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कोराना वायरस : अर्थव्यवस्था और प्रतिरोधक क्षमता

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 1, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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कोराना वायरस : अर्थव्यवस्था और प्रतिरोधक क्षमता

Kobad Gandhiकोबाड गांधी, पोलित ब्यूरो सदस्य, सीपीआई माओवादी

इस तकनीकी विकास के युग में व्यापक जनसमुदाय के अंदर सामूहिक डर (मास हिस्टीरिया) जंगल की आग की तरह फैल जाता है, खास तौर से जब शासकों और, या धर्म के जरिए उसे प्रोत्साहित किया जाता है. गणेश का दूध पीना इसका एक उदाहरण था. एक और उदाहरण स्काई लैब गिरने की ख़बर थी. 2000 ई. (y2k) संकट जैसे भयग्रस्तता के कई और उदाहरण हैं. झारखंड जेल में एक आदिवासी ने मुझे बताया था कि ‘उनके सुदूर गांव में लोगों ने 31 दिसम्बर, 2000 तक दुनिया ख़त्म हो जाने की बात पर विश्वास कर अपनी बकरियों को रोज काटना शुरू कर दिया था.’

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जन समुदाय के भीतर समाए डर और अपराधबोध से खेलना शासकों और धर्माचार्यों का पुराना आजमाया तरीक़ा रहा है. जब यह चरम सीमा तक पहुंच जाता है तो जनता पर सबसे ज्यादा चोट की जा सकती है. यहां तक कि कम्युनिस्ट और हमारे दैनिक जीवन के शातिर लोग इसे अंजाम देते हैं. हम आपस में भावनात्मक तरीके से एक-दूसरे पर प्रहार करतें हैं और हमारे अपराधबोध की भावना और डर का फायदा उठाया जाता है.

जब हम अपने तरह-तरह के डर पर नजर डालते हैं तो देखते हैं कि बहुत सारे डर हमें घेरे रहते हैं – अस्वीकार किए जाने, असफल होने, बीमारी इत्यादि का डर और सबसे ज्यादा मौत का डर जो मौजूदा कोराना बीमारी के कारण हमारे अंदर समा गया है.

यह सच है कि यह वायरस उच्च स्तर का संक्रामक है जो किसी वस्तु पर और मानव शरीर से बाहर 3-4 घंटे तक जीवित रहने की क्षमता रखता है इसलिए यह जंगल की आग की तरह फैल सकता है किन्तु इसकी मृत्यु दर सामान्य इनफ्लुएंजा से ज्यादा की नहीं है. इसके ज्यादातर शिकार वृद्ध और पहले से बीमार लोग हो रहे हैं. मृत्युदर अनुमानतः 3% से 0.5% तक है लेकिन सरकारी प्रचार तंत्र और मीडिया ने इसे भयानक जानलेवा वायरस घोषित कर दिया है इसलिए चारों तरफ भय व्याप्त हो गया है.

मौत का डर, अपनों के खोने का डर, अनजाना डर और इस भय ने रोजगार का खात्मा, कारोबार की हानि, बचत का नुक़सान और असुविधाओं को पैदा किया है, जिसने आने वाले दिनों में भुखमरी से मौत की आशंका को बढ़ाया और हमारी जीने की क्षमता को घटाया है.

दरअसल समूची विश्व अर्थवयवस्था पहले से ही गम्भीर संकट में चल रही है, जैसा कि हाल ही में मानस चक्रवर्ती ने कहा है कि – ‘पिछले हफ़्ते इक्विटी ही नहीं बल्कि बॉन्ड व माल, यहां तक की सोने के भाव में भारी गिरावट आ गई है. यह गिरावट इतनी ज्यादा थी कि सिर्फ नकदी ही सुरक्षित है, वह भी सिर्फ अमरीकी डालर ही मुख्य रूप से सुरक्षित स्वर्ग हो गया है, जिसकी मांग बढ़ती गई है.

अमरीका, यूरोप और अन्य विकसित अर्थवयवस्थाओं में ब्याजदर जीरो की तरफ लुढ़कता जा रहा. इस स्थिति में खरीददार के लिए सुरक्षित आखिरी रास्ता सिर्फ खरीदना ही होता है. सरकारों ने कारोबार उपभोक्ताओं को इस बढ़ते संकट से उबारने लिए दसियों खरब डॉलर खर्च करना मंजूर कर लिया है (भारत में अभी ऐसी स्थिति नहीं आयी है).

लेकिन यहां वायरस के फैलाव को रोकने के एक मात्र उपाय के रूप में सामाजिक मेल-मिलाप को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर अर्थव्यवस्था को ठप कर दिया गया है. स्पेन, इटली और फिर दुनिया कि पांचवीं बड़ी अर्थवयवस्था कैल्फोर्निया को ठप्प कर दिया गया है, इससे विश्व अर्थव्यवस्था को बड़ा धक्का लगना ही है.

फार्चून के अनुसार दूसरी तिमाही में ज्यादातर देशों की जीडीपी दर भयानक रूप से (-8%) से (-15%) तक गिर गई है. गोल्डमेन सैच ने इसे और कम होने की बात (पानी सर से ऊपर जाने) कही है.

बैंक ने आज शोध नोट जारी किया है, जिसके अनुसार ‘अमरीकी अर्थव्यवस्था के अचानक ठप्प’ हो जाने के कारण 2020 की दूसरी चौथाई में जीडीपी में 24% गिरावट की आशंका है.

पूरी दुनिया की सरकारों द्वारा जिस पैमाने पर लाकडाउन किया गया है, उससे अर्थवयवस्थाओं में सुधार की कोई उम्मीद नहीं बची है. पिछले छह महीने से चले आ रहे आर्थिक संकट के लिए, जिसका कोराना से कुछ लेना-देना नहीं है, यह एक बहाना हो गया है. 1929 की महामंदी के लिए पूंजीवादी व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया गया था. परंतु मौजूदा संकट के लिए जिम्मेदारी को बकायदा व्यवस्थागत समस्या को वायरस समस्या की ओर इसे मोड़ दिया गया है.

बहरहाल विश्व आज दो मुख्य समस्याओं का सामना कर रहा है. कोई नहीं कह सकता कि इनमें कौन ज्यादा जानलेवा है. पहली समस्या कोराना वायरस की है और दूसरी समस्या अर्थव्यवस्था की है. पहली समस्या दुनिया भर में फैल कर मौत का तांडव मचा सकती है तो दूसरी से पूरी दुनिया को भुखमरी और बीमारी की सबसे बुरी हालत में ला सकती है. पहली से हम अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा कर लड़ने की सोच सकतें हैं लेकिन दूसरी पर हमारा नियंत्रण नहीं है।

प्रतिरोधक क्षमता का मनोविज्ञान :

विज्ञान ने प्रतिरोधक क्षमता पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव (प्लसबो थ्योरी) को मान लिया है. इसके अनुसार मानव के दिमाग में वह क्षमता होती है कि वह अपने शरीर को बीमारी से उबार ले, यदि उसे किसी दवा या उपचार पर भरोसा हो जाए, भले ही उसमें औषधीय गुण नहीं हो और वह चीनी की गोली मात्र हो.

मेडिकल के विद्यार्थी अध्ययन में यह पाते हैं कि बहुत-सी बीमारियों में से एक तिहाई का उपचार मनोवैज्ञानिक असर के चमत्कार से हो जाता है. बीमारियों के इलाज में मनोवैज्ञानिक प्रभाव अब सर्वमान्य हो चुका है. कोराना वायरस जैसी बीमारी जिसकी कोई दवा नहीं है, से लड़ने में हमारी मजबूत प्रतिरोधक क्षमता केंद्रीय भूमिका निभा सकती है.

विज्ञान का नया क्षेत्र न्यूरोइम्युनोलॉजी है, जिसे आम भाषा में ऐसे कह सकते हैं कि मस्तिष्क द्वारा स्नायु तंत्र पर नियंत्रण के जरिए प्रतिरोधक क्षमता मजबूत की जा सकती है. यह सुस्वीकृत तथ्य है कि तनाव बढ़ाने वाला हार्मोन (कोर्टिसोल) हमारी प्रतिरोधक क्षमता को कम कर देता है, इससे हम वायरस या बैक्टीरिया से लड़ाई में कमजोर पड़ जाते हैं. दूसरी तरफ़ सकारात्मक नजरिया और प्रसन्नता वाले हार्मोन (एंडोर्फिन, डोपामाइन, सेरोटोनिन) हमारी प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करते हैं. अतः वायरस का डर और भयानक वातावरण का फैलना उससे लड़ने में हमारी प्रतिरोधक शक्ति को कमजोर कर सकता है.

अब यह भलीभांति मान लिया गया है कि आत्मविश्वास के बजाय डर के माहौल में गम्भीर बीमारी से लड़ने की क्षमता घट जाती है. कोराना जैसी बीमारी की कोई दवा नहीं है. प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करके ही इसका सामना किया जा सकता है इसलिए प्रतिरोधक क्षमता की कमजोरी को रोकने की प्राथमिकता महत्वपूर्ण है. जो भी पद्धति अपनायी जाय वह तार्किक व प्रभावी होनी चाहिए और हर तरीके से बीमारी का तार्किक मूल्यांकन कर डर व भयग्रस्तता के प्रचार का प्रभावी तरके से काट करनी चाहिए.

भारतवासियों की गरीबी के कारण पहले से कमजोर प्रतिरोधक क्षमता को उनके आत्मविश्वास को बढ़ाकर मजबूत करने की जरूरत है. कम से कम भय का आतंक फैलाना बन्द करके उनमें वायरस के संक्रमण को मजबूत होने से बचाएं.

[लगभग 70 वर्षीय कोबाड गांधी, सीपीआई माओवादी के पोलित ब्यूरो सदस्य रहे हैं. कुछ ही समय पहले वे 8 साल जेल में रहने के बाद जमानत पर बाहर आए हैं. इस समय वे कैंसर समेत कई रोगों से लड़ रहे हैं. यह लेख उन्होंने मूलतः अंग्रेज़ी में लिखा है, जिसका हिंदी अनुवाद असीम सत्यदेव ने किया है.]

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