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बनारस, गंगा घाट के पंडों-ठगों का अड्डा नहीं, क्रांतिकारियों की कर्मभूमि है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 13, 2024
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बनारस, गंगा घाट के पंडों-ठगों का अड्डा नहीं, क्रांतिकारियों की कर्मभूमि है
बनारस, गंगा घाट के पंडों-ठगों का अड्डा नहीं, क्रांतिकारियों की कर्मभूमि है

अंग्रेज़ औपनिवेशिक लुटेरों से आज़ादी मिलने के बाद से ही, यूं तो, वाराणसी/बनारस को इसी तरह प्रस्तुत किया गया है कि यह, गंगा के अस्सी घाट पर मंडरा रहे, मोटे-ताज़े, पंडों-ठगों की शिकारगाह मात्र है. भगवा वस्त्र और सारे पाखंडी उपकरणों से लैस, यह गिरोह, भोले-भाले, ग़रीब और धर्म के नशे में गाफ़िल लोगों को ठगने के षडयंत्र रच रहे होते हैं.

2014 के बाद से तो, बिके हुए और सड़ चुके चुके मीडिया की बदौलत, योजनाबद्ध तरीक़े से, इस खूबसूरत, ऐतिहासिक शहर, बनारस की ऐसी छवि गढ़ी गई है, मानो, यह कोई मध्ययुगीन शहर है, जहां गंगा-आरती, और अध-जले शवों को गंगा में बहाने के अलावा, ना कभी कुछ हुआ है, और ना आज कुछ होता है. बनारस में तो, मानो, बस स्वर्ग की बुकिंग ही होती है !!

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आने वाली नस्लों की तो छोडिए, आज की युवा पीढ़ी को भी शायद ही मालूम हो कि यही बनारस, हमारे शानदार आज़ादी आंदोलन और उसकी भी गौरवशाली क्रांतिकारी धारा की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है. कुंवर प्रताप सिंह बरहठ, रास बिहारी बोस, जे सी मुख़र्जी, चंद्रशेखर आज़ाद, शचीन्द्रनाथ सन्याल, राजेन्द्र लाहिड़ी, राजगुरु, भूपेन्द्र नाथ सन्याल समेत अनेक क्रांतिकारियों की कई अहम ऐतिहासिक गतिविधियां इसी बनारस की धरती पर हुई हैं. क्रांतिकारी आंदोलन के एक प्रमुख औज़ार, ‘अनुशीलन समिति’ की बनारस शाखा बहुत प्रभावशाली और गौरवशाली रही है.

सन्याल परिवार का शानदार इतिहास

मूलरूप से कलकत्ता के रहने वाले, बंगाली सन्याल परिवार का पुश्तैनी घर, बनारस के मदनपुरा मोहल्ले में है. 20वीं सदी के शुरू में ही, यह परिवार, कलकत्ता से पूरी तरह शिफ्ट होकर बनारस आ गया था. यह घर हरिनाथ सन्याल ने 19वीं शताब्दी में तामीर किया था. दिलचस्प विडम्बना देखिए, हरी नाथ सन्याल, 19वीं सदी में, अंग्रेज़ हुकूमत में, अफ़गानिस्तान से लगे, नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में, चीफ अकाउंटेंट हुआ करते थे.

चित्र – 1

कौन कह सकता है, कि सभी बड़े अंग्रेज़ हाकिमों के साथ उठने-बैठने वाले, हरिनाथ सन्याल के खाते-पीते परिवार में जन्मे, उनके चारों बेटे, सचिंद्रनाथ, रबीन्द्रनाथ, जितेन्द्रनाथ तथा भूपेन्द्रनाथ, अंगरेज़ हुकूमत के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान करते हुए, आज़ादी आंदोलन की क्रांतिकारी धारा में कूद पड़ेंगे और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे ?

