जनवादी कवि विनोद शंकर की दो कविताएं : ‘गुलामी की चादर’ और ‘जनताना सरकार’
1. गुलामी की चादर यहां कुछ भी एका-एक नहीं होता है जो भी होता है उसके पीछे एक योजना होती...
Read moreDetails1. गुलामी की चादर यहां कुछ भी एका-एक नहीं होता है जो भी होता है उसके पीछे एक योजना होती...
Read moreDetailsइन दिनों तुमसे बात करने के लिए एक दुभाषिये की ज़रूरत होती है मेरा कहा गया हरेक शब्द खो देता...
Read moreDetailsक्लाईव डिप्रेशन का मरीज था. एक पल में उत्साही, ऊर्जावान और दूसरे पल उदास, निराश उबा हुआ. अजब सी मृत्युइच्छा...
Read moreDetailsअरुणाचल प्रदेश की हिन्दी लेखिका जोराम यालाम नाबाम के उपन्यास 'जंगली फूल' पर 'अक्षरा' पत्रिका के अक्टूबर, 2021 अंक में...
Read moreDetailsदूर हूं असंपृक्त नहीं जंगल से आती मादल की थापों हूंकार भरे गीतों की दूरागत ध्वनि फौजी बूटों की धमक...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
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