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‘चुप्पी तोड़ो’ कश्मीर में जुल्म की दास्तान

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 2, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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‘कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है’ मानने वालों ने कश्मीर को पूरी तरह जेल में तब्दील कर दिया है. वहां के तमाम संचार माध्यमों को पूरी तरह बंद कर दिया है. लोगों को अपने-अपने घरों में तकरीबन एक महीने से भूखे-प्यासे मरने के लिए मजबूर कर दिया है. वहां पर लाखों की तादाद में सेनाओं को भर कर कश्मीरी आवाम को राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाया जा रहा है. वहां की कोई भी खबरें देश में नहीं आ पा रही है. गुंंडे बन चुके मुख्य मीडिया घराना के लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है. ऐसे में कश्मीरी आवाम की मौजूदा हालात की खबरों के लिए एक मात्र माध्यम विदेशी मीडिया चैनल्स ही रह गया है, जिसमें टुकड़े टुकड़े में खबरें आ पाती है. ऐसे में अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया में से एक अलजजीरा ने कश्मीरियों पर एक रिपोर्ट 20 मई, 2019 को प्रकाशित किया था, जिसमें प्रतिबंंध से पहले कश्मीर में सेना के द्वारा नागरिकों की उत्पीड़न की खबरें दी है, मौजूदा हालात उससे भी ज्यादा विभत्स है.

साथ ही यह भी बताना चाह रहे हैं कि इस रिपोर्ट में जो कश्मीरी आवाम के साथ जुल्मतों की दास्तान है, वह न केवल कश्मीर के लिए सच है बल्कि यह देश के अन्य भागों के लिए भी सत्य है. मसलन, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्रा, पूर्वोत्तर भारत समेत बिहार और झारखण्ड. देश के इन भागों में भी अपने अधिकारों के लिए आम नागरिकों पर इसी तरह जुल्म ढाये जा रहे हैं. हम अपने पाठकों के लिए अलजजीरा के इस लेख का हिन्दी अनुवाद अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं.

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'चुप्पी तोड़ो' कश्मीर में जुल्म की दास्तान

कश्मीर में मानवाधिकारों के लिए संघर्ष कर रही संस्थाओं का कहना है कि कश्मीर में विद्रोह को खत्म करने या उसे नियंत्रित करने के लिए भारत कश्मीरियों को यातना देने के लिए सेना का इस्तेमाल कर रहा है.

लापता लोगों के मांं-बापों के सङ्गठन, ‘एसोसिएशन ऑफ पेरेंट्स ऑफ डिस-एपीयर्ड पर्सन्स’, और जम्मू-कश्मीर नागरिक समाज के गठबंधन ने जेलों में बंद लोगों को यातनाएं देने पर अपनी 560 पेज की रिपोर्ट बनाई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि कश्मीरी को यातना देने के लिए एकान्त कारावास, नींद न लेने देना, बलात्कार, सोडोमी सहित यौन उत्पीड़न, कश्मीरियों के खिलाफ यातना तकनीकों के रूप में उपयोग किया जाता है. इसके अतिरिक्त यातना देने के अन्य उपायों में बिजली के करेंट से प्राणदण्ड, छत से फांसी के फंदे से लटकाना, पानी द्वारा सांस अवरुद्ध करना आदि भी शामिल है.

यातना देते समय उन्हें पूरी तरह नंगा कर दिया जाता है, लकड़ी की छड़ियों से पीटा जाता है, लोहे की छड़ों को उनके गुदा में ढूंसा जाता है, जिससे उनकी आंतें जख्मी हो जाती है.

त्राल के मुज़फ़्फ़र अहमद मिर्ज़ा और मंज़ूर अहमद नाइकू की गुदा के में एक रॉड घुसेड़ी गईं, जिससे उसकी आंतें जख्मी हो गईं. इससे सम्बंधित कुल 432 साक्ष्य दर्ज किये गए, उनमें से एक साक्ष्य ऐसा कहता है, ‘रॉड घुसेड़ने के अलावा, नाइकू के लिंग के चारों ओर एक कपड़ा लपेटा गया और आग लगा दी गई.’ अस्पताल में कुछ दिनों के बाद मिर्जा की मृत्यु हो गई, नाइको को इस अत्याचार के कारण प्राप्त घावों को ठीक करने के लिए पांच सर्जरी से गुजरना पड़ा.

‘अधिकारों का उल्लंघन ‘

इस शीर्षक से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि, भारत, यातना को जम्मू-कश्मीर के लोगों के विरुद्ध एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है’, यातना शिविरों में यातना भुगत रहे लोगों में 70 प्रतिशत तो  जम्मू-कश्मीर के नागरिक ही है. भारत ने अपने शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह को शांत करने के लिए विवादित मुस्लिम-बहुल क्षेत्र में पांच लाख  से अधिक सुरक्षा बलों को तैनात किया है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संघ ने पिछले साल मानवाधिकारों के उल्लंघन की अंतरराष्ट्रीय जांच में भारतीय सेनाओं द्वारा बल के अत्यधिक उपयोग के लिए उसकी आलोचना की थी .