दरअसल, इस बंगाली परिवार में क्रांतिकारी समझदारी का बीजारोपण करने वालीं, हरिनाथ सन्याल की पत्नी, खेरोदवासिनी देवी थी. अंग्रेजों की पार्टियों में, अपने पति के साथ वे शामिल ज़रूर होती थीं, लेकिन हर पार्टी के बाद, अंग्रेज़ों की गुलामी की ज़िल्लत, उनके कटाक्ष और अपने देशवासियों से एक तरह की गद्दारी की भावना से उपजा क्रोध, उनके दिल में इकठ्ठा होता जा रहा था.

अंग्रेजों की पार्टियों में, वे, देसी सामंतों, रायबहादुरों, सरों को भी ही-ही करते, अंग्रेज़ अधिकारियों की ख़ुशामद करते देखती थीं. इसीलिए उनके सीने में अंग्रेज़ हुकूमत से ही नहीं, बल्कि दमनकारी अंगरेज़-सामंत-रायबहादुर-सर गठजोड़ से भी बगावत की ज्वाला, इस क़दर धधक रही थी कि गोपनीय क्रांतिकारी संगठन, ‘अनुशीलन समिती’ की बनारस ईकाई प्रमुख, जे सी मुख़र्जी के अनुसार, क्रांति की राह पर चलने वालों के आख़िरी अंजाम को जानते हुए भी, उन्होंने, माथा ऊंचाकर, अपने एक भाषण में कहा था –

‘मुझे अफ़सोस है कि मेरे चार ही बेटे हैं, क्रांतिकारी आंदोलन को समर्पित करने के लिए !’

शचीन्द्रनाथ सन्याल बहुत ही सक्षम और प्रतिभावान क्रांतिकारी थे, जिन्होंने कई क्रांतिकारी गढ़े, जिनमें सबसे प्रमुख हैं, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, जिन्हें, काकोरी कांड में ना सिर्फ फांसी हुई, बल्कि फांसी की तयशुदा तारीख, 19 दिसंबर 1927 से 2 दिन पहले, 17 दिसंबर को हुई, क्योंकि अंग्रेज़ जान चुके थे कि गोंडा जेल पर क्रांतिकारियों के, जिन्हें वे आतंकी कहते थे, होने वाले हमले को वे रोक नहीं पाएंगे.

चित्र – 2

सचीन्द्रनाथ सन्याल ने 25 साल जेलों में बिताए, लेकिन विभिन्न जेलों में रहते हुए भी, वहां बंद ग़दर पार्टी के अनेक कार्यकर्ताओं को, सही माने में आज़ाद कराने के लिए, क्रांति की राह पर चलने को प्रेरित किया. 1915 के पास, ग़दर पार्टी के हज़ारों कार्यकर्ता अमेरिका से लौटे थे. वे लोग अंग्रेज़ हुकूमत तथा सामंती शोषण के ख़िलाफ़ बग़ावत और क़ुरबानी के ज़ज्बे से सराबोर थे, लेकिन संगठन ना बना पाने के कारण बेचैन भी थे.

सचीन्द्रनाथ सन्याल और रास बिहारी बोस ने उन्हें संगठित करने के गंभीर प्रयास किए. ग़दर पार्टी के क्रांतिकारी कार्यकर्ता, सिख धर्म के प्रभाव में भी थे. इसलिए आज के तिरंगे झंडे के वज़ूद में आने से 30 साल पहले, इस क्रांतिकारी समूह ने भी एक तिरंगा झंडा चुना था, जिसमें सिख धर्म का प्रतीक पीला, लाल और हरा रंग थे.

बनारस षडयंत्र केस

बनारस के क्रांतिकारी नवयुवकों की पहल पर पहली जंग-ए-आज़ादी, 1857 की तर्ज़ पर ही, 19 फरवरी 1915 के दिन देशव्यापी विद्रोह की योजना बनाई गई थी. यह ऐतिहासिक परिघटना, ‘बनारस कांस्पीरेसी केस, 1915-16’ के नाम से विख्यात हुई.

किसी भी विद्रोह को क़ामयाब होने के लिए एक सुसंगठित क्रांतिकारी पार्टी और देश की ठोस वस्तुगत परिस्थितियों का ठोस मूल्यांकन करते हुए, सही राजनीतिक लाइन लेने की दरकार होती है. ऐसा ना होने के कारण, यह विद्रोह आसानी से कुचल दिया गया. अंग्रेज़, लेकिन, इस आधे-अधूरे प्रयास से ही दहल गए थे.

चित्र – 3

इसका सबूत, कुख्यात अंग्रेज़ कसाई जनरल माइकल ओ डायर की पुस्तक, ‘इंडिया एज आई न्यू इट’ से मिलता है, जिसमें यह मगरूर पुलिस अधिकारी लिखता है कि इंडिया से इंग्लैंड आते वक़्त वह, पीले, लाल और हरे रंग वाला तिरंगा झंडा, यादगार को संजोने, संभाल कर रखने के लिए, अपने साथ ले आया था.

अंडमान निकोबार जेल से, सचिंद्रनाथ सन्याल द्वारा अपने भाई रबीन्द्रनाथ सन्याल को लिखा पत्र ‘बनारस षडयंत्र केस’ का नेतृत्व, एक बहुत ही दिलचस्प क्रांतिकारी किरदार ने किया, जिनका नाम था, कुंवर प्रताप सिंह बरहठ. ‘कुंवर साहब’ अंग्रेज़ गुलामी की ज़िल्लत से इस क़दर आक्रोशित थे कि दिसंबर 1912 में, तत्कालीन अंग्रेज़ वायसराय, चार्ल्स हार्डिंग की बग्गी पर, दिल्ली में हुए हमले में भी, कुंवर प्रताप सिंह बरहठ और उनके चाचा, जितेन्द्र सिंह बरहठ मुख्य आरोपी थे.

बरहठ परिवार भी बनारस से ही ताल्लुक रखता था. रासबिहारी बोस, सचिंद्रनाथ सन्याल और अमेरिका, कनाडा से, आज़ादी की असली जंग में भाग लेने लौटे ग़दर पार्टी के हज़ारों अनाम कार्यकर्ताओं ने एक संगठन ज़रूर स्थापित कर लिया था, लेकिन वह संगठन, असली क्रांतिकारी पार्टी का रूप नहीं ले पाया था.

संगठन को मज़बूत और देशव्यापी बनाने का कष्टसाध्य काम किए बगैर जोश और भावनात्मक आवेश में छिड़ा ये संघर्ष, अंग्रेजों द्वारा आसानी से कुचल दिया गया. शहीद-ए-आज़म भगतसिंह के शब्दों में, ‘बम और पिस्तौल क्रांति नहीं लाते, क्रांति की धार तो विचारों की सान पर तेज़ होती है’.

1915 के बाद, अर्थात प्रथम विश्व युद्ध का वक़्त, देश और दुनियाभर में क्रांतिकारी राजनीति के उभार का वक़्त था. यह क्रांतिकारी लहर 1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद अपने उरूज पर पहुंची, जिसने शहीद-ए-आज़म भगतसिंह जैसा हीरा पैदा किया. समूचे बंगाल, बिहार, यू पी (यूनाईटेड प्रोविंस) तथा समूचे पंजाब (रावलपिंडी से होडल तक) तक फैली, सारी क्रांतिकारी ऊर्जा को संगठत करने और दिशा देने की ज़िम्मेदारी जिन लोगों ने संभाली हुई थी, उनमें सचिंद्रनाथ सन्याल तथा रासबिहारी बोस के नाम शीर्ष पर थे.

बनारस षडयंत्र मामले में सचीन्द्रनाथ सन्याल, जितेन्द्रनाथ सन्याल तथा रबीन्द्रनाथ सन्याल, तीनों भाई गिरफ्तार हुए थे. सचीन्द्रनाथ सन्याल को आजीवन कारावास की सजा हुई, और उन्हें अंडमान की कुख्यात जेल में, जिसे ‘काला पानी’ की सजा बोला जाता था, डाल दिया गया. लेकिन उन्हें भरोसा नहीं हुआ, जब 1920 में उन्हें ‘मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधारों’ के तहत रिहा कर दिया गया.

