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सरकारों का जरूरत से अधिक मजबूत होना जनता को कमजोर करता है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 14, 2020
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सरकारों का जरूरत से अधिक मजबूत होना जनता को कमजोर करता है

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

बीते मार्च महीने में, जब कोरोना संकट दुनिया के लगभग तमाम देशों को अपनी चपेट में ले चुका थ., एक बहस चलनी शुरू हुई थी कि ‘पोस्ट कोविड-19 वर्ल्ड’ का स्वरूप कैसा होगा ?

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हालांकि, अब जब जुलाई आधा बीतते दुनिया के कई देशों में संकट इतना गहरा चुका है कि भविष्य की रूपरेखा धुंधली लगने लगी है, वर्त्तमान से जूझने में ही इतनी ऊर्जा का व्यय हो रहा है कि आम लोग भविष्य के आकलन में अधिक दिलचस्पी नहीं ले पा रहे. लेकिन, वक्त के पिघलते हर कतरे के साथ भविष्य हमारे वर्त्तमान में समाता जाता है, जो कल भविष्य था वह आज वर्त्तमान है. तो, बीते चार-पांच महीनों के अनुभव ही हमें यह बताने के लिये पर्याप्त हैं कि आने वाले समय में हम कैसी दुनिया में कदम रखने वाले हैं.

महामारी की सघनता बढ़ने के साथ, जब दुनिया के कई समृद्ध और ताकतवर देशों की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्थाओं का दम फूलने लगा था, एक आम धारणा बनने लगी थी कि व्यवस्थाएं उत्तर-कोरोना दौर में जन सुविधाओं के सार्वजनिक तंत्र को फिर से सहेजने और मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करेंगी.

भारत में इन उम्मीदों को और अधिक बल मिल रहा था जहां जर्जर सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र संकट के शुरुआती चरण में ही हिचकोले खाने लगा था. निजी तंत्र ने इस संकट काल में जैसा रिएक्ट किया उससे लोगों की निराशा और बढ़ी.

आकलन तो यहां तक किये जाने लगे कि महामारी के दौरान देशों की सरकारों और जनता के बीच जितना ‘इंटरैक्शन’ बढ़ रहा है , संकट में फंसे आम लोगों की निर्भरता जिस प्रकार सरकारों पर बढ़ रही है, इसका एक सकारात्मक असर यह होगा कि सरकारी तंत्र मजबूत होगा और संरचनाओं पर निजी क्षेत्र की पकड़ कमजोर होगी. लेकिन, जैसा कि कहा जाता है, सभी खुशफहमियों की उम्र लंबी नहीं होती. कुछ तो बहुत जल्दी ही दम तोड़ जाती हैं.

जैसे, मार्च-अप्रैल में जो खुशफहमी उफान पर थी कि कोरोना संकट सरकारी तंत्र को सशक्त बनाने का संदेश दे रहा है, वह जून-जुलाई आते-आते इस मंजर को देख दम तोड़ रही है कि तंत्र तो नहीं, संकट की आड़ में सरकारें मजबूत हो रही हैं.

सरकारों का जरूरत से अधिक मजबूत होना जनता को कमजोर करता है. अब जब जनता कमजोर होगी तो उसके सवालों की गूंज भी मद्धिम होगी. गूंजेगी तो सिर्फ उसके नेता की आवाज, जो सरकार का पर्याय बन कर ‘लार्जर दैन गवर्नमेंट’ बन जाता है.

हंगरी में उदार लोकतंत्र के नारे के साथ सत्ता में आए प्रधानमंत्री विक्टर ओरबन ने कोरोना संक्रमण की भयावहता और इससे जूझने के लिये देश को तैयार करने का हवाला देकर संविधान की ऐसी-तैसी करते हुए खुद को आजीवन प्रधानमंत्री घोषित कर लिया. हंगरी की संसद ने उनकी घोषणा के समर्थन में प्रस्ताव पारित कर दिया. अब उस देश में चुनाव अनिश्चित काल तक के लिये स्थगित कर दिए गए हैं.

यहां गौर करने की बात है कि ओरबन कारपोरेट शक्तियों के खासे दुलारे रहे हैं और श्रमिक अधिकारों को लेकर पिछले महीनों में हंगरी में हुए आंदोलनों को उन्होंने बेदर्दी से कुचलने की कोशिशें की हैं. सदाबहार ‘राष्ट्रनेता’ पुतिन अगले 2036 तक के लिये सत्ता की कमान अपने हाथों में बनाए रखने का कुचक्र रच रहे हैं. जनता के समर्थन का सुनियोजित छद्म हमेशा उनकी शक्ति रहा है. शी जिन-पिंग भी आजीवन सत्ताधीश बने रहेंगे. वहां के कम्युनिस्टों ने उनकी अपरिहार्यता का छद्म स्थापित कर लिया है.

कहने की जरूरत नहीं कि भीतरी जन असंतोष की दबी-ढकी सुगबुगाहटों के बीच जिनपिंग के पीछे कारपोरेट की शक्तियां पूरे दम-खम के साथ लगी हैं. ऐसे ही उदाहरण दुनिया के अनेक देशों में नजर आ रहे हैं, जहां महामारी के साये में जनता कमजोर हो रही है, सरकारें मजबूत हो रही हैं.

आज के दौर में सरकारों का मजबूत होना जनता के समर्थन से अधिक उन शक्तियों के समर्थन से संभव होता है, जो मूलतः जनविरोधी हैं और जनता का रक्त चूस कर ही बलवान बनती हैं. तो, सरकारी तंत्र बनाम सरकार की मजबूती का यह अंतर्विरोध कोरोनाकालीन दुनिया का ऐसा सच है जो नग्न रूप में हमारे सामने उपस्थित है.

अपने देश में भी ‘मजबूत सरकार’ है. सरकार से भी मजबूत सरकार के नेता हैं, जिनके पीछे बड़ी कारपोरेट शक्तियां तो हैं ही, विचारहीन समर्थकों का भी एक बड़ा आधार है. तो, कोरोना संकट के शुरुआती दौर की यह कल्पना कि जन-सुविधाओं की सरकारी संरचनाएं मजबूत होंगी, हमारे देश में बिखर कर रह गई हैं. ‘आपदा में अवसर’ का जो नारा दिया गया, उसका विशुद्ध कारपोरेटीकरण कर दिया गया.

ऐसे दौर में, जब जनता ज़िन्दगी और जीविका के संकट से जूझ रही है, देश के मजबूत नेता सरकारी संरचनाओं को जिस व्यग्रता और उतावली के साथ चुनिंदा निजी हाथों को सौंपते जा रहे हैं, उसका कोई तर्क समझ नहीं आ रहा, सिवाय इसके कि ‘हम तो यही करने आए थे…’. वे सही हैं. वे यही करने आए थे. इसमें छुपा हुआ क्या है ?

कोरोना ने उन्हें ऐसा अवसर दिया कि सड़कों पर जन विरोध का अधिक स्कोप भी नहीं है. हालांकि, पहले ही कौन-सा विरोध प्रभावी साबित हुआ था ? सड़कों पर उतर कर अंध निजीकरण का विरोध करने वाली जमातों के पास भी कोई चरित्र बल नहीं है, जो उनके विरोध को प्रभावी बना सके.

‘पोस्ट कोरोना वर्ल्ड’ की मार्च-अप्रैल कालीन परिकल्पनाओं का जुलाई आते-आते शीराज़ा बिखरने लगा है.

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