निराश नहीं हूं प्रिय
निराश नहीं हूं प्रिय न ही है तुमसे शिकायत कुछ ही दिनों में जी लिया पूरा जनम हमने साथ निभाने...
Read moreDetailsनिराश नहीं हूं प्रिय न ही है तुमसे शिकायत कुछ ही दिनों में जी लिया पूरा जनम हमने साथ निभाने...
Read moreDetailsआभा शुक्ला कुदरत ने बड़ा खूबसूरत दिल दिया है भारतीय मुसलमानों को....! दिन भर गाली खाते हैं लेकिन सारी अच्छाई...
Read moreDetailsआभा शुक्ला ओए हैलो...! ओए माफिया का अंत जरूरी था, माफिया से कैसी हमदर्दी का ज्ञान देने वाले भाई साहब...!...
Read moreDetailsअंधी सड़कें नहीं देख पाती शार्क के खुले जबड़े आदमी मच्छी के कांटे सा फंसा हुआ है उसके नुकीले दांतों...
Read moreDetailsहिमांशु कुमार पिछले दिनों मैंने एक आदिवासी लड़की के बारे में लिखा था जिसके साथ पुलिस थाने में दो बार...
Read moreDetails'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.