जनकवि विनोद शंकर की चार कविताएं : राम की प्राण प्रतिष्ठा !
1. हे राम हे राम अब यहां क्या है तुम्हारा काम ? अब किसका प्रतिशोध लेने आएं हो ? अब...
Read moreDetails1. हे राम हे राम अब यहां क्या है तुम्हारा काम ? अब किसका प्रतिशोध लेने आएं हो ? अब...
Read moreDetailsगृहमंत्री अमित शाह के नाम साथी रितेश विद्यार्थी का खुला खत : 'दमन की इन्तहां, प्रतिरोध की धार को और...
Read moreDetailsRhetoric and Reality Rhetoric, as a tool to inspire public sentiment in favour or against a particular ethos, has long...
Read moreDetailsईश्वरीय अवतार के साथ इस तरह का अन्याय !!! मुझे तो शर्म आने लगी है कि हम कितने गये बीते...
Read moreDetailsतय है लड़ाई तो है लेकिन लड़ने वाले लड़ाकों की तादाद कितनी है लड़ाई की खबर ठीक से फैली नहीं...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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