सीओआई, संयुक्त राष्ट्र की उच्चस्तरीय जांच एजेंसी है, जो आम तौर पर सीरिया संघर्ष जैसे प्रमुख संकटों के लिए आरक्षित है. उसने भी कश्मीर मामलों की जांच की थी. इसने भी सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) को निरस्त करने का आह्वान किया है, जो एक ऐसा कानून है जो अभियोजन पक्ष को प्रतिरक्षा प्रदान करता है.

रिपोर्ट, जो 1990 के दशक में सशस्त्र विद्रोह की शुरुआत के बाद से मामलों का खुलासा करती है, में कई बंदियों ने खुलासा किया कि उन्हें मानसिक दबाव में रखा गया था, जहां उन्हें उन गतिविधियों में शामिल किया गया था जो उनके ‘धार्मिक विश्वासों’ के खिलाफ थी, जैसे कि उनके शरीर पर सुअर के बच्चों को रगड़ना या उन्हें शराब का सेवन करने के लिए मजबूर करना.

कुछ मामलों में, कहा गया है, चूहों के पैरों पर चीनी का पानी छिड़क कर पीड़ितों के पतलून के अंदर डाल दिया जाता था. रिपोर्ट में कहा गया है कि, ‘कैदियों को मानव मल, मिर्च पाउडर, गंदगी, बजरी, मिर्च पाउडर मिश्रित पानी, पेट्रोल, मूत्र और गंदे पानी जैसे गंदे और हानिकारक पदार्थों को खाने या पीने के लिए मजबूर किया जाता है.’ मात्र तीन साल की बच्ची के साथ बलात्कार को लेकर कश्मीर में हजारों लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया था.

रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि अधिकांश पीड़ित नागरिक आमतौर पर सुरक्षा बलों के हाथों बदले की भावना से होने वाली कार्यवाहियों के डर के वशीभूत  अत्याचार की रिपोर्ट करने के अनिच्छुक थे. नागरिकों को मनमाने ढंग से उठाया जाता है, प्रताड़ित किया किया जाता है और यह भी नहीं बताया जाता कि उन्हें किसलिए यातना दी गई थी.’

रिपोर्ट के एक प्रस्ताव में, यातना पर संयुक्त राष्ट्र के पूर्व विशेष दूत, जुआन ई मेंडेज ने कहा, यह रिपोर्ट ‘भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड के बारे में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित करने में काफी मददगार होगी.’ मानव अधिकार वकील और जेकेसीसी के अध्यक्ष परवेज इमरोज ने अल जजीरा को बताया कि, ‘कैदियों को यातना देना पिछले कई दशकों से इस क्षेत्र में अप्रत्याशित रूप से और बड़े पैमाने पर होने वाले मानव अधिकार उलंघनों में से एक है.’

उन्होंने कहा कि ‘यह रिपोर्ट इस जघन्य अपराध और उसके बाद फैले डर के वशीभूत फैली चुप्पी को तोड़ने का एक प्रयास है.’ जम्मू-कश्मीर राज्य के पुलिस महानिदेशक दिलबाग सिंह ने यातना के सारे दावों को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा, ‘इस तरह के कोई मामले नहीं हैं, यदि उनके पास ऐसा कोई मामला है, तो उन्हें हमें बताना होगा और हम उनका जवाब देंगे. अगर कोई आरोप लगाए हैं तो मजिस्ट्रियल पूछताछ और अन्य जांच हैं, जिनके आधार पर उनका परीक्षण किया जा सकता है.’ अशांत क्षेत्र के गवर्नर के सलाहकार, विजय कुमार ने कहा कि ‘वह रिपोर्ट पढ़ने के बाद ही कोई टिप्पणी करेंगे.’

रिपोर्ट में कहा गया है कि 432 में से आधे से अधिक पीड़ितों को यातना दिए जाने के बाद उन्हें स्वास्थ्य जटिलताओं का सामना करना पड़ा. इनमें 24 महिलाएं हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें से 12 के साथ सशस्त्रकर्मियों ने बलात्कार किया था. यातना के शिकार लोगों ने बताया कि उनके शारीरिक घाव तो भर गए परंतु मानसिक आघात से से उन्हें अभी उभरना बाकी है.

2015 में डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स  (फ्रेंच प्रारंभिक एमएसएफ से पहचाने जाने वाले) में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि इस क्षेत्र में 19 प्रतिशत आबादी पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) से पीड़ित है.

हालांकि भारत 1997 से अत्याचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCAT) का एक हस्ताक्षरकर्ता है, लेकिन उसने अभी तक इस संधि की पुष्टि नहीं की है.  2008, 2012 और 2017 में यूएनएचआरसी द्वारा आयोजित तीनों यूपीआर में, यह सिफारिश की गई थी कि भारत सम्मेलन को मंजूरी दे.

2010 में भारतीय संसद में अत्याचार निवारण विधेयक पेश किया गया था, लेकिन पारित नहीं किया गया और 2014 में यह स्वतः ही समाप्त हो गया.

खुर्रम परवेज, जो इस रिपोर्ट पर अन्य शोधकर्ताओं में से एक हैं, ने कहा कि यातना का शिकार हुए लोगों के इतिहास को मिटाने के राज्य के प्रयासों को विफल करने वाली है, साबित होगी.

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