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बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद का फैसला

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 10, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद का फैसला

पं. किशन गोलछा जैन, ज्योतिष, वास्तु और तंत्र-मंत्र-यन्त्र विशेषज्ञ

बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद का फैसला आज राजनैतिक दबाव में आस्था के नाम पर लिखा गया, जबकि असल मामला सिर्फ भूमि विवाद का था. मस्जिद कैसे बनी मुद्दा ये नहीं था, बल्कि मुद्दा ये था कि एक ऐतिहासिक मस्जिद को तोड़कर वहां पुरे प्रीप्लान के साथ जबरन कब्ज़ा करने की कोशिश 1992 में अंजाम दी गयी और इसमें सैकड़ों नहीं, हज़ारों लोग पुरे भारत में मारे गये थे.

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असल में गुबंद के नीचे मूर्ति 23 दिसंबर, 1949 में रखी गयी थी और तब से ही राम जन्म स्थान की मान्यता को बल दिया गया. हकीकतन 1885 से पहले कोई भी हिन्दू वहां पूजा नहीं करते थे और मस्जिद के बाहरी अहाते में रामचबूतरा और सीता रसोई थी जबकि मस्जिद में उस समय नमाज पढ़ी जाती थी. इलाहबाद कोर्ट ने भी अपने फैसले में स्पष्ट लिखा था कि ये साबित नहीं होता है कि विवादित ढांचा बाबर से सबंधित था या मंदिर तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ, अर्थात मस्जिद बनाने के लिये किसी मंदिर को नहीं तोड़ा गया. मस्जिद का निर्माण जरूर मंदिर के भग्नावशेषों के ऊपर हुआ है.

ये सही है कि 1885 में जब सबसे पहले विवाद हुआ उसके बहुत पहले से सीता रसोई और रामचबुतरा वहां बना था, पर वहां कोई मूर्ति नहीं थी. और ये बेहद यूनिक है कि किसी मुस्लिम धार्मिक स्थल के अंदर कोई हिन्दू धर्म का धार्मिक स्थल भी था जबकि मुस्लिम धार्मिक स्थल में नमाज भी पढ़ी जाती थी और हिन्दुओं के आस्था का प्रतीक भी वहां था, मगर दोनों में आपस में कोई भी रंजिश या भेदभाव नहीं था और बड़े ही सौहार्दपूर्ण तरीके से दोनों धर्म के लोग आपस में रहते थे.

दोनों ही धर्म के लोग उस क्षेत्र में इबादत करते थे मगर पिछले 133 सालों में आज तक कोई भी ये प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाया कि वे उस विवादित हिस्से के मालिक थे. अतः दोनों ही उस जमीन के हिस्से के साझीदार हैं और चूंंकि दोनों पक्ष अपने दावे का सबूत नहीं पेश कर सके इसलिये दोनों को उस हिस्से का मालिक माना जाता है.

उक्त फैसला इलाहबाद हाईकोर्ट ने 2010 सुनाया था, अब जो सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मुख्य बिंदु चिन्हित किये हैं, वे हैं –

  • विवादित जमीन रेवेन्यू रिकॉर्ड में सरकारी जमीन के तौर पर चिह्नित थी.
  • राम जन्मभूमि स्थान न्यायिक व्यक्ति नहीं है जबकि भगवान राम न्यायिक व्यक्ति हो सकते हैं.
  • ढहाया गया ढांचा ही भगवान राम का जन्मस्थान है. यह हिंदुओं की आस्था है हालांकि मालिकाना हक को धर्म और आस्था के आधार पर स्थापित नहीं किया जा सकता.
  • रिकॉर्ड में दर्ज साक्ष्य बताते हैं कि विवादित जमीन का बाहरी हिस्सा हिंदुओं के अधीन था लेकिन उस समय मस्जिद मुस्लिमों के अधीन थी और उसमें नमाज भी होती थी. और इससे उस समय किसी भी हिन्दू धर्मगुरु को कोई ऐतराज नहीं था.

2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित जमीन को 3 हिस्सों में बांटने के लिये कहा था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अयोध्या का 2.77 एकड़ का क्षेत्र तीन हिस्सों में समान बांट दिया जाये लेकिन अब दावेदार ज्यादा है और हमें लगता है कि इसके सिर्फ दो दावेदार हो सकते हैं. अतः शिया वक्फ और निर्मोही अखाड़ा इत्यादि का दावा ख़ारिज किया जाता है.

हिन्दुओं का दावा सिर्फ विश्वास पर आधारित है, उसका कोई सटीक सबूत वे पेश नहीं कर पाये हैं. और मस्जिद में नमाज बंद हो जाने से वहां हिन्दुओं का दावा साबित नहीं होता. अगर हम अपने घर से दो साल के लिये किसी को किराये पर रखकर या किसी को चाबी देकर कहीं चले जाये तो भी घर हमारा ही रहता है, किसी और का नहीं हो सकता. गवाहों द्वारा दिये गये बयां अविश्वसनीय है क्योंकि गर्भगृह में 1949 से पहले से कोई मूर्ति नहीं थी सिर्फ चित्र लगा था, जबकि बाबरी मस्जिद का जिक्र तीन-तीन शिलालेखों में है.

रामचरित्र मानस और वाल्मीकि में रामायण में किसी भी जगह रामजन्मभूमि का जिक्र नहीं है. अतः धार्मिक हिसाब से भी पूरी जमीन को जन्मस्थान नहीं माना जा सकता.

रंजन गोगोई ने फैसला पढ़ते हुए ये भी कहा कि पुरात्व विभाग ने मंदिर होने के सबूत पेश किये मगर पुरