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विश्व सर्वहारा क्रांति के दो नये गद्दार : विश्व विजय और सीमा

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 27, 2026
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उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

‘ऑपरेशन कगार के खिलाफ और भारत में जनयुद्ध के समर्थन में लामबंदी जारी रखें’ – ICSPWI इटली

विश्व सर्वहारा क्रांति के दो नये गद्दार : विश्व विजय और सीमा
विश्व सर्वहारा क्रांति के दो नये गद्दार : विश्व विजय और सीमा

दुनिया के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आन्दोलन के गद्दारों में आज दो नाम और जुड़ गए हैं – विश्वविजय और सीमा. ये केवल दो और व्यक्ति नहीं जिन्होंने क्रांतिकारी पार्टी व जनता का नुकसान किया है बल्कि ये क्रांतिकारी आन्दोलन के भीतर अवसरवादी-विघटनवादी–संशोधनवादी लाईन के प्रतिनिधि हैं. आज हमारा आंदोलन गहरे संकट में है जिसके मुख्य कारणों में से एक है क्रन्तिकारी कम्युनिस्ट कतारों में शासक वर्गीय विचारधारा का प्रभाव बढ़ना. कॉमरेड माओ ने कहा था कि शासक वर्ग दो तरह से जनता पर युद्ध छेड़ता है – एक हथियार का इस्तेमाल कर के और दूसरा कलम का इस्तेमाल कर के. कलम का युद्ध ज़्यादा घातक है क्यूंकि वह दिखता नहीं है और क्रांतिकारी के भेष में क्रांति व सर्वहारा वर्ग के साथ गद्दारी करता है. आज के समय में इस कलम के युद्ध का प्रतिनिधित्व बलराज, वेणुगोपाल, रुपेश, देवजी से होते हुए विश्वविजय और सीमा कर रहे हैं. इसलिए इनके खिलाफ़ हमें भी युद्ध छेड़ना अत्यावश्यक हो गया है.

विश्वविजय और सीमा का नाम उन्हीं लोगों में शामिल हैं जिन्होंने मार्क्स और एंगेल्स के सर्वहारा की तानाशाही और समाजवादी क्रांति के सिद्धांत में ‘संशोधन’ कर बुर्जुआ वर्ग के हित में काम किया, वहीं लोग जिन्होंने दुनिया भर के सर्वहारा वर्ग को मुक्ति की राह दिखाने वाले समाजवादी सोवियत रूस और समाजवादी चीन में सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के खिलाफ़ षड़यंत्र रचा और उसे पलटकर दुनिया भर के सर्वहारा वर्ग के साथ गद्दारी की. ये लोग गद्दारी के उसी पुराने विचार को नए भेष में जारी रखे हुए हैं. यहां पर यह भी समझना ज़रूरी है कि आखिर गद्दार किसे कहा जाता है ?

गद्दार वह है जो सर्वहारा वर्ग के वस्तुगत हित के खिलाफ़ काम करे. भारत की क्रन्तिकारी पार्टी (माओवादी पार्टी) के भीतर देखें तो जो कोई भी पार्टी की नौवीं कांग्रेस में निर्धारित लाईन के खिलाफ़ काम करें और पार्टी के खिलाफ जाकर अपनी अलग राजनैतिक लाइन का प्रचार करे व पार्टी अनुशासन को न माने और पार्टी संगठन का नुकसान करें, वह निश्चय ही पार्टी, क्रांति व जनता का गद्दार है. लेनिन की किताब – ‘सर्वहारा क्रांति और गद्दार काउत्स्की’ में बताया है कि काउत्स्की गद्दार है क्यूंकि उसने मार्क्सवाद का उदारवादी विकृतिकरण (liberal distortion) किया है, वो सर्वहारा द्वारा हथियारबद्ध संघर्ष के इस्तेमाल के खिलाफ़ है और सर्वहारा की तानाशाही स्थापित करने के खिलाफ़ है. यह पूरी तरह विश्वविजय-सीमा से मेल खा रहा है. उन्होंने सर्वहारा की तानाशाही को सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों तरीके से नकारा है. वे सर्वहारा की तानाशाही से खौफ खाते हैं इसलिए उन्होंने सर्वहारा की तानाशाही को बदल कर उसको गलत ठहराया. व्यवहारिक तौर पर भी खुली कानूनी पार्टी बनाने की कोशिश करना, भूमिगत (UG) पार्टी निर्माण के खिलाफ़ काम करना सर्वहारा की तानाशाही को रोकना ही है. वे हथियारबद्ध संघर्ष के भी खिलाफ़ है, तभी उन्होंने पार्टी में मिलिट्री लाईन हावी होने का बेबुनियाद आरोप लगाया, तभी उन्होंने कभी सैनिक कामों पर ध्यान नहीं दिया और जनसंगठन में भी लड़ाकूपन (militancy) को बढाने के बजाय उसे हतोत्साहित ही किया.

I. दुनिया और देश में गद्दारी का इतिहास

आइये देखते हैं कि कैसे 200 सालों के मार्क्सवाद विरोधियों के इतिहास की विरासत को विश्वविजय और सीमा आगे बढ़ा रहे हैं, जिसके खिलाफ़ हमारे महान शिक्षक (मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, स्टालिन, माओ) और सर्वहारा वर्ग की पार्टी लड़ती आई है.

कॉ. मार्क्स और एंगेल्स ने जब पहली बार सर्वहारा क्रांति का सिद्धांत दिया तो वे अपने समय के सुधारवादी और अराजकतावादियों से डटकर लड़े. पहले इंटरनेशनल में उन्होंने इन सभी धाराओं से लड़ते हुए समाजवादी क्रांति की धारा को स्थापित किया. इसके बाद पूरे यूरोप और पूरी दुनिया में मार्क्सवाद सर्वहारा की मुक्ति का सिद्धांत बन गया. इसीलिए शासक वर्गीय विचारधारा ने अपने आप को मार्क्सवाद के ही चोले में ओढ़कर सर्वहारा की तानाशाही और समाजवादी क्रांति के खिलाफ़ काम करना शुरू कर दिया. इसमें सबसे पहला और एक बड़ा उदाहरण है बर्नस्टीन. बर्नस्टीन ने मार्क्स और एंगेल्स के लेखों का उद्धरण देते हुए कहा कि समाजवाद मौजूदा व्यवस्था में शांतिपूर्ण विकास से आ सकता है, इसके लिए क्रांति की आवश्यकता नहीं है. रूसी क्रांति के समय में कार्ल काउत्स्की ने खुद को बर्नस्टीन का सच्चा वारिस साबित करते हुए कहा कि राज्य को हिंसात्मक तरीके से पलटने की ज़रूरत नहीं है यानि बिना हथियारबद्ध संघर्ष के सर्वहारा क्रांति संभव है. इसके बाद ख्रुश्चेव ने समाजवादी रूस में संशोधनवादी लाईन को लागू करके आधुनिक संशोधनवाद की नींव रखी, जिसे चीन में डेंग ने आगे बढाया.

बाद में नेपाल में जब क्रांतिकारी आन्दोलन अपने उफान पर था, तब पार्टी के महासचिव प्रचंड ने गद्दारी की. प्रचंड ने कहा कि नेपाल में आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक बदलाव आये हैं इसलिए नेपाल में न तो रूस का रास्ता अपनाया जाएगा और न ही चीन का बल्कि दोनों को मिला कर एक नया रास्ता – नेपाल का रास्ता बनाया जाएगा. इस सिद्धांत के अनुसार तख्तापलट (insurrection) और दीर्घकालीन लोकयुद्ध की लाईन को एक साथ मिला देने की आवश्यकता है. यह सिद्धांत इसलिए गढ़ा गया ताकि दीर्घकालीन लोकयुद्ध और हथियारबद्ध संघर्ष की लाईन पर हमला किया जा सके और पार्टी को संसदीय राजनीति के कीचड में धकेल दिया जायें. यह नए रूप में बर्नस्टीन ही था जिसने हथियारबद्ध संघर्ष को छोड़ कर शांतिपूर्ण बदलाव की वकालत की थी.

भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन में भी ख्रुश्चेव के अनुयायी सीपीआई (एम) की आधुनिक संशोधनवादी लाईन को चारू मजुमदार और कन्हाई चटर्जी ने ध्वस्त किया. उन्होंने सीपीआई व सीपीएम के संशोधनवाद के खिलाफ़ संघर्ष करते हुए महान नक्सलबाड़ी आन्दोलन के साथ ही भारत में दीर्घकालीन लोकयुद्ध और नवजनवादी क्रांति की लाईन को स्थापित किया. इसी लाईन को सीपीआई (एमएल) पीडब्लू और एमसीसीआई ने आगे बढाया, जिसमें पीडब्लू ने एसएनएस, सीपी रेड्डी, नागिरेड्डी, डीवी राव की संशोधनवादी लाईन के खिलाफ़ लड़ा, एमसीसी ने भरत-बादल गुट और 2nd सीसी के आधुनिक संशोधनवाद से लड़ते हुए क्रांतिकारी खेमे के साथ एकता बनायी और 2004 में सभी क्रांतिकारी गुटों का विलय होकर भाकपा (माओवादी) की स्थापना हुई.

माओवादी पार्टी की स्थापना के बाद से लेकर आज तक उसमें अवसरवाद-विघटनवाद-संशोधनवाद की विभिन्न अभिव्यक्तियों और इन पर पार्टी के सही दृष्टिकोण के बारे में हम विस्तार से चर्चा करेंगे. चूंकि विश्वविजय–सीमा द्वारा ली जा रही राजनीतिक लाईन की ऐतिहासिक जड़ें इन लोगों द्वारा दी गयी राजनैतिक लाईन से आई है इसलिए इसपर चर्चा करने और इसका खंडन करना ज़रूरी हो जाता है.

माओवादी पार्टी बनने के बाद 2012 में सब्यसाची पंडा पहली बार संशोधनवादी लाईन को लेकर आया. उसके द्वारा उठाये गये कुछ बिंदु इस प्रकार हैं (ध्यान दें क्यूंकि ये बिंदु आगे के संशोधनवादियों से भी मेल खाएंगे) –

  1. भारत में चीन का रास्ता यानि दीर्घकालीन लोकयुद्ध का रास्ता लागू नहीं हो सकता. भारत का अपना रास्ता बनाने की ज़रूरत है. यह प्रचंड की लाईन है जिसके बारे में हमने पहले बात की है.
  2. जनता दीर्घकालीन लोकयुद्ध और हथियारबद्ध संघर्ष के लिए तैयार नहीं है इसलिए अभी उसकी तैयारी करनी चाहिए. यह सीपीआई (एमएल) जनशक्ति द्वारा दिए स्टेज सिद्धांत की तरह है जिसमें हथियारबद्ध संघर्ष को तब शुरू किया जाएगा जब जनता उसके लिए तैयार हो जायें – यह दरअसल हथियारबद्ध संघर्ष को अनंत काल के लिए टालने का सिद्धांत है.
  3. पार्टी में नेतृत्व की तानाशाही है, जनवादी केन्द्रीयता के नाम पर जनवाद को ख़त्म किया जा रहा है. (यह गद्दार मार्क्सवाद की खाल ओड़कर जनवादी केन्द्रीयता की जगह अतिजनवाद और अराजकता को लागू करना चाहता है. तभी इसने सर्वहारा की तानाशाही के विरुद्ध मल्टी-पार्टी सिस्टम लागू करने को कहा. इसने ख्रुश्चेव और डेंग के रस्ते पर चलते हुए कहा कि इसी ‘तानाशाही’ के कारण रूस और चीन में समाजवाद टिक नहीं सका. दरअसल जो लोग सर्वहारा वर्ग की तानाशाही से डरते हैं, वहीं लोग क्रांतिकारी पार्टी के भीतर सर्वहारा वर्ग की विचारधारा और उसकी राजनीती की तानाशाही से डरते हैं.) हर सच्चे कम्युनिस्ट पार्टी की तरह भारत की माओवादी पार्टी में बहस करने और मतभेदों को रखने का पूरा अवसर है. और इसी से पार्टी समृद्ध भी होती आई है. परन्तु जैसा कि कॉ. चारू मजुमदार ने कहा था कि पार्टी कोई वाद-विवाद संस्था नहीं है. बहस की आज़ादी के नाम पर अवसरवादियों को पार्टी में तोड़ फोड़ करने और सही पार्टी ढांचों में व उपरी कमिटी में उन बहसों को रखने के बजाय घूम घूम कर अपनी संशोधनवादी लाईन का प्रचार करना पार्टी और क्रांति विरोधी है. ऐसे अवसरवादियों को जब पार्टी रोकती है तो उन्हें यह ‘तानाशाही’ लगती है. दरअसल यह उनके शासक वर्गीय विचारों पर पार्टी के मालेमा (मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद) विचारधारा की तानाशाही ही है और ऐसी ‘तानाशाही’ को हम सही मानते हैं.
  4. पार्टी में बन्दूक राजनीति पर हावी है – जिसका तात्पर्य है कि पार्टी में मिलिट्री लाईन हावी है. (इस पर आगे बलराज के सेक्शन में चर्चा की गयी है)
  5. राज्य बहुत मज़बूत है इसलिए हथियारबद्ध संघर्ष करना और गुरिल्ला ज़ोन व आधार क्षेत्र बनाना संकीर्णतावाद और मनोगतवाद है. (पार्टी ने अपने ‘रणनीति और कार्यनीति’ के दस्तावेज में कहा है राज्य बहुत मज़बूत है, यह पहलु दुश्मन के शासन की सबसे कमज़ोर कड़ी भारतवर्ष के पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र के विशाल भू-भागों में हमारी क्रांतिकारी युद्ध की शुरुआत करने की ज़रूरत को रेखांकित करता है. साथ ही यह हमें गुरिल्ला युद्ध की कार्यनीति व भूमिगत तौर-तरीकों को इस्तेमाल करने और ग्रामीण इलाकों के रणनीतिक क्षेत्रों के अनुकूल धरातल का सबसे बेहतर इस्तेमाल कर वहां गुरिल्ला ज़ोन बनाने की ज़रूरत को बताता है. साथ ही इसमें लिखा है ‘दुश्मन सिर्फ़ कार्यनीतिक दृष्टिकोण से ही श्रेष्ठ है. रणनीतिक अर्थों में दुश्मन के सशस्त्र बल महज़ कागज़ी बाघ हैं. उनके हित व्यापक जनता के हितों के बिलकुल विपरीत हैं, अतः उन्हें जनता का कोई भी सहयोग नहीं मिल सकता.’ इसका तात्पर्य है कि चूंकि व्यापक जनता के वस्तुगत हित के खिलाफ़ राज्य है और उसके पक्ष में पार्टी है इसलिए अंततः जीत पार्टी की ही होगी. भारत में असमान आर्थिक-सामाजिक विकास के कारण और राज्य की मज़बूत, केंद्रीकृत मशीनरी के कारण ही इलाकावार सत्ता दखल के रस्ते पर चल कर गुरिल्ला ज़ोन और आधार इलाके पर काम करने की ज़रूरत है.
  6. दुश्मन के सामने हमें खुद को एक्स्पोस नही करना चाहिए इसलिए जनसंगठन का मालेमा और चुनाव बहिष्कार पर बोलना गलत है. (पंडा ने अपनी विघटनवादी कार्यवाहियों को अंजाम देना तब शुरू किया जब 2012 के प्लेनम में उसकी तीखी आलोचनाएं हुई और राज्य द्वारा ऑपरेशन ग्रीन हंट का दमन बढ़ने लगा. सभी अवसरवादियों की ही भांति इसने भी राजकीय दमन के समय अपने मुखौटे को हटा कर अपनी राजनीति को सबके सामने उजागर किया. जब जब सर्वहारा वर्ग और उसकी पार्टी निम्न पूंजीपति से ज़्यादा कुर्बानी की मांग करता है, तब तब वह घबरा जाता है और अपनी प्रतिबद्धता की कमी के चलते और इसे स्वीकार न कर पाने की स्थिति में वह नए राजनैतिक सिद्धांतों को गढ़ता है. यहीं आगे बलराज, वेणुगोपाल, विश्वविजय-सीमा के साथ हुआ.

आगे हम अगले बड़े संशोधनवादी, और विश्वविजय–सीमा के गुरु बलराज की बात करते हैं.

1. खुले कामकाज को देखने के लिए पार्टी की एक अलग खुली केन्द्रीय कमिटी होनी चाहिए

यह तर्क माओवादी सिद्धांत में निर्धारित पार्टी की गुप्त कार्यप्रणाली के खिलाफ़ है, दीर्घकालीन लोकयुद्ध के खिलाफ़ है. यदि पार्टी नेतृत्व खुला रहेगा तो वह दुश्मन से अपने आत्मगत ताकतों को बचाते हुए उसके खिलाफ युद्ध नहीं छेड़ पायेगा और अंततः सुधारवाद में फंस जायेगा. बलराज असल में अपने निम्न पूंजीपति सुख सुविधा वाले जीवन को भी छोड़ना नहीं चाहते थे और केन्द्रीय कमिटी के अपने पद को भी नहीं. अपनी इसी निम्न पूंजीपति कमरी और सामंती अधिपत्य बनाने की भावना से उसने एक अलग राजनैतिक लाईन दी और इसके पक्ष में पार्टी नेतृत्व के खिलाफ़ गुटबाजी की.

2. पार्टी में सैन्य पद्धति हावी है और पार्टी में जनांदोलन को ज़्यादा महत्त्व नही दिया जाता है.

इसका जवाब पार्टी के रणनीति और कार्यनीति दस्तावेज में बताया गया है :

‘जैसा कि कॉ. माओ ने ठोस रूप से बताया था ‘… संघर्ष का मुख्य रूप युद्ध है और संगठन का मुख्य रूप फ़ौज है’ जनसंगठन और जनसंघर्ष जैसे दूसरे रूप भी बहुत महत्त्व के हैं और निश्चय ही अनिवार्य है तथा इन्हें किसी भी हालत में नज़रंदाज़ नहीं करना चाहिए, लेकिन ये सब युद्ध की सेवा के लिए ही है. युद्ध शुरू होने से पहले सभी तरह के संगठन और संघर्ष युद्ध की तैयारी के लिए किये जाते हैं … युद्ध शुरू होते ही सभी तरह के संगठनों और संघर्षों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध के साथ तालमेल कायम हो जाता है ;…

‘भारत और क्रांति के पूर्व चीन की वस्तुगत परिस्थितियों में चाहे जो भी फ़र्क हों, जनसंघर्ष और सशस्त्र संघर्ष के बीच के सम्बन्ध से सम्बंधित उपरोक्त आधारभूत उसूल एक ही रहता है.

‘इसका मतलब यह हुआ कि बिलकुल शुरू से ही जनसंगठनों और जनसंघर्षों का निर्माण करने का हमारा लक्ष्य व दिशा, परिप्रेक्ष्य और तरीका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध की सेवा करना होना चाहिए… यदि यह दिशा नहीं रही तो हमारे जनसंगठन और जनसंघर्ष कानूनवाद व अर्थवाद की दलदल में फंस जाएंगे और हम राजनैतिक सत्ता पर कब्ज़ा करने के लिए जनता को तैयार करने में असक्षम हो जाएंगे. दक्षिणपंथी अवसरवाद और संशोधनवाद का स्रोत यहीं है.’

कॉ. चारू मजुमदार ने भी अपने आठ दस्तावेजों में यह कहा था कि बिना गुप्त पार्टी निर्माण और सशस्त्र संघर्ष बनाये जनसंगठन पर ज़ोर देना धनी किसानों की विचारधारा है और यह आधुनिक संशोधनवाद है.

दरअसल बलराज पार्टी में सशस्त्र संघर्ष और गुप्त पार्टी निर्माण को ख़तम करना चाहता था इसलिए यह तर्क गढ़ रहा था.

3. पार्टी के अन्दर जनवादी केन्द्रीयता के नाम पर तानाशाही चल रही है

यह सब्यसाची पांडा की भी लाईन है जिसके बारे में हमने पहले बात की है.

हाल ही में भारतीय क्रांति पर शासक वर्ग के सबसे बड़े हमले के रूप में वेणुगोपाल – रुपेश का गद्दार गुट सामने आया, जिनकी राजनैतिक लाईन इस प्रकार है –

  1. देश की आर्थिक – राजनैतिक हालात बदल चुके हैं.
  2. भारत में चीन या रुसी लाईन को लागू करना कठमुल्लावाद है. भारतीय रास्ता बनाना चाहिए.
  3. हथियारबद्ध संघर्ष ही संघर्ष का एकमात्र तरीका अपनाने के कारण पार्टी वामपंथी भटकाव का शिकार हो गयी है.
  4. संसदीय भागीदारी क्रांतिकारी संघर्ष का हिस्सा होनी चाहिए.

यह प्रचंड की लाईन ही है जो बदली हुई परिस्थिति और अपना नेपाली या भारतीय रास्ता बनाने की बात कहते हैं ताकि दीर्घकालीन लोकयुद्ध और हथियारबद्ध संघर्ष की लाईन पर हमला किया जा सके. ये सभी तर्क वहीं पुराने हैं जो बर्नस्टीन से लेकर बलराज देते आये हैं. हम देख सकते हैं कि ऐतिहासिक रूप से सभी गद्दारों ने अपनी लाईन रखी है – कि पार्टी को हथियारबद्ध संघर्ष छोड़ देना चाहिये, कभी यह बोल कर कि शांतिपूर्ण तरीके से या संसदीय तरीके से समाजवाद लाया जा सकता है, या यह बोल कर कि पार्टी में मिलिट्री लाईन हावी है, ये लोग सर्वहारा वर्ग द्वारा हथियारबद्ध संघर्ष से खौफ़ खाते हैं.

ये लोग सर्वहारा की तानाशाही के सिद्धांत को नकारते हैं. सर्वहारा की तानाशाही पर कॉ. लेनिन ने कहा है कि ‘सर्वहारा की तानाशाही सबसे दृढ़ और सबसे क्रूर युद्ध है जो नए वर्ग द्वारा उसके सबसे ताकतवर दुश्मन – बुर्जुआ वर्ग के खिलाफ़ छेड़ा गया है जिसको उखाड़े जाने के बाद उसका प्रतिरोध दस गुना बढ़ जाता है.’

ये लोग जनवादी केन्द्रीयता के उसूल को नहीं मानते क्यूंकि ये मालेमा की रौशनी में सर्वहारा वर्ग की विचारधारा की केन्द्रीयता को नहीं मानना चाहते व अपने निम्न पूंजीपति वर्ग हित अनुसार पार्टी को चलाना चाहते हैं.

अवसरवादी-विघटनवादी–संशोधनवादी लाईन को अपनाने वाले गद्दारों की विशेषताओं को समझने के बाद अब हम इनके नये वारिसों को समझते हैं.

II. विश्वविजय और सीमा के विघटनकारी बनने का सफ़र
रुसी सामाजिक जनवादी मजदूर पार्टी (RSDLP) के 1908 के सम्मलेन में पारित विघटनवाद की परिभाषा है

विघटनवाद है – ‘पार्टी बुद्धिजीवियों के एक समूह द्वारा पार्टी के मौजूदा संगठन को विघटित करना (यानि, विघटन , विनाश, उन्मूलन, बंद करना) और उसे हर कीमत पर, यहां तक कि पार्टी के कार्यक्रम, रणनीति और परम्पराओं (यानि, पिछले अनुभव) के साफ़ साफ़ त्याग तक कि कीमत चुकाकर भी, कानूनी रूप से काम करने वाले (यानि, कानून के अनुरूप, ‘खुलेआम’ मौजूद) एक ढीले ढाले संगठन द्वारा बदलने का प्रयास.’

कॉ. लेनिन ने इस निर्णय के बारे में अपने लेख में कहा है कि ‘इसका सार है – भूमिगत (UG) संगठन का त्याग, उसका विघटन और हर कीमत पर उसे कानूनी रूप से काम करने वाले एक अव्यवस्थित संगठन में बदल देना…. बेशक, विघटनवाद का वैचारिक सम्बन्ध भगौड़ावाद (रेनेगेसी) से है, कार्यक्रम और रणनीति के त्याग से है, अवसरवाद से है…. विघटनवाद अवसरवाद का वह प्रकार है जो पार्टी के त्याग तक जाता है.’

सभी अवसरवादियों की ही भांति विश्वविजय-सीमा का मुखौटा भी तभी खुल कर उनका चेहरा साफ़ नज़र आता है जब उनके ऊपर राजकीय दमन यानि कि NIA रेड होता है. जब देश भर में क्रन्तिकारी आंदोलन खासकर उसके हिरावल माओवादी पार्टी में संकट की स्थिति गहरा रही थी, तमाम क्रांतिकारी नेताओं की शहादतें हो रही थी, उन्हें जेलों में ठूंस कर क्रूर यातनाएं दी जा रही थी, तमाम खुले क्रांतिकारियों, बुद्धिजीवियों पर NIA द्वारा रेड हो रहे थे, तब इस सब के प्रति इन गद्दारों की चिंताएं नहीं जागी, न ही यह सब को देख कर उनकी प्रतिबद्धता और बढ़ी. परन्तु जब 2023 में खुद इनके ऊपर रेड हुआ तब दुनिया जहां की चिंताएं इन्हें सताने लगी. इन्हें NIA का, जेल जाने का भूत सताने लगा – इतना कि इन्होंने पार्टी ढांचों को संचालित करने का काम ही छोड़ दिया, साथियों से मिलना तक छोड़ दिया. ऐसा क्यों हुआ ? यह इनके घोर व्यक्तिवाद से उपजा अवसरवाद है. क्रांति में निम्न पूंजीपति वर्ग के बारे में कॉ. लेनिन का यह वाक्य इन पर एकदम सटीक बैठता है- ‘बुर्जुआ जनवादी क्रांति में जल्दी जीत मिलने की आशा के साथ मजदूर आन्दोलन में शामिल हुए और प्रतिक्रिया के दौर में टिक पाने में असक्षम थे. उसमें पार्टी के सिद्धांत (‘क्रांतिकारी मार्क्सवाद से पीछे हट जाना’) और कार्यनीति (‘नारों को कम कर देना’) तथा पार्टी की सांगठनिक नीति में भी ढुलमुलपन प्रकट हुआ.’

NIA रेड के बाद विश्वविजय द्वारा सभी पार्टी ढांचों की मीटिंगों को रोकने के लिए कहा गया व उनकी सभी गतिविधियों को भी बंद करने को कहा गया. कब तक के लिए ? पता नहीं. क्यों ? क्यूंकि शासकवर्गीय विचारधारा इनपर हावी होने के कारण ये लोग जेल जाने से डरते थे. इन्हें NIA रेड के सपनें आने लगे और इसी खौफ़ में ये जीवन व्यतीत करने लगे कि कहीं किसी दिन NIA दोबारा दस्तक न दे दे. ऐसा करना गुप्त पार्टी ढांचे को ख़त्म कर के पार्टी को खुला एवं कानूनी बनाना है. यहां तक कि इन्होने अपनी निचली कमिटी में कार्यरत सभी पेशेवर क्रांतिकारियों (Professional Revolutionaries, PR) को अपने अपने करियर की ओर जाने को कहा. एक PR साथी जिन्होंने Ph.D. करने के लिए मना किया हुआ था, उनके लिए आदेश भेजवाया कि उन्हें तैयारी कर के Ph.D. में दाखिला लेना होगा. कॉ. लेनिन ने PR को पार्टी की रीढ़ की हड्डी बोला था. साथियों को करियर बनाने का आदेश देना PR को ख़त्म कर के पार्टी व क्रांति का नुक्सान करना है.

NIA रेड के कुछ समय पहले ही जनसंगठन में काम कर चुके एक साथी व पार्टी और क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़े कई साथियों की गिरफ़्तारी हुई थी. जब निचली कमिटी के कुछ साथी इस गिरफ़्तारी के खिलाफ़ आन्दोलन करने का प्रस्ताव रख रहे थे, तब विश्वविजय सीमा ने दूसरी जगहों पर आंदोलन शुरू होने का इंतज़ार करने को कहा. यह भी इनकी वैचारिक दरिद्रता और उससे उपजा इनका डर से उपजा स्टैंड है. इस डर के पीछे की राजनीति शासक वर्ग की है यानि NIA रेड कर के शासक वर्ग पार्टी को कमज़ोर करना चाहता था. इस दमन का डट कर सामना करने के बजाय, यह साबित करने के बजाय की MLM की विचारधारा अमर है और सर्वहारा वर्ग की राजनीति अमर है, इन गद्दारों ने शासक वर्ग के मंसूबों को और भी मज़बूत किया. हालांकि बाकि साथियों के दबाव के कारण उस साथी की रिहाई के लिए आन्दोलन किया गया परन्तु वह केवल सांकेतिक आन्दोलन था.