अंग्रेज़ों ने सोचा होगा, बाहर जाकर वे, उनकी कीर्तन में शामिल हो जाएंगे, लेकिन उन्हें नहीं मालूम था कि सचिंद्रनाथ सन्याल किस मिटटी के बने हैं !! बिना कोई वक़्त गंवाए, वे फिर से क्रांतिकारियों को संगठित करने में लग गए.

लाहौर के नेशनल कॉलेज में भगतसिंह और सुखदेव के सबसे प्रिय शिक्षक थे प्रख्यात इतिहासकार, जयचंद्र विद्यालंकार, जो सचीन्द्रनाथ सन्याल को भी जानते थे. अत: सचीन्द्रनाथ सन्याल बनारस से सीधे लाहौर पहुंचे तथा भगतसिंह और सुखदेव से मिले. ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के गठन में भी सचीन्द्रनाथ सन्याल ने प्रमुख भूमिका निभाई.

सचीन्द्रनाथ सन्याल, ‘अनुशीलन समिति’ की बिहार इकाई के संस्थापक अध्यक्ष थे. वे 1930 में, ‘लाहौर षडयंत्र मामले’ में भी गिरफ्तार हुए थे. उन्हें काकोरी कांड में भी आजीवन कारावास की सज़ा हुई थी. जेल जीवन की कठिनाईयों का सजीव वर्णन करते हुए, उन्होंने 1930 में ‘बंदी जीवन’ नाम की पुस्तक लिखी है जिसे उसके बाद अंग्रेज़ों ने तो प्रकाशित नहीं ही होने दिया लेकिन 1947 के बाद, भारतीय हुकूमत ने भी नहीं प्रकाशित होने दिया. उसका प्रकाशन 2002 में बंगाल के लोगों के प्रयासों से ही हो पाया.

अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद को उनके पिताजी संस्कृत का विद्वान् बनाना चाहते थे. इसलिए उनका दाख़िला काशी विद्यापीठ में कराया गया, लेकिन वे संस्कृत की पोथियां बाजू में रखकर, 1921 में महज़ 15 साल की उम्र में असहयोग आंदोलन में कूद गए. उसी साल 20 दिसंबर को वे बनारस में ही गिरफ्तार हुए थे, जहां उन्हें पारसी जज, एम. पी. खरेघात की अदालत में पेश किया गया. ‘आपका नाम क्या है ?’ ‘चंद्रशेखर आज़ाद.’ ‘पिताजी का नाम ?’ ‘स्वतंत्रता.’ ‘रहते कहां हो ?’ ‘जेल में.’ जज ने चिढ़कर उन्हें 15 कोड़ों की सज़ा सुनाई. चंद्रशेखर आज़ाद के जीवन का ये बहुत प्रेरणादायक वाक़या, बनारस की अदालत का ही है.

23 मार्च 1931 को, शहीद-ए-आज़म भगतसिंह के कॉमरेड, शिवराम हरी राजगुरु, जो अपने संगठन के सबसे अचूक निशानेबाज़ थे और क्रांति के ज़ज्बे से बेहद ओत-प्रोत थे, वे भी अपनी शिक्षा के लिए, पुणे छोड़कर बनारस आ गए थे, और बनारस के अग्नीश्वर तीर्थ क्षेत्र में, पत्नीटोला मोहल्ले में रहे थे. वहीं से एक टीन की संदूक में अपना सारा सामान भरकर, वे लाहौर गए और ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ में भर्ती हो गए.

बनारस की सबसे मौज्ज़िज़ हस्ती, उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का, बा-इज्ज़त उल्लेख किए बगैर, बनारस की दास्तां भला कैसे पूरी हो सकती है. उनकी शहनाई और भलमनसाहत का ये देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया दीवानी है. बनारस और बिस्मिल्लाह खां, एक साथ ही जुबान पर आते हैं. फ़ासिस्ट मोदी हुकूमत जिसकी जड़ें खोद डालना चाहती है, उस गंगा-जमुनी तहज़ीब का विचार ही बनारस की मिटटी में उपजा. इस देश की पहचान, गंगा-जमुनी तहज़ीब की जड़ें, ये फासिस्ट टोला नहीं खोद पाएगा.

अज्ञान हैं, मूर्ख हैं ये लोग. वे यह भी नहीं जानते कि बनारस की यही मुक़द्दस मिटटी, एक ऐसा नायाब हीरा भी पैदा कर चुकी है, जिसने आज से 700 साल पहले, गंगा-जमुनी तहज़ीब की बुनियाद को तैयार किया और फ़ौलादी अटूट बनाया. कोई यह सोच भी नहीं सकता कि ये सब उस इंसान ने उस युग में किया, जब सामंती हुकूमतें थीं, जो मज़हबी फ़तवों से ही चला करती थीं. मुल्ला-मौलवी और ब्राह्मण-पंडे लोगों की समाज में तूती बोलती थे, लेकिन उन्हें ही अपने निशाने पर लेने वाले इस अनमोल रत्न, कबीर का जन्म 1398 ई में इसी बनारस में हुआ था.

कबीर ने, खुशकिस्मती से बहुत लंबी उम्र पाई. 1518 में मगहर में अपनी मौत से पहले के अपने 120 साल के जीवन में जो लिखा है, वैसा कोई आज लिख दे तो यूएपीए में गिरफ्तार हो जाएगा. कबीर की वाणी, आज भी फ़िरकापरस्त फंडू कबीर के दोहे सुनकर हांफने लगते हैं, उनका हलक सूख जाता है. पंडों-ठगों की सारी बेहूदगी और दिन भर चलने वाली उनकी आरतियों के पाखंड को, तराजू के एक पलड़े में और कबीर की वाणी को दूसरे पलड़े में रख दिया जाए, तो कौन सा पलड़ा भारी रहेगा, देश का बच्चा-बच्चा जानता है.

हम लोगों का निकम्मापन है कि हमने कबीर की वाणी को घर-घर नहीं पहुंचाया. पंडे-मौलवी दोनों कबीर से दहशत मानते हैं. एक-एक दोहा, अस्सी घाट पर उनकी दिन-रात चलने वाली आरतियों पर भारी है –

डूबा औंधर ना तरै, मोही अंदेशा होय;
लोग नदी की धार में कहां पड़ा नर सोए.
धीरे रे मना धीरे, धीरे सब कुछ होए;
माली सींचे सौ घड़ा, रुत आए फल होए.
कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति ना होए;
भक्ति करे कोई सूरमा, जाति बरन कुल खोए.
कथनी के सूरे घने, थोथे बांधें तीर;
बिरह बाण जिनके लगा तिनके विकल शरीर.

‘मुझे तो गंगा मैय्या ने बुलाया है’

2014 के बाद से, गंगा-जमुनी तहज़ीब के सूत्रधार बनारस को भाजपा-संघ ने अपने निशाने पर लिया हुआ है. बनारस के पंडों-ठगों के अचानक इतने अच्छे दिन आ जाएंगे, यह उन्होंने ख़ुद भी कभी नहीं सोचा होगा !! पिछले दस सालों में एक बार भी नहीं हुआ, जब प्रधानमंत्री ने बनारस के बुनकरों की समस्याओं, वहां के युवकों के रोज़गार, मंहगाई, उद्योगों की लुप्तता, कृषि संकट, असंगठित व संगठित मज़दूरों की भयंकर बदहाली पर चर्चा की हो.

क्या बनारस में कुम्भ का मेला, आरतियों और विश्वनाथ मंदिर तक कोरिडोर के अतिरिक्त कोई समस्या नहीं ? बनारस के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान, गुंडों की शिकारगाह बन चुके हैं, बच्चियां कैंपस के अंदर भी सुरक्षित महसूस नहीं करतीं, क्या प्रधानमंत्री नहीं जानते ? क्या गंगा मैय्या ने मोदी को बस वहां आरती करने और देश-विदेश के राज्याध्यक्षों को, घंटों, ज़बरदस्ती आरती कराने के लिए ही बुलाया है ?  तब तो गंगा मैय्या ने उन्हें बुलाकर ठीक नहीं किया !!

  • सत्यवीर सिंह

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