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Home गेस्ट ब्लॉग

हां मैं अयोध्या जाऊंगा…

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 24, 2024
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अगर मुझे किसी मंदिर से और किसी वेश्यालय से एक साथ निमंत्रण मिले तो मैं वेश्यालय जाना पसंद करूंगा, क्योंकि वहां पर मुझे हाड़ मांस का एक पुतला तो मिलेगा, कोई पत्थर का बुत नहीं. मैं उस समय सबसे ज़्यादा संतुष्ट महसूस करता हूं जब मैं समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति या समूह के संसर्ग में रहता हूं –

  • हो सकता है कि उसका बदन पसीने की दुर्गंध में डूबा हुआ हो !
  • हो सकता है कि उसकी ज़ुबान मेरी जैसी नहीं हो !
  • हो सकता है कि उसके पास घर जैसी कोई चीज़ नहीं हो !
  • हो सकता है कि उसके पास कोई ज़रिया ए माश नहीं हो !
  • हो सकता है कि वह जीने के लिए महज़ इत्तेफाक या कुदरत के रहमोकरम पर निर्भर हो !
  • हो सकता है कि वह सांस लेने भर को ज़िंदा रहना समझता हो !

क्या वह आदमी की हमारी परिभाषा में फ़िट नहीं बैठता है ? अब तुम ख़ुद को एक परिस्थिति में सोच कर देखो. फ़र्ज़ करो कि तुम एक सर्द, अंधेरी रात में एक छोटे से स्टेशन पर उतर आए हो. वहां से तुम्हें एक शहर जाना है नई नौकरी ज्वॉयन करने के लिए, लेकिन पहली बस सुबह को मिलेगी.

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तुम स्टेशन से बाहर आते हो और बाहर तुम्हें कुछ लोग अलाव को घेर कर बैठे हुए दिख जाते हैं. कड़ाके की ठंड है और तुम्हारे पास इंतज़ार करने के सिवा और कोई चारा नहीं है. अलाव को घेरे हुए लोगों को देख कर तुम्हें एक प्रागैतिहासिक युग याद आता है, जब आग का आविष्कार हुआ था.

तुम्हें याद आता है किस तरह से प्रागैतिहासिक काल का मानव जंगली जानवरों और ठंढ से बचने के लिए आग या अलाव के इर्द-गिर्द गोल घेरा बनाकर रात गुज़ार देते थे. इस रात तुम्हारे लिए बस दो ही रास्ते हैं – या तो तुम उन जंगली जानवरों में से एक जैसा दूर, अलग थलग खड़े हो कर आग के बुझने का इंतज़ार करो आदमी पर हमला करने के लिए, या अलाव के चारों तरफ़ बैठे लोगों में शामिल हो जाओ.

तुम्हारी इगो तुम्हें जानवर बना देगी और तुम्हारी मानवता तुम्हें उस भीड़ में शामिल कर देगी जो, छोटी ही सही, लेकिन आग के इर्द-गिर्द इकट्ठी हुई है. बस यही एक पल निर्णय का है ! यही एक पल है अपनी संवेदनाओं के सामने समर्पण का या अपने अहंकार के हाथों क़ैद होने का.

तुम्हें फ़ैसला करना है कि तुम्हें कुली कबाड़ियों के साथ जाकर बैठना है या अपने सूट की गर्मी में खुद को समेट लेना है ? यही एक पल तुम्हें आदमी से जानवर बना सकता है और उसके उलट भी. सोचो कि मेरे पहले वाक्य का अर्थ क्या है. जीवन हर हाल में मृत्यु से बेहतर है, बशर्ते कि तुम जीवन का सही अर्थ समझते हो.

हां मैं अयोध्या जाऊंगा
पहले भी गया था और
सैकड़ों मंदिरों
तंग गलियों
सूने मस्जिद
और सरयू के तट को
छू कर लौट आया था

हां मैं अयोध्या जाऊँगा
जैसे मैंने देखा है मीनाक्षी मंदिर
विश्वनाथ मंदिर
पुरी मंदिर
सूर्य मंदिर
और सैकड़ों ऐसे मंदिर
जिनके दरों दीवारों पर
लिखी हुई है
चोल, विजयनगर और उत्कल
सरीखे अनगिनत साम्राज्यों की
अमिट कहानी

मैं भारत के सबसे पुराने गिर्जा घरों में भी गया हूं
और सबसे पुरानी मस्जिदों में भी गया हूं

मैंने धनपशुओं द्वारा बनाए गए
बिड़ला मंदिर और स्वामीनारायण के
लोटस मंदिर भी देखा है

चारों धाम देखा है

लेकिन जो शांति मुझे
बचपन में देखे गए
उस खंडहर नुमा शिवाले में मिली
सच कहूं तो
और कहीं आज तक नहीं मिली

मैं अक्सर उसकी टूटी फूटी
सीढ़ियों पर बैठ कर
गांव की किसी महिला को
घी का दीपक जलाते हुए
पुजारी की भूमिका में
ढलते हुए चुपचाप देखता था

मुझे शिवलिंग में तो एक
तराशे हुए पत्थर से ज़्यादा
कुछ नहीं दिखता था लेकिन
उस स्त्री के चेहरे को
उस छोटे से दीपक की लौ
एक अद्भुत आवेग पूर्ण सौंदर्य से
भर देती थी
और मैं अवाक हो कर देखता था
एक स्वच्छ नदी को
रोशनी में नहाए हुए

हां मैं अयोध्या जाऊंगा
और इस बार
ज़मींदोज़ मस्जिद में जाऊंगा

मैं उन खूंरेज़ हाथों को याद करूंगा
और खंडहर में बैठे सोचूंगा कि
क्या फ़र्क़ है मीर बकी में और उन लोगों में
अगर ये सच भी है कि मीर बकी ने
एक मंदिर की क़ीमत पर
एक मस्जिद बनाई थी

मैं पांच सौ साठ साल पीछे चला जाऊंगा
और इक्कीस वीं सदी और
सोलहवीं सदी के बीच के
पुल को ढूंढ लूंगा

अपने सुनहरे वर्क को पलटते हुए
सरयू जब रात के अंधेरे में खो जाएगी
तब भी मैं उसके किनारे खड़े हो कर
दृश्य तीत ध्वनि के माध्यम से
इतिहास की करवटों को
लिपि बद्ध करने की कोशिश करूंगा

हां मैं अयोध्या जाऊंगा
किसी इतिहास को बनते हुए देखने के लिए नहीं
वरन मिटते हुए देखने जाऊंगा

हां मैं अयोध्या जाऊंगा
और आदमी के शरीर पर
फिर से उग आए पूंछ की
तस्वीर ले कर लौटूंगा

हां मैं अयोध्या जाऊंगा

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