मैं रहूं न रहूं, पर लड़ाई ज़िंदा रहेगी : एक अपरिचय से परिचय तक की दहला देने वाली मुलाक़ात यह कहानी किसी कल्पना की उपज नहीं है. यह कहानी है जंगल के उस सच की, जो नक्शों में नहीं मिलता और उस युवा माओवादी की, जो सवालों में जवाब और जवाबों में दर्शन छुपाए बैठा था. एक समय था जब माओवादियों ने मुझे जंगलों में जाने से बैन कर दिया था. लेकिन पत्रकार का स्वभाव शायद जंगल से भी ज़्यादा ज़िद्दी होता है. मैं लगातार बस्तर के सबसे अंदरूनी इलाक़ों में जाता रहा और रिपोर्टिंग करता रहा. तभी वरिष्ठ पत्रकार कमल शुक्ला जी ने एक दिन गंभीर स्वर में कहा ‘यह बहुत खतरनाक हो सकता है. माओवादियों का निचला कैडर बिना सोचे मार देता है. कहीं ऐसा न हो कि वे तुम्हें मार दें… और बड़ा कैडर बाद में माफ़ीनामा जारी कर दे.’ यह बात दिल में उतर गई. फैसला हुआ, माओवादी संगठन के शीर्ष नेताओं से सीधे मुलाक़ात की जाएगी. हम निकल पड़े एक ऐसे सफ़र पर जिसकी कोई मंज़िल तय नहीं थी क्योंकि माओवादियों का कोई दफ़्तर नहीं होता. बीजापुर पहुंचे. वहां से मुकेश चंद्राकर को साथ लिया. वह भी बैन था. फिर तय हुआ बासागुड़ा की ओर जाएंगे और किसी भी पगडंडी से अंदर घुसेंगे. लेकिन जैसे ही बासागुड़ा पहुंचे, ख़बर मिली कि माओवादियों पर हवाई हमला हुआ है. कुछ ही देर में माओवादियों का प्रेस नोट जारी हुआ. लोकेशन थी बासागुड़ा से अंदर, कोंडापल्ली के आगे. हमने दिशा बदल दी. शाम ढलते-ढलते कोंडापल्ली पहुंचे. और तभी माओवादियों का निचला कैडर, शायद जनमिलिशिया ने हमें रोक लिया. शक गहरा था. ‘हवाई हमले के कुछ ही घंटों में आप यहाँ कैसे पहुंच गए ? कहीं आप पुलिस से मिले हुए तो नहीं ?’ ऐसे सवाल आए, बहुत तीखे अंदाज़ में. काफ़ी लंबी बहस चली. हमने साफ़ कह दिया, ‘हम वापस नहीं जाएंगे. हमें शीर्ष नेताओं से ही मिलना है.’ आख़िरकार फ़ैसला हुआ रात यहीं रुकिए. मनीष से पहली मुलाक़ात देर रात, जिस घर में हम रुके थे वहां एक बहुत युवा लड़का आया. उसके साथ चार और लोग सभी सिविल ड्रेस में. पहली नज़र में पहचानना मुश्किल था. लेकिन जब उस लड़के ने आगे बढ़कर हाथ मिलाया और कहा ‘लाल सलाम’ तो तस्वीर साफ़ हो गई. उसका नाम मनीष था. वह संदेश लेकर आया था, ‘आप लौट जाइए. जब बुलावा आएगा, तब मुलाक़ात होगी. अभी हालात ठीक नहीं हैं.’ लेकिन हमारी ज़िद कायम थी. मनीष ने कहा, ‘ठीक है, सुबह फिर जवाब लाऊंगा.’ सवालों वाला लड़का मनीष अगली सुबह फिर आया. इस बार मैंने देखा उसके हाथ में एक छोटा सा चाकू था. उसने फिर वही बात दोहराई. हमने रुकने का फ़ैसला किया. पांच दिन, पूरे पांच दिन हम कोंडापल्ली में रहे. और इन पांच दिनों में, मनीष रोज़, दोपहर तीन घंटे, और शाम तीन घंटे, हमारे साथ बैठता रहा. वह सवाल पूछता था, चर्चा करता था. लेकिन उसकी एक आदत अजीब थी. वह हर सवाल का जवाब सवाल से देता था. मसलन, ‘तुम्हारी उम्र कितनी है ?’ आपको क्या लगता है कितनी होनी चाहिए ? ‘हाथ में ये टांके कैसे लगे ?’, आपको क्या लगता है कैसे लगे होंगे ? ‘संगठन में कब से हो ?’ आपको क्या लगता है मैं कब से हो सकता हूं ? पांच दिन बीत गए और फिर आया बुलावे का क्षण. पांचवें दिन दोपहर, प्रचंड गर्मी. गांव की एक लाड़ी के नीचे खटिया. अचानक मनीष आया और बोला - ‘जिस सफ़र पर आप निकले हैं, उसकी मंज़िल अब पास है.’ हम मोटरसाइकिल पर बैठे. मैंने पूछा - ‘कितनी दूर ?’ मनीष मुस्कुराया - ‘ये तो रास्ता ही बताएगा.’ कोंडापल्ली का एक चक्कर, पीछे की ओर पगडंडी और अचानक मनीष ने बाइक रोकी. एक पेड़ के पीछे गया, और जब बाहर निकला तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए. अब वह काली वर्दी में था और कंधे पर ऑटोमेटिक SLR राइफल. मैं बस इतना कह पाया, ‘तो ये है तुम्हारा असली रूप, मनीष !’ वह मुस्कुरा दिया और हम वहां से आगे बढ़े. इसमें बहुत जानकारियां ऐसी हैं जिन्हें यहां लिख पाना सही नहीं होगा. हर दो-चार पेड़ों के पीछे, काली वर्दी में, ऑटोमेटिक हथियारों से लैस गार्ड निकलते चले गए. फिर आई एक सूखी नदी, रेत ही रेत. वहां तीन लोग बैठे थे. AK-47 लिए एक बुज़ुर्ग माओवादी. बाक़ी दो नेता. चारों ओर, 50-60 सशस्त्र माओवादी थे. यहीं चार-पांच घंटे की बहस हुई, बैन हटाने पर. तीन नेता, विकास, विजय और दामोदर, और मनीष उनके बराबर बैठा बहस करता हुआ. आख़िरकार निर्णय हुआ. ‘अब आप कहीं भी रिपोर्टिंग कर सकते हैं, हम यह सूचना पूरे संगठन में प्रसारित करेंगे.’ इस फैसले तक रात हो चुकी थी. मनीष ने कहा, ‘खाना खाइए, आराम कीजिए, सुबह जाइएगा.’ मैंने कहा - ‘मैं अभी जाऊंगा.’ वह बोला - ‘जंगल है सर, खतरा हो सकता है.’ मैंने कहा - ‘खतरा किससे, मनीष ? तुम सब से मिलकर ही जा रहा हूं.’ विदा के समय मनीष ने मुझे गले लगाया. और फिर पांच दिनों में पूछे गए हर सवाल का जवाब, एक-एक करके दे दिया. उम्र 23 साल. 11 की उम्र में पार्टी स्कूल. 12 से पूर्णकालिक सदस्य. हाथ पर भालू का हमला. अंत में मैंने कहा, ‘हम फिर मिलेंगे, मनीष.’ उसने गहरी आंखों से देखा और कहा, ‘पता नहीं अगली बार आप आएं तो मैं रहूं या ना रहूं.’ मैंने कहा - ‘तुम रहोगे.’ वह मुस्कुराया नहीं. बस इतना बोला - ‘मैं रहूं या न रहूं सर, पर लड़ाई ज़िंदा रहेगी.’ मैं जंगल से बाहर आ गया, लेकिन वह लड़का आज भी मेरे भीतर बैठा है. 23 साल का एक आदिवासी युवक अपनी लड़ाई के लिए इतनी कठोर प्रतिबद्धता. मैं आज भी सोचता हूं. अगर मेरे देश का हर युवा, अपनी ऊर्जा, हिंसा नहीं, राष्ट्र निर्माण में लगाए तो शायद, किसी जंगल में, किसी मनीष को यह वाक्य कहने की ज़रूरत ही न पड़े - ‘मैं रहूं न रहूं, पर लड़ाई ज़िंदा रहेगी.’
  • विकास तिवारी (कहानीकार ‘बस्तर टॉकिज’ चैनल के पत्रकार हैं.)