इसके बाद 9-10 महीनों तक इन्होंने (ख़ासकर विश्वविजय ने, जिनकी पार्टी ढांचे को चलाने की ज़िम्मेदारी थी) पार्टी ढांचे की बैठक नहीं की. साथियों द्वारा अपने स्तर पर बैठक कर के जनसंगठन को चलाने और काम को विस्तार करने के निर्णय लिए गये. इस अवधि में कमिटी के एक या दो साथी विश्वविजय-सीमा के घर इन्हें निर्णयों के बारे में बताने जाते थे. इस अवधि में विश्वविजय की भूमिका ढांचे के इंचार्ज के बजाय एक बुर्जुआ नौकरशाह की रह गयी थी, जिससे मात्र निर्णयों पर मुहर लगवाई जाती थी ताकि कामों को लागू किया जा सकें. इनके राजनैतिक अवसरवाद का यह आलम था कि निचली कमिटी के साथी इनको खींच कर आगे ला रहे थे कि यह कुछ सक्रिय हो, ज़िम्मेदारी लें, पार्टी के लिए कुछ काम करें. 10 महीने बीत जाने के बाद साथियों के कहने पर विश्वविजय-सीमा को मीटिंग में बैठना पड़ा, जिसके बाद यह तय हुआ कि अब से वे नियमित रूप से मीटिंगों में बैठेंगे. यह घटना भी हास्यास्पद है. दरअसल विश्वविजय-सीमा ने कमेटी के साथियों को अपने घर पर आम खाने के लिए बुलाया था, जिस ‘ट्रिप’ को साथियों ने मीटिंग में बदल दिया. यहां तक कि एक साथी द्वारा यह राय देने पर कि ज़्यादा समय लगा कर स्वादिष्ट भोजन बनाने के बजाय कम समय में बनने वाला कुछ भोजन बना लेना चाहिए ताकि मीटिंग के लिए पर्याप्त समय बचा रहे, यह बात तो नहीं ही माने जाने वाली थी बल्कि उस साथी को विश्वविजय – सीमा द्वारा इस बात के लिए ‘मैकेनिकल’ करार कर दिया गया. और अंततः वही हुआ कि मीटिंग पूरी नहीं हुई.

यह दिखाता है इनकी गंभीरता पार्टी के कामों के प्रति और उनकी उदासीनता पार्टी ढांचों के मीटिंग के प्रति नहीं है. इन लोगों के लिए पार्टी कामों से ज़्यादा महत्वपूर्ण व्यक्तिगत रिश्ते बनाना, घूमना-फिरना, खाना-पीना रहा है. यह इनकी निम्न पूंजीवादी, नव–उदारवादी, बाज़ार संस्कृति में सर से पांव तक डूबे हुए राजनैतिक व्यक्तित्व को उजागर करता है जिसका पार्टी लाईन व पार्टी अनुशासन से दूर दूर तक नाता नहीं है.

जहां विश्वविजय ने सभी पार्टी संगठनों को भंग करने का प्रयास किया, सीमा भी बच बच कर काम करने लगी और अपनी राजनितिक लाईन को बदलने लगी. जैसे एक क्रांतिकारी संगठन के प्रोग्राम में बुलाने पर मना कर देना कि कहीं उनका नाम उससे जुड़ जाये और NIA द्वारा दमन का मौका बढ़ जाये. यहां तक कि NIA के खिलाफ़ एक प्रोग्राम करने में खुद की मुख्य ज़िम्मेदारी न लेना जिसके कारण अंततः प्रोग्राम नहीं हो पाया.

इनके विघटनवादी बनने की इस पृष्ठभूमि से हम समझ सकते हैं कि कैसे ये लोग आज गद्दारों की कतार में शामिल हो गये हैं.

साथियों द्वारा जनवरी 2024 से ही विश्वविजय से संपर्क करने की कोशिश की जा रही थी. परन्तु डेढ़ साल तक अनेकों बार मिलने के लिए बुलाये जाने के बावजूद भी विश्वविजय पार्टी से तालमेल को टालते रहे. इसके लिए वे तमाम मूर्खतापूर्ण व बचकाने बहाने खोजते जैसे कि सन्देश उन तक आने का तरीका उन्हें ‘सुरक्षित’ नहीं लगा, सन्देश उन्हें समझ नहीं आ रहा है. जैसे बनारस में केरला कैफ़े पर आने पर लिखा हो तो कोई केवल केरला शब्द पढ़ कर आगे का न पढ़ें और बोले कि इतनी दूर मैं नहीं जा सकता. इसी तरह एक जगह के बारे में उनकी यह मूर्खतापूर्ण टिप्पणी थी. साथियों के बार बार प्रोत्साहित करने पर आखिरकार वो एक बार पार्टी के बुलावे पर मिलने गये. मिलने पर उन्होंने कहा कि ‘अपने इलाके’ को वे खुद ही देखना चाहते हैं और यह नहीं चाहते कि UG साथी वहां पर आ कर काम करें. इसके लिए भी इन्होंने ‘सुरक्षा’ का हवाला दिया. दरअसल यह पार्टी की सुरक्षा नहीं बल्कि अपने आप की ‘सुरक्षा’ के बारे में ही सोचते थे. वे किसी UG साथी को वहां काम करने देना नहीं चाहते थे ताकि उनकी मठाधीशी बनी रहे और इसलिए भी क्यूंकि वे सोचते थे कि ऐसा करने से उनपर राजकीय दमन हो सकता है और उनकी सुरक्षा को खतरा हो सकता है. इनकी सुरक्षा का मतलब व्यक्तिगत है चाहे उसके लिए पार्टी के सिद्धांतों का विघटन ही क्यों न करना पड़े. जैसा कि लेनिन ने विघटनकारियों के लिए कहा है कि पार्टी को बचाने के नाम पर पार्टी को ख़त्म करना उनका मकसद है.

विश्वविजय ने एक साथी के UG जाने पर कहा कि वे तभी UG जाएंगी जब पार्टी उनके लिए कोई UG पार्टनर (शादी के लिए रिश्ता) खोजेगी. यह बात उन्होंने बिना उस साथी से बात किये कही, और बाद में भी उन्हें रिपोर्ट नहीं किया. यह उनकी सामंती ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक सोच को दर्शाता है, जो पार्टी में किसी महिला के राजनैतिक जीवन के सवाल को उनकी शादी से जोड़ कर ही देखता है. साथ ही विश्वविजय द्वारा यह चाल उस साथी को UG जाने से रोकने के लिए भी चलाई गयी थी.

III. UG सवाल पर विश्वविजय का दृष्टिकोण

UG जाने के सवाल पर विश्वविजय ने अपने आपको एक बढ़िया अवसरवादी साबित किया. जैसा लेनिन ने कहा है – अवसरवादी दो मेज़ पर बैठते हैं. वैसे ही विश्वविजय बोलते थे कि वे पार्टी की UG लाईन को मानते हैं और जबकि दूसरी बातों की आड़ लेकर उन्होंने बाकि साथियों में UG पार्टी निर्माण के प्रति गलत अवधारणायें डाली. लेनिन ने ऐसे अवसरवादियों के बारे में कहा है – ‘हमें आजकल के अवसरवाद की एक विशेषता कभी नही भूलनी चाहिए, जो प्रत्येक क्षेत्र में पाई जाती है, अर्थात उसकी अस्पष्टता, बिखराव, और कभी पकड़ में न आने वाला गुण, अवसरवाद का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वह हमेशा किसी भी सवाल को स्पष्ट और निर्णायक रूप से पेश करने से कतराता है, वह हमेशा कोई बीच का रास्ता निकालने की फिराक में रहता है; दो एकदम विरोधी दृष्टिकोणों के बीच सदा सांप की तरह बलखाता रहता है और दोनों के साथ सहमत होने की कोशिश करता है; और अपने मतभेदों को छोटे छोटे संशोधनों, संदेहों और निर्दोष सुझावों का रूप देने की कोशिश करता रहता है.’

UG सवाल पर इनके कुछ तर्क इस प्रकार हैं –

इनमें गौर करियेगा कि ‘लेकिन’ से पहले ये पहले मेज़ पर है और ‘लेकिन’ के बाद ये दूसरे मेज़ पर बैठे मिलते हैं.

  1. UG जाना सही है लेकिन जब तक जनसंगठन की एक नेतृत्वकारी टीम तैयार नहीं हो जाती, तब तक किसी साथी को UG नहीं जाना चाहिए.
  2. UG जाना चाहिए लेकिन UG जाने का एक प्रोसेस होता है जिसको पूरा किये बिना UG जाने से जनसंगठन के साथियों पर दमन बढ़ जाएगा.

यह आपकी मर्ज़ी है कि आप UG काम करें या ओपन लेकिन वे साथ में कहते थे कि दोनों कामों का महत्त्व बराबर है. जैसे जैसे पार्टी ने इनके खिलाफ़ स्टैंड लेना शुरू कर दिया, वैसे वैसे ये UG पार्टी निर्माण के खिलाफ़ खुल कर बोलने लगे और विघटनकारी के तौर पर एक्स्पोस हो गये.

आइये UG सवाल पर इनकी पोजीशन के बिन्दुओं पर एक एक कर कर बात करते हैं –

कॉ. माओ ने कहा था कि क्रांति के लिए तीन जादुई हथियार हैं – पार्टी, जनसेना और संयुक्त मोर्चा. इसमें प्रधान पार्टी है और वही बाकि दोनों जादुई हथियारों को संचालित करती है.

पार्टी के ‘रणनीति और कार्यनीति’ दस्तावेज में बताया गया है कि शुरू दिनों से ही एक अभेद्य और मज़बूत भूमिगत पार्टी बनानी होगी. उस दस्तावेज में भूमिगत पार्टी के बारे में लिखा है, ‘कॉ. लेनिन और माओ द्वारा प्रतिपादित पार्टी निर्माण का दूसरा बुनियादी उसूल है पार्टी का भूमिगत ढांचा और उसका गुप्त चरित्र. माओ ने प्रतिक्रियावादियों के प्रभुत्व वाले इलाके में पार्टी को कठोरतापूर्वक भूमिगत बनाये रखने की अनिवार्य आवश्यकता को इस प्रकार बताया है –

‘शुरू शुरू में हमारी नीति पार्टी संगठनों की गोपनीयता को बनाये रखना और उन्हें चुस्त, चुनिन्दा और कार्यशील बनाना है ताकि वे लम्बी अवधि तक भूमिगत रहे, शक्तियों का संचय करें, सही मौके का इंतज़ार करे और उतावलेपन का शिकार न हो या खुद को उघाड़ न दे.’

यदि पार्टी खुली रहेगी तो दुश्मन के सामने उसके सभी सदस्य, सभी ढांचें, सभी निर्णय खुले होंगे और दुश्मन उसे एक कदम भी आगे न बढ़ने देगा.

किसी भी पार्टी कमिटी में ऐसे साथी नहीं होने चाहिए जो पेशेवर क्रांतिकारी और भूमिगत नहीं हैं. यदि ऐसे साथी हैं तो उन्हें कुछ महीने का समय देना है ताकि वे भूमिगत हो जायें नहीं तो वे कमिटी में नहीं रह सकते.

  1. पार्टी और जनसंगठन में से क्या प्रधान है, इसका जवाब ऊपर माओ और पार्टी के दस्तावेज़ से मिल गया है. परन्तु यह विश्वविजय सीमा का अर्थवाद और कानूनवाद ही है इसलिए वे केवल और केवल जनसंगठन के काम पर ज़ोर देते रहे और पार्टी निर्माण के पार्टी के केन्द्रीय कार्यभार को हमेशा जनसंगठन निर्माण के मातहत रखा. ये लोग हमेशा जनसंगठन को बचाने की रट लगाते रहे और नतीजा यह निकला कि भूमिगत पार्टी के मार्गदर्शन के अभाव में जनसंगठन भी सुधारवादी और अर्थवादी भटकाव का शिकार हो गया था. ये लोग जनसंगठन की सुरक्षा की आड़ में भूमिगत पार्टी निर्माण रोकने की अपनी विघटनवादी लाईन को अंजाम देते रहे. इसलिए भूमिगत जाने के ‘प्रोसेस’ के नाम पर वे इसको अनंतकाल तक टालते रहते थे.
  2. भूमिगत और ओपन काम करने के सवाल को बराबर महत्त्व का बताना ट्रोट्स्की का सिद्धांत है. त्रोत्स्की बोल्शेविको और विघटनवादियों के बीच एकता बनाने की बात करता था, जो परिणामतः पार्टी को विघटन करने की तरफ जाएगा. उसी तरह ओपन और UG को बराबर महत्त्व का बताना अंततः UG पार्टी निर्माण के खिलाफ़ खुली कानूनी पार्टी की तरफ़ जाएगा.

आज जब पार्टी में आत्मगत शक्तियों की अत्यंत कमी है, तब पार्टी को बचाने का सवाल यानि भूमिगत पार्टी निर्माण का सवाल प्रमुख है. ऐसे समय में ये लोग प्रचारित कर रहे है कि भूमिगत काम नहीं हो सकता. इस स्तर का विघटनवाद गद्दारी नहीं तो और क्या है ?!

IV. चुनाव पर इनका दृष्टिकोण:

2024 के लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी ने भाजपा सरकार के ब्राह्मणवादी हिंदुत्व फासीवाद को चिह्नित करते हुए एक बयान जारी किया था जिसमें लिखा था कि भाजपा को मार भगाना है और चुनाव बहिष्कार करना है. इस बयान को विश्वविजय सीमा द्वारा तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया. जिस तरह बर्नस्टीन ने एंगेल्स के लेखन को तोड़ मरोड़ कर पेश किया था और उन्हें समाजवाद का एक शांतिप्रिय समर्थक बताया था, उसी तरह विश्वविजय- सीमा ने पार्टी के इस बयान के बारे में बताया कि पार्टी ने भाजपा को चुनाव में हराने की अपील की है जिसका साफ़ मतलब है विपक्ष को जिताना या चुनाव में भाग ले कर भाजपा को हराना. इस तरह से उन्होंने पार्टी को वर्ग समझौतावादी, खुला कानूनवादी बताने का प्रयास किया. सीमा ‘आज़ाद’ तो इस चुनाव में इंडिया गठबंधन को वोट भी देकर आई थी और उसके बाद उसने पार्टी के साथियों को अपनी मानवाधिकार कार्यकर्ता के कवर आइडेंटिटी के नाम पर अपने वोट देने को सही ठहराते हुए उसपर बहुमत बनाने का भी प्रयास किया.

यह पार्टी के रणनीति एवं कार्यनीति दस्तावेज में बताये चुनाव के प्रति दृष्टिकोण और पार्टी के 2024 के चुनाव बहिष्कार के बयान के एकदम खिलाफ़ है. पार्टी ने अपने रणनीति और कार्यनीति दस्तावेज में बताया है कि चुनाव में हिस्सा लेना कार्यनीति का सवाल नहीं, बल्कि रणनीतिक महत्त्व का सवाल है.

जहां तक मानवाधिकार कार्यकर्ता के कवर कि बात है तो कवर इनके अवसरवादी राजनीति को लागू करने का एक हथियार बन गया. उनके कवर का मतलब है कैसे क्रांतिकारी राजनीति की कसम खाते हुए अवसरवादी राजनीति का प्रचार करें. यहां तक कि ये अपने कवर का इस तरह से इस्तेमाल ही करती थी. वैसे ये माओवादी पार्टी के राज्य कमिटी का स्टेटस रखती थी परन्तु पार्टी लाईन के विरुद्ध काम करने के समय ये PUCL की प्रदेश सचिव बन जाती थी.

V. पार्टी नेतृत्व के खिलाफ़ दुष्प्रचार करना

विश्वविजय और सीमा ने लगातार पार्टी नेतृत्व, ख़ासकर NCC के खिलाफ़ दुष्प्रचार किया और गुटबाजी की. इन्होंने अपने आपको लिन पिआओ का सच्चा अनुयायी साबित करते हुए NCC के खिलाफ़ षड़यंत्र किया जिसमें अपनी निचली कमिटी में NCC के खिलाफ़ भ्रामक प्रचार किया और पार्टी से इतर अपना एक अलग गुट बना कर कुछ समय तक अपने मंसूबों को अंजाम भी दिया. हालांकि NCC द्वारा साथियों से संपर्क करने के बाद इनके इरादे असफल हो गये थे. वे कहते थे –

  1. पार्टी के महासचिव बसवाराजू के कारण पार्टी पीछे हट की स्थिति में गयी है क्यूंकि पार्टी में मिलिट्री लाईन हावी है.
  2. NCC का गठन गैर जनवादी तरीके से हुआ है.
  3. NCC में एक ही आदमी है और उसकी तानाशाही चल रही है.
  4. NCC वाम दुस्साहसवादी है.
  5. NCC सभी साथियों को UG कराना चाहती है और ओपन काम के महत्त्व को कम करके आंकता है.
  6. NCC नौकरशाह और तानाशाह है, जो कोई भी उसपर सवाल उठा रहे हैं और उससे अलग तरीके से काम करना चाहता है, ऐसे लोगों को NCC पार्टी से निकाल रही है और गलत ढंग से गद्दार घोषित कर रही है.

पहले बिंदु पर हम पहले ही बात कर चुके है. विश्वविजय का स्तर इस हद तक गिरा हुआ है कि वे पार्टी के महासचिव पर इतने हलके में इतना बड़ा, बेबुनियाद आरोप लगाते फिरते हैं.

दूसरे और तीसरे बिंदु पर बात करे- पार्टी के किसी भी ढांचे का निर्माण पार्टी की उपरी कमिटी द्वारा ही किया जाता है. NCC के पार्टी द्वारा गठन को लेकर विश्वविजय को पार्टी का रेसोलुशन भी दिखाया गया था, केन्द्रीय कमिटी की तरफ से उन्हें चिठ्ठी भी आयी थी, इसके बावजूद भी NCC के गठन पर और कमिटी में मौजूद सदस्यों की संख्या पर सवाल उठाने का आखिर क्या कारण और क्या मकसद हो सकता है ?

इसका जवाब एकदम साफ़ है. इसके पीछे का कारण है कि पार्टी संकट की स्थिति में विश्वविजय सीमा जैसे मेन्शेविकवादी अवसरवादी निम्न पूंजीपति लोग पार्टी लाईन से इतर अपने व्यक्तिगत इच्छा अनुसार पार्टी की लाईन को ढालना चाहते हैं. परन्तु ऐसे समय में NCC मजबूती से एकता कांग्रेस-नौवी कांग्रेस में स्थापित पार्टी लाईन को बचाने के लिए समझौताविहीन संघर्ष कर रही है, इसलिए इन अवसरवादियों को NCC का काम फूटी कौड़ी नहीं सुहा रहा है. वैचारिक संघर्ष में कमजोरी के कारण ये अवसरवादी गठन प्रक्रिया, कमिटी में एक या अनेक सदस्य, जनवादी केन्द्रीयता का उलंघन जैसे मुद्दों पर NCC को बदनाम करने का प्रयास कर रहे हैं. इन प्रयासों में ये लोग शासक वर्ग के साथ खड़े हैं. परन्तु इनके मंसूबे न तो कभी इतिहास में सफल हुए थे और न ही आज हो सकते हैं.

चौथे बिंदु पर बात करते हुए सबसे पहले बता दें कि पीबी रेसोलुशन 2024 के अनुसार पार्टी के कुछ इलाकों में दक्षिण अवसरवाद का प्रभाव है जिसमें उत्तर भारत और तेलंगाना शामिल है. इसमें कहीं भी वाम अवसरवाद का ज़िक्र नहीं है.

सीमा के नारीवाद का पर्दाफ़ाश

भारतीय क्रांति के लिए महिला मुक्ति का सवाल सामंतवाद विरोधी और साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष से ही हल किया जा सकता है. सीमा जो पार्टी के संघर्षों की विरासत का गलत इस्तेमाल कर के जनता को गुमराह करते हुए और अपने सामंती व साम्राज्यवादी नारीवाद को छुपाने के लिए एक प्रगतिशील नारीवाद का ढोंग रच रही है.

  1. सीमा लिव-इन को जनवादी अधिकार मानती है और इसी तरह इसका प्रचार भी करती है, जिसमें विश्वविजय की भी सहमति है. अपनी निचली कमिटी के साथियों में शादी-पूर्व यौनिक संबंधों को वे सही ठहराते थे, यहां तक कि उसे प्रोत्साहित भी करते थे, यह जानते हुए कि पार्टी का इसपर क्या स्टैंड है. पार्टी नियम अनुसार शादी-पूर्व यौनिक सम्बन्ध और लिव इन साम्राज्यवादी रुझान हैं और पार्टी इसे गलत मानती है. यह नव-उदारवादी व्यवस्था की ही उपज है जिसने यौन को एक उपभोगतावादी वस्तु में बदल दिया, जिसमें बिना किसी ज़िम्मेदारी या जवाबदेही के यानि बिना प्रतिबद्ध रिश्ते के केवल अपनी यौन इच्छा पूरी करने और अपने अलगाव को दूर करने के लिए सम्बन्ध बनाये जाते हैं.
  2. ये लोग मल्टीपल रिलेशन – एक से ज़्यादा संबंधों को भी प्रोत्साहन देते हैं. पार्टी के नियमानुसार एक से दूसरे रिश्ते में जाने के बीच में कम से कम एक साल का अंतराल होना चाहिए वरना वह रिश्ता मल्टीपल रिलेशन में माना जाएगा. यदि एक रिश्ते से पूरी तरह निकलने से पहले ही दूसरे रिश्ते में जाने से पुराने और नए दोनों रिश्ते पर गलत प्रभाव पड़ता है. साथ ही रिश्ता बदलते रहना भी उपभोक्तावादी साम्राज्यवादी संस्कृति का ही नतीजा है. सामंती व पितृसत्तात्मक समाज के कारण निश्चित ही लिव इन और मल्टीपल रिलेशन में महिलाओं का शोषण होता है इसलिए यह जनवादी नहीं अपितु महिला विरोधी है. भारत के सन्दर्भ में ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक मूल्य भी उत्तर आधुनिक विचार का इस्तेमाल करता है इसलिए यह साम्राज्यवादी मूल्य सामंतवाद को भी और मज़बूत करता है. चूंकि ये लोग खुद यौनिक अवसरवाद के शिकार है, इसलिए नजरिया पत्रिका में आये यौनिक अवसरवाद का लेख इनको फूटी कौड़ी नहीं सुहा रहा है और सीमा देश भर में घूम घूम कर उसके खिलाफ़ दुष्प्रचार कर रही है. यौनिक रिश्तों के मामले में सीमा पार्टी को सामंती आरोपित करती है. इनकी व्यक्तिवाद की परिकाष्ठा यह है कि इस मामले में यह कॉ. लेनिन के स्टैंड को भी गलत ठहराती है. आइये देखते है इसपर उनका क्या स्टैंड है. लेनिन का क्लारा जेटकिन के साथ साक्षात्कार में वे कहते हैं कि कुछ लोग यौनिक इच्छा और प्यार की भूख को मिटाना एक गिलास पानी पीने जितना तुच्छ चीज़ समझते हैं. ‘क्या आम तौर पर कोई व्यक्ति गटर में लेट कर उसका पानी पीयेंगे ? या ऐसे गिलास से पानी पीएगा जिसके किनारे कई होठों द्वारा जूठे किये गये हो ?’ सीमा जैसी उत्तर आधुनिक नारीवादियों को लेनिन के ये सवाल सामंती व पिछड़ी सोच के प्रतीत होते हैं. उनकी तरह की नारीवादी कहती हैं कि लेनिन का दृष्टिकोण सामंती शुद्धतावादी है. उनका मानना है कि होठों द्वारा जूठा किये गये गिलास का मतलब कि कई लोगों से सम्बन्ध रह चुका है इसलिए इसको सामंती नैतिकता से चरित्रहीन मानेंगे. परन्तु लेनिन इस संदर्भ में यह बात नहीं कह रहे हैं. समस्या इसमें नहीं है यदि किसी का कोई रिश्ता रहा है और ख़तम हो कर नया रिश्ता बना है या यदि ऐसा कई बार भी हुआ हो, परन्तु यह सवाल है कि हम रिश्ते किस दृष्टिकोण से बना रहे हैं ?लेनिन जब कहते हैं कि कुछ लोग इसे एक गिलास पानी पीने जितना तुच्छ समझते हैं, इसका मतलब है कि वे बिना किसी ज़िम्मेदारी या जवाबदेही के केवल अपनी प्यार की और यौनिक भूख मिटाने के लिए (जैसे पानी की प्यास बुझाने के लिए) रिश्ते बनाते हैं. वे बताते हैं कि रिश्तों का एक सामाजिक पहलु भी है, वह केवल एक इन्सान की ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ (जैसा कि उत्तर आधुनिकतावादी कहते हैं) की बात नहीं हो सकती, उसमें दो लोग शामिल हैं और एक तीसरा आने वाला. नव-उदारवाद ने रिश्तों का बाजारीकरण कर दिया है जिससे रिश्ते अपने अलगाव को दूर करने का साधन बन गये हैं. यह नव-उदारवादी बाज़ार जनता की समस्याओं के दुःख को मिटाने के लिए सेक्स को साधन के रूप में बताता है. परन्तु इसमें जा कर भी लोग अपनी समस्याओं का हल नहीं ढूंढ पाते, अपने आंतरिक संकट से निकल नहीं पाते. क्यूंकि उनका यह संकट तो दरअसल इसी सामंती-साम्राज्यवादी व्यवस्था ने गहराया है. तो उसका हल भी इसी शोषणकारी व्यवस्था के खात्मे के साथ होगा. लेनिन पुराने (सामंती) संबंधों को तोड़ने की बात कहते हैं, साथ ही बुर्जुआ विचारधारा से प्रभावित ‘नए संबंधों ‘ की भी कड़ी आलोचना करते हैं व कम्युनिस्ट संबंधों की तरफ़ बढ़ने को कहते हैं.
  3. सीमा उत्तर आधुनिक जेंडर और क्वेयर (queer) थ्योरी का भी समर्थन करती हैं. पार्टी के अनुसार जेंडर और क्वेयर शब्द उत्तर आधुनिक, बाज़ार प्रायोजित, बुर्जुआ विचारधारा से प्रभावित है. जेंडर की जगह सेक्स शब्द का प्रयोग होना चाहिए जो सेक्स के जैविक और सामाजिक पहलुओं को दर्शाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. पार्टी केवल LGBT को मानती है और क्वेयर में शामिल अनेकों पहचानों को साम्राज्यवाद प्रायोजित मानती है. LGBT के जनवादी अधिकारों के लिए पार्टी संघर्ष करती है.
  4. एक ओर ये साम्राज्यवादी मूल्यों का समर्थन करते हैं और दूसरी ओर ये सामंती मूल्यों से भी ग्रसित है. इसलिए ये लोग साथियों के लिए पार्टी के सदस्यों और हमदर्दों के बीच में से रिश्ता (arrange marriage) ढूंढते फिरते हैं. यदि कोई साथी लम्बे समय से किसी रिश्ते में नहीं है या किसी के प्रति आकर्षित नहीं हो रहे हैं तो उसे ये लोग एबनॉर्मल समझते हैं. इनकी अवधारणा मनुस्मृति से मेल खाती है जो मानता है कि शादी के बिना कोई व्यक्ति, ख़ासकर महिला, अधूरी है. यहीं नहीं, सीमा निचली कमिटी के साथियों को कहती थी कि उन्हें वे अपने बच्चों की तरह मानती है. यह भी सामंती नारीवाद की ही अभिव्यक्ति है जिसमें साथियों को एक राजनैतिक इकाई की तरह देखने के बजाय उन्हें अपने मातहत एक व्यक्तिगत रिश्ते के बतौर देखता है. सीमा निचले कमिटी के एक साथी द्वारा उनके प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार की आलोचना पर कहती है कि कमिटी के सभी साथियों को वे अपने बच्चे की भांति मानती है और जैसे एक मां के बच्चे अलग अलग स्वभाव के होते हैं लेकिन मां के लिए सब बराबर होते हैं उसी तरह वे भी सभी साथियों को बराबर प्यार करती हैं. ये सामंती पारिवारिक ढांचे को संगठन में लागू करते हैं जबकि क्रांतिकारी संगठनों व पार्टी में हम मौजूदा सामंती पितृसत्तात्मक और साम्राज्यवादी रिश्तों को तोड़ कर क्रांतिकारी रिश्तें बनाते हैं जहां सभी साथी क्रांति में एक दूसरे के कामरेड्स हैं, सभी बराबर हैं और ये रिश्ते राजनीति के वजह से बने हैं, न कि व्यक्तिगत दोस्ती या मां – बच्चों के रिश्ते हैं. जैसे कॉमरेड मार्क्स और एंगेल्स का रिश्ता था, उस तरह के रिश्ते बनाने का प्रयास होना चाहिए जिसमें एक दूसरे के सहयोग से हम कम्युनिस्ट आंदोलन को और मज़बूत कर सकें.
  5. सीमा संगठन के उन पुरुष साथियों को सबसे बेहतर और सबसे कम पितृसत्तात्मक मानती थी और उसका बाकि साथियों में प्रचार भी करती थी जो उनका विरोध कम करते थे, उनकी बातें मानते थे, उनसे व्यक्तिगत रिश्ता बेहतर था, उनके कामों में मदद करते थे और जिनमे समाज द्वारा बताई गयी निम्न पूंजीपति महिलाओं से जोड़ कर देखे जाने वाले फेमिनिन (feminine) गुण हों जैसे कम गुस्सा करने वाले, ज्यादा ध्यान रखना, घर के कामों को करना, राजनैतिक रूप से तीखा स्टैंड न रखना, आदि.

जब निचली कमिटी के साथियों ने सीमा को महिला – पुरुष यौनिक संबंधों पर बातचीत कर के एक राय बनाने को कहा तो उन्होंने इसपर बातचीत करने के बजाय कहा कि उनकी अपनी अलग राय है और बाकि साथियों की अलग तो एक राय बनाने की ज़रूरत नहीं है. यह सीमा के उत्तर आधुनिक दर्शन के कारण है जिसमें वे अपने आप को एक ‘स्वतंत्र विचारों वाली महिला’ के रूप में प्रदर्शित करती है. यहां यह सवाल है कि क्या वाकई स्वतंत्र विचार जैसी कोई चीज़ संभव है ? इसके बारे में अगले भाग में बात करते हैं.

VI. विश्वविजय- सीमा का उत्तर आधुनिकवादी दर्शन

स्वतंत्रता का वस्तुगत आधार क्या है ? या तो किसी व्यक्ति के विचार शासक वर्ग के हित में होंगे या सर्वहारा वर्ग के हित में. क्रांति के लिए आवश्यक है सर्वहारा वर्ग की हिरावल पार्टी के नेतृत्व में विचारों की एकता. लेकिन सीमा – विश्वविजय पार्टी स्टैंड से अलग राय बनाते हैं. यही उत्तर आधुनिक विचार है जो व्यक्ति की उग्र स्वतंत्रता (radical freedom) की बात करता है. जो किसी ढांचे को और किसी अनुशासन को मानने से इनकार करता है, चाहे वह शासक वर्ग का हो या कम्युनिस्ट पार्टी का. परन्तु कोई भी चीज़ निष्पक्ष नहीं रह सकती इसलिए अंततः वे शासक वर्गीय ढांचे में जा कर शामिल होते हैं. सीमा विश्वविजय पार्टी के ढांचे व अनुशासन को किसी व्यक्ति या कमिटी की तानाशाही मानते हैं. जो साथी पार्टी के अनुशासन को मानते हैं उन्हें वे यांत्रिक और मशीन का पुर्जा करार कर देते हैं. ये लोग वैचारिक विभिन्नता के नाम पर अतिजनवाद को लागू कर अपनी अवसरवादी-विघटनवादी-संशोधनवादी लाईन को पार्टी में लाना चाहते थे.

ये कहते थे कि हम उन्हीं दस्तावेजों को पढेंगे जो केन्द्रीय कमिटी द्वारा लिखे गये हैं या लागू करवाए हैं, NCC द्वारा दिए दस्तावेजों को नहीं पढेंगे. क्यूंकि ये पार्टी और एनसीसी को अलग अलग कर के देखते हैं. जबकि ये लोग यह भी जानते हैं कि कोई भी कमिटी पार्टी की उपरी कमिटी द्वारा बनायी जाती है. यदि इनका मार्क्सवादी दृष्टिकोण होता तब ये इस तरह की मूर्खतापूर्ण चीज़ें न कहते.

विश्वविजय यहां तक कहते हैं कि वे क्रांति के प्रति उत्तरदायी हैं न कि किसी पार्टी के प्रति. हमारे शिक्षकों (मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, स्टालिन, माओ) ने यह बताया है कि बिना क्रांतिकारी पार्टी के क्रान्ति संभव नहीं परन्तु ये उत्तर आधुनिक दर्शन से ग्रसित अवसरवादी क्रांति और पार्टी को भी अलग कर देते हैं ताकि इन्हें पार्टी के प्रति किसी तरह की ज़िम्मेदारी न लेनी पड़े, पार्टी लाईन को न मानना पड़े और ये दिखावा भी रहे कि वे क्रांति के लिए काम कर रहे हैं. असल में इनके अन्दर शासक वर्गीय विचारधारा है जो कि विघटनवाद है और जिसका क्रांति से कोई रिश्ता नहीं है.

VII. विश्वविजय का सामंती नौकरशाही

1. भारतीय समाज का प्रमुख अंतर्विरोध सामंतवाद और भारतीय जनता के बीच है, जिसकी प्रमुख विशेषता ब्राह्मणवाद है. इसलिए पार्टी के भीतर भी सामंती नौकरशाही एक खतरनाक गैर सर्वहारा रुझान के तौर पर मौजूद है. विश्वविजय द्वारा अपनी अवसरवादी-विघटनवादी-संशोधनवादी लाईन को लागू करने के लिए सामंती नौकरशाही का इस्तेमाल किया जाता रहा है.

उत्तर भारतीय क्षेत्र में ये दो तरह की सामंती प्रवृत्ति देखी जाती है –

  1. एक व्यक्ति का अधिपत्य होना और अपने नीचे बाकि साथियों को अपने आधीन समझना – यह प्रवृत्ति विशेषकर पूर्वांचल व बिहार में पाई जाती है, जहां एक गांव में एक बड़ा ज़मींदार गांव की राजनैतिक-आर्थिक-सामाजिक ज़िंदगी को नियंत्रित करता है.
  2. भाईचारावाद – इसमें जाति आधारित आपसी रिश्तों के आधार पर ज़मींदारों के एक समूह द्वारा दुसरे लोगों पर अधिपत्य बनाया जाता है – यह प्रवृत्ति हरियाणा के सामंतवाद से मेल खाती है. जो आज वहां के खाप पंचायत में देखा जा सकता है. संगठन में यह ऐसे देखा जा सकता है – एक दूसरे की बातें मानना चाहे सही हो या गलत, और उनकी गलतियों पर पर्दा डालना. पूर्वांचल की सामंती पृष्ठभूमि से आये विश्वविजय में पहले तरीके का सामंतवाद देखा जा सकता है.

3. वे अपनी निचली पार्टी संगठन में अपना अधिपत्य बनाने के लिए लगातार पार्टी नेतृत्व के खिलाफ दुष्प्रचार करते रहे. उन्होंने इसमें बसवाराजू को भी नहीं छोड़ा. यहीं नही, तालमेल की प्रक्रिया में NCC व CC द्वारा उनको आई चिठ्ठियों को वे निचली कमिटी में पढ़ाते थे और अपने हिसाब से उसकी व्याख्या करते थे ताकि साथियों को NCC के खिलाफ़ और अपने पक्ष में कर सकें. इसके लिए विश्वविजय-सीमा अपनी चिठ्ठियों को नीचे पढ़ा कर पार्टी सुरक्षा का भी घोर उल्लघंन किया. पार्टी की सुरक्षा, जिसके ख़ातिर तमाम साथी अपनी जान देते आये हैं, उस पहाड़ से भी भारी महत्त्व वाली चीज़ को उन्होंने अपने निजी स्वार्थ को पूरा करने के लिए पंख जितना हल्का ले लिया. इसके अलावा उन्होंने NCC की चिठ्ठियां भी सेलेक्टिव तरीके से पढवाई. एक प्रमुख चिठ्ठी को छुपाया और ऐसा करते हुए बाकि साथियों में यह गलत धारणा बनाने का प्रयास किया कि तालमेल की प्रक्रिया में विश्वविजय को bypass किया गया इसलिए NCC को नौकरशाह, यांत्रिक, तानाशाह कहा. इसी उद्देश्य से उन्होंने तालमेल के दौरान हुई NCC से बातचीत की भी अधूरी और झूठी रिपोर्टिंग की. इसके अलावा उन्होंने हरसंभव प्रयास किये कि ‘उनके इलाके’ में UG पार्टी निर्माण न हो सकें. ताकि UG पार्टी नेतृत्व न आ सके और यह ‘उनका इलाका’ बना रहे यानि उनकी मठाधीशी कायम रहे. वे पार्टी संगठन व जनसंगठन को एक सामंत के भांति अपने नियंत्रण में बनाये रखना चाहते थे इसलिए वे नहीं चाहते थे कि NCC ‘उनके इलाके’ में पार्टी द्वारा चलाये जा रहे वर्ग संघर्ष को आगे बढ़ाये बल्कि वे पार्टी संगठन और जनसंगठन को अपने अनुसार ही चलाना चाहते थे. इसलिए ही जब उनको महसूस होने लगा कि साथी अब उनके नेतृत्व को नहीं मान रहे हैं व NCC के नेतृत्व को मानने लगे है तब उनके अन्दर यह छटपटाहट होने लगी कि कही ‘उनकी संपत्ति’ उनके हाथ से न निकल जाए, और वे निचली कमिटी के साथियों के कामकाज में ज़रूरत से ज्यादा टोका टाकी करने लगे और शिकायत करने लगे कि साथियों द्वारा उन्हें bypass किया जा रहा है. यह सामंती अहंकार को ठेस पहुंचने की छटपटाहट थी जो उनके गुस्सा और परेशानी में साफ़ झलकती थी. जब आखिरकार साथियों ने NCC से तालमेल कर लिया तब उनकी छटपटाहट इतनी बढ़ गयी कि उनका गुस्सा अपने चरम पर था और उनकी रातों की नींद उड़ गयी थी, उनकी सामंती सोच अब बिना किसी फ़िल्टर के उनके मुंह से निकल रही थी. तालमेल हो जाने के बाद जब उनसे मिलने दो साथी गये तब उनमें से महिला साथी को उन्होंने कहा कि लेकर आओ उसे (NCC के साथी को) जिसकी तुम पैरोकारी कर रही हो. यह सामंती पितृसत्तात्मक टिप्पणी थी जिसपर तथाकथित प्रगतिशील नारीवादी सीमा आज़ाद ने भी अपना मौन समर्थन दिया.

4. विश्वविजय-सीमा एक समय में UG हो कर काम किये हैं और भाकपा (माओवादी) के राज्य कमिटी सदस्य रहे हैं इसलिए अपनी सामंती धौंस दिखाने के लिए विश्वविजय अपने पार्टी के पद को और अपने द्वारा किये पुराने कामों को बघारते रहते हैं. इसके अलावा जब NCC के तालमेल से उनकी असंतुष्टि बढ़ रही थी, वे अपने इलाके पर नियंत्रण खो देने के ख्याल से असुरक्षित महसूस करने लगे थे, तब वे बघारते थे कि उन्होंने पार्टी में तीस सालों तक काम किया है, अपना पूरा जीवन पार्टी के लिए ही दिया है, आदि. ये सब बता कर वे अपनी मौजूदा स्थिति को ढ़कते थे जिसमे वे लगभग निष्क्रिय थे और नेतृत्व नहीं दे पा रहे थे. इसमें यह बात भी महत्वपूर्ण है कि पहले किसी ने कितना भी काम किया हो परन्तु यदि वे मौजूदा समय में पार्टी विरोधी काम कर रहे हैं, अवसरवादी–विघटनवादी–संशोधनवादी लाईन अपना रहे हैं तो उनकी लाखों अच्छाईयां और कुर्बानियां मायने नहीं रखती है. इतिहास में उन्हें केवल गद्दार के रूप में ही याद किया जाएगा. जैसे वेणुगोपाल का पार्टी को आगे बढाने में जितना भी काम रहा, सब उसके सरेंडर करने व अलग लाईन लेने से मिट्टी में मिल गया.

5. विश्वविजय में हमेशा से यह सामंती प्रवृत्ति रही है कि निचली कमिटी के साथियों की कमियों और गलतियों पर डांटना, चिल्लाना व उनको आरोपित करना और उन गलतियों व कमियों के पीछे के राजनैतिक-वैचारिक पहलुओं पर काम न करना. यहां तक कि जनसंगठन के साथियों के सामने भी वे अपनी निचली कमिटी के साथियों की आलोचना करते थे यानि सही ढांचे में आलोचना न कर के उन साथियों को नीचा दिखाने के उद्देश्य से जनवादी केन्द्रीयता का उलंघन करते थे.

6. कई राजनैतिक मसलों को वे मालेमा से हल करने के बजाय अपने सामंती प्राधिकार को इस्तेमाल कर के हल करते थे. वे सांगठनिक समस्याओं में भी इतना उलझा कर रखते थे कि पार्टी ढांचे की मीटिंग में लगभग पूरा समय जनसंगठन के सांगठनिक मामलों पर ही बातचीत होता था जिसके कारण नयी पार्टी भरती नहीं हो रही थी. विश्वविजय ने सालों से नयी पार्टी भर्ती को रोक रखा था. विश्वविजय के निष्क्रिय होने के बाद ही निचली कमिटी के साथियों ने राजनितिक काम पर भी जोर देना शुरू किया और तभी नए पेशेवर क्रन्तिकारी और पार्टी भर्ती के लिए रास्ता खुला.

7. विश्वविजय-सीमा साथियों के साथ कॉमरेडाना रिश्ता बनाने के बजाय सामंती व साम्राज्यवादी व्यक्तिवाद के आधार पर रिश्ते बनाते थे. एक साथी से इन्होंने पारिवारिक रिश्ता बना रखा था. वह साथी नियमित तौर पर उनके घर पर मिलने के लिए आता था परन्तु इन्होंने उस साथी के वैचारिक-राजनीतिक विकास पर कभी ध्यान नहीं रखा. इस साथी से इन्होंने खाने पीने, हंसी मज़ाक करने और अपने व्यक्तिगत कामों को कराने भर का रिश्ता रखा. अपने व्यक्तिगत काम जैसे हॉस्पिटल में इलाज के लिये दिखाना, बीमारी में ध्यान रखना आदि.

इनके लिए किसी साथी का मूल्यांकन उनके द्वारा ली जा रही राजनैतिक स्टैंड से तय नहीं होता था बल्कि इससे तय होता था कि अपने व्यवहार में कौन उनके साथ बेहतर व्यक्तिगत रिश्ता बनाता है. उनको नेता/दोस्त मानने वाले लोगों को बेहतर मानना और अपने राजनैतिक विरोधियों को बुरा व्यक्ति मानना – यह सामंती नौकरशाही प्रवृत्ति ही है. एक सामंत के भांति विश्वविजय राजनैतिक असहमतियों और विरोधों को अपने अपमान के रूप में लेते थे. NCC की चिठ्ठियों को भी उन्होंने अपना अपमान समझा, यह उनका सामंती अहंकार ही था.

8. विश्वविजय और सीमा पार्टी के दस्तावेजों को नहीं पढ़ते थे. बस्तर टॉकीज़ youtube चैनल को यह जान कर ख़ुशी होगी कि विश्वविजय इसी चैनल को पार्टी की ख़बरों और विभिन्न मुद्दों पर पार्टी के स्टैंड का स्रोत मानते थे. चुनाव पर पार्टी का स्टैंड भी इन्होने इसी चैनल से देख कर साथियों को बताया था. विश्वविजय को इस बात की आत्मसंतुष्टि रहती थी कि उन्होंने एक समय में मलेमा के क्लासिक दस्तावेज पढ़ रखे हैं इसलिए उनकी बुनियादी समझदारी बनी हुई है. वे नयी बहसों को नहीं पढ़ते थे. वे पूछने पर उन पर ठीक से नहीं बता पाते, लेकिन तब भी उन्हें कभी पढने – समझने की ज़रूरत महसूस न होती थी, न ही उनपर पार्टी स्टैंड को जानने की ज़रूरत महसूस होती थी. NCC से तालमेल बनने की प्रक्रिया के शुरुआत में जो पार्टी दस्तावेज़ आते थे, उनके लिए वे निचली कमिटी के सचिव को ज़िम्मेदारी दे देते थे कि वो पढ़ कर उन्हें उनका सार बता दें. बाद में उन्होंने केवल ऐसे दस्तावेज पढना शुरू किया जिनपर उनका कुछ विवाद था. सीमा भी पार्टी दस्तावेज, सर्कुलर, नए मुद्दों पर जारी बयानों को नहीं पढ़ती थी और केवल सोशल मीडिया व ख़बरों के माध्यम से पार्टी स्टैंड को जानती थी और इसी में आत्मसंतुष्ट थी. ये भी सामंती नौकरशाह की प्रवृत्ति है जो जनता के बीच नहीं जाते हैं, जांच पड़ताल नहीं करते हैं, पार्टी नियमों, दस्तावेजों, सर्कुलरों का अध्ययन नहीं करते है, और ऐसा समझते हैं कि वे पर्याप्त जानकार-समझदार हैं.

9. ये लोग उपलब्धियों का श्रेय खुद लेते थे और कमियों व गलतियों को दूसरों पर थोपते थे. जैसे निचली कमिटी द्वारा इकट्ठी की गयी फण्ड का श्रेय वे खुद पर ले लेते थे और जनसंगठन में आई कमियों का दोष सब उनपर डालते थे और कभी नही सोचते थे कि इंचार्ज के बतौर क्या उनकी भी इसमें कोई भूमिका है. यह भी सामंती नौकरशाही प्रवृत्ति है.

VIII. निष्कर्ष –

साथियों, हम देख सकते हैं कि जैसे जैसे कम्युनिस्ट पार्टी कमज़ोर हो रही है, अवसरवाद-विघटनवाद-संशोधनवाद मज़बूत हो रहा है. आज कौन क्रांतिकारी है और कौन नहीं, यह इससे तय होगा कि कौन विश्वविजय-सीमा के खिलाफ समझौताविहीन संघर्ष लड़ रहा है और कौन उनका साथ दे रहा है या त्रोत्स्कीपंथी की तरह बीच का रास्ता (बीच का रास्ता जो अंततः पार्टी के खिलाफ़ ही है) अपना रहा है.

उत्तर भारत में क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन को पुनर्जीवित करने के प्रक्रिया में इस तरह के और भी गद्दारों का हमें सामना करना होगा. और इनसे संघर्ष करने के ही क्रम में सही लाईन स्थापित हो सकती है और उसी आधार पे पार्टी व आंदोलन को पुनर्संगठित किया जा सकता है. यह सबक हम रूसी और चीनी क्रांति के इतिहास से ले सकते हैं. इसलिए हमें अवसरवाद-विघटनवाद-संशोधनवाद के खिलाफ़ सक्रिय वैचारिक संघर्ष चलाना होगा. तब तक जब तक कि विश्व साम्यवाद स्थापित नहीं हो जाता. और यह ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी के ही कन्धे पर नहीं बल्कि हर क्रान्तिकारी जनसगंठन का भी है.

कॉमरेड माओ ने चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के तीन स्टेज बताये हैं जो कि हर क्रान्तिकारी पार्टी के विकास में आते हैं : पहला बचपना का स्टेज जिसमे पार्टी अवसरवाद–विघटनवाद–संशोधनवाद के खिलाफ़ लड़ने में कमज़ोर है और इस स्टेज में इस तरह के बहुत सारे लोग पार्टी में घुस जाते हैं. दूसरा स्टेज है जब पार्टी इसके खिलाफ़ संघर्ष कर के आगे बढती है और बड़ी तादाद में इनको पार्टी से बाहर निकाला जाता है. इस स्टेज में पार्टी का बोल्शेविकरण होता है. तीसरा स्टेज है जब पार्टी के भीतर से अवसरवाद–विघटनवाद–संशोधनवाद का खात्मा हो जाता है. यह स्टेज विश्व कम्युनिज्म में आयेगा. अभी भारत की पार्टी पहले स्टेज में है. पार्टी को रिवाइवल के लिए पहले से दूसरे स्टेज में छलांग लगाने की ज़रूरत है- पार्टी को मज़बूत करने, सच्ची बोल्शेविक पार्टी का निर्माण करने के लिए अवसरवाद–विघटनवाद–संशोधनवाद के खिलाफ़ संघर्ष करना बेहद ज़रूरी है.

[संपादक की ओर से: यह लेख हमें ई-मेल के ज़रिए मिला था. इस लेख के गंभीर और दूरगामी असर को देखते हुए हमने इसे जल्द से जल्द प्रकाशित करने का फ़ैसला किया है। हम इस लेख में दर्शाई गई विचारधारा और इसके प्रकाशन व प्रसार की पूरी ज़िम्मेदारी खुद लेते हैं। आने वाले दिनों में हम इसे अंग्रेज़ी में भी अनुवाद करने की कोशिश करेंगे.

नज़रिया मैगज़ीन की वेबसाइट के सौजन्य से रेड लाइन]

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