Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

प्रधानमंत्री का भाषण : खुद का पीठ थपथपाना और जनता को कर्तव्य की सीख

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 16, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

प्रधानमंत्री का भाषण : खुद का पीठ थपथपाना और जनता को कर्तव्य की सीख

तीन घटनाएं हुई पिछले डेढ़ हफ्ते में. तमिलनाडु के मुख्य सचिव के. षणमुगम ने प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि ‘तमिलनाडु सरकार ने चीन को एक लाख टेस्टिंग किट का आर्डर दिया था, जिससे अपने राज्य में टेस्टिंग प्रक्रिया को शीघ्रता व गति दी जा सके क्योंकि केंद्र की तरफ से आपूर्ति में देरी हो रही है. चीन से उनके एक लाख किट के ऑर्डर के जवाब में 50 हजार किट की पहली खेप का कन्साइनमेंट भेजा गया, जो तमिलनाडु नहीं पहुंचा. खबर है कि वह अमेरिका पहुंच गया.’

You might also like

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

ब्रटिश अखबार इंडिपेंडेंट में छपा कि फ्रांस ने चीन को 2 लाख मास्क किट का आर्डर दिया, जिसकी कन्साइनमेंट चीन से चली और बीच रास्ते में गायब हो गयी. फ्रांस के मुताबिक वह कन्साइनमेंट फ्रांस के बजाए अमेरिका पहुंच गया.

3 अप्रैल के इंडिपेंडेंट अखबार के ही अनुसार 5 लाख पीपीई किट का आर्डर जर्मनी की सरकार ने चीन को दिया. जर्मनी का ये आर्डर थाईलैंड के हवाई अड्डे से गायब हो गया. ये पीपीई का कन्साइमेन्ट भी अमेरिका पहुंच गया.

इन तीन खबरों से बाकी बहुत कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं किंतु यह प्रमुखतम है कि अमेरिका अपने यहां फैल चुकी महामारी से लड़ने के लिए कितना डेस्परेट है, प्रतिबद्ध है. वह किसी भी हद तक जाने को तैयार है और इसमें यदि भारत को, हैड्रोक्लोरोक्विन के लिए दी गयी धमकी को भी जोड़ लें, तो अमेरिका के किसी भी हद तक जाने का अंदाजा लगाया जा सकता है.

निश्चित ही इसमें यह तथ्य भी शामिल है कि पूरे विश्व में आंकड़ों में सर्वाधिक संक्रमित भी अमेरिका में ही हैं, जो लगभग 6 लाख के करीब पहुंच चुके हैं और मरने वालों की संख्या भी सर्वाधिक अमेरिका से ही है. इसमें शुरू में अमेरिकी प्रशासन, जिसमें राष्ट्रपति ट्रम्प ही प्रमुख हैं, द्वारा बरती गयी घोर लापरवाही इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है. ट्रम्प शुरू में इसे गम्भीर मानने को तैयार नहीं हुए. फिर इसे ‘चीनी वायरस’ कह कर मुद्दे का राजनीतिकरण करते रहे और चुनावी लाभ के हिसाब से ही मुद्दे को देखते रहे। जब आपदा व्यापक हो गयी तब जाकर गम्भीर हुए.

अब प्रधानमंत्री के भाषण को याद करें, जिसमें 25 मिनट के भाषण में मात्र दो प्रमुख सूचनाएं थी। एक थी, लाकडाउन की अवधि 3 मई तक बढ़ा दी गयी है और दूसरी थी, 20 अप्रैल को समीक्षा के पश्चात हॉट स्पॉट अर्थात, सर्वाधिक प्रभावित के चयन के आधार पर कुछ ढील प्रतिबन्धों के साथ दी जा सकती है. इसके अतिरिक्त गरीब मजदूरों की चिंता से लेकर सप्तपदी तक कोई भी बात महामारी के प्रति गम्भीरता, चिंता, संवेदनशीलता प्रकट करने के बजाय प्रवचन ही अधिक थे, जिसके लिए हमारे देश में हजारों साधु, संतों, मौलवियों, पादरियों की पहले ही कमी नहीं है.

प्रधानमंत्री अपनी पीठ थपथपाने और जनता को उसके कर्तव्य समझाने के लिए ही नहीं होता, खासकर ऐसे समय में जब महामारी का फैलाव बढ़ता जा रहा है साथ ही आम जन की दुश्वारियां भी, जिसकी खबरें चारों तरफ से हैं. किंतु प्रधानमंत्री उनको सम्बोधित करने के बजाय आईटी सेल को कंटेंट ही दे रहे हैं. एक शब्द भी देश में फैलाई गई साम्प्रदायिक घृणा पर, भूखी जनता पर खर्च नहीं किया.

देश में वायरस का फैलाव कितना है, किस स्तर तक है, यह तभी जाना जाएगा जब व्यापक पैमाने पर टेस्ट होंगे, जो कि अभी हफ्ते में एक लाख टेस्ट तक पहुंचे हैं जो बाकी देशों की तुलना में जो कुछ भी नहीं है. तब इस खुश फहमी में रहना कि हमारे यहां आंकड़े कम हैं, अमेरिका की तरह ही घातक हो सकता है.

बाबा साहेब डा. अंबेडकर की जयंती थी. प्रधानमंत्री ने उन्हें याद भी किया. अब यह कल्पना करें कि डॉ. अंबेडकर ने भी यदि लोगों की भल मनसाहत पर ही भरोसा करके, बजाय नियम कानून बनाने के, अपील की होती कि अस्पृश्यता छोड़ दें, उत्पीड़न ना करें, सब समान व्यवहार करें इत्यादि-इत्यादि तो देश व समाज आज किस अवस्था में होता ? प्रधानमंत्री ने कल यही किया बजाय ठोस उपायों की चर्चा के सिर्फ जुबानी जमा खर्च के, जिससे ना तो गरीब मजदूरों का पेट भरने वाला है, ना फंसे हुए मुसीबतजदा लोगों को राहत मिलने वाली है.

25 मिनट के सम्बोधन में यह बात भी कही गयी कि हम कोरोना से हुई मौतों को कम रखने में कामयाब रहे हैं अथवा हमारे यहां कोरोना से कम मौत हुई हैं. भले ही समुचित आंकड़ों के अभाव में यह कितना सही है पता नहीं, परन्तु उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार यह सही है. किंतु देश में 600 प्रमुख अस्पताल कोरोना के लिये अधिकृत कर दिए जाने के चलते व अन्य प्राइवेट छोटे क्लिनिक बन्द होने से स्वास्थ्य सेवाएं बड़े पैमाने पर बाधित हो गयी हैं, जिससे कोरोना के अतिरिक्त गम्भीर रोगों से ग्रसित लोगों के मरने के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं.

कुछ स्थानों से जो खबरे हैं वह बहुत चिंताजनक हैं, जहां अन्य मरीजों को अस्पताल लेने को तैयार नहीं हैं. ऐसी स्थिति में हम एक बीमारी से लोगों को बचाने के एवज में दूसरी बीमारी से ग्रसित लोगों की जान दांव पर नहीं लगा रहे ? क्या कल के सम्बोधन में इस पर कोई चिंता या कन्सर्न व्यक्त हुआ ?

अमेरिका में जो हालात आज हैं उसके लिए वहां की नीतियां ही प्रथमतया जिम्मेदार हैं और दक्षिण कोरिया, जर्मनी आदि में जहां कंट्रोल किया जा सका वहां भी उनकी नीतियां ही जिम्मेदार हैं. चुनौती सिर्फ महामारी से हो रही मृत्यु रोक देना नहीं है, भूख से होने वाली मृत्यु भी मृत्यु है. यह भी उतनी ही बड़ी चुनौती है और यह व्यवस्था की पैदा की हुई है. वह भी तब और भी भयानक हो जाता है जब 80 मिलियन टन से अनाज के भंडार भरे हों.

चुनौती बन्दी के कारण बेरोजगार हुए लोग भी हैं. चुनौती बाधित हुई शिक्षा व्यवस्था भी है. चुनौती अर्थव्यवस्था भी है. चुनौती छिन्न-भिन्न किया गया सामाजिक ताना बाना भी है, जिन पर इतने बड़े फैले हुए तमाम तरह की भिन्नताओं से भरे लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री के सम्बोधन में कहीं कोई चिंता नहीं दिखी.

एक बात जरूर अच्छी लगी कि देश के वैज्ञानिकों से उम्मीद की गई कि वे इस महामारी के ‘वायरस’ का टीका बनाने की चुनौती स्वीकारे. शायद ही इससे देश में शिक्षा, तर्क, विज्ञान व वैज्ञानिक चिन्तन विरोधी माहौल (वायरस) पर कुछ असर हो भले ही इन्हीं के अभाव से सम्पुष्ट सम्बोधन में इसका आह्वान था.

  • अतुल सती जोशीमठ

Read Also –

ताइवान ने पारदर्शिता, टेक्नालॉजी और बिना तालाबंदी के हरा दिया कोरोना को
कोराना की लड़ाई में वियतनाम की सफलता
राष्‍ट्र के नाम सम्‍बोधन’ में फिर से प्रचारमन्‍त्री के झूठों की बौछार और सच्‍चाइयां
मौजूदा कोराना संकट के बीच ‘समाजवादी’ चीन
कोरोना वायरस के महामारी पर सोनिया गांधी का मोदी को सुझाव
स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करके कोरोना के खिलाफ कैसे लड़ेगी सरकार ?

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

क्या कोरोना महामारी एक आपदा है ?

Next Post

भारत में हर बीमारी का एक ही दवा

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

भारत में हर बीमारी का एक ही दवा

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

‘त्रोत्सकी जैसों को अगर खत्म नहीं किया जाता तो क्रोधोन्मत्त लोग पीट-पीटकर मार डालते’ – राहुल सांस्कृत्यायन

November 17, 2023

आर्थिक-राजनीतिक चिंतन बंजर है मोदी-शाह की

March 13, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.