइमैक्स नहीं पढ़ना चाहती. तुम अपनी चलाओ. ज़िद्दी हो न ! मैं रोज़ तुम्हारे कमरे में आकर दस्तक दूंगी. जिस दिन मेरी बात का मर्म समझ में आए, साथ चलेंगे. वही तो अन्ततः है !’

मैं किसी तरह उठता हूं और फ़िलहाल कमरे का दरवाजा खोलकर उसे जीवन कक्ष से बाहर चले जाने की चिरौरी कर रहा हूं.

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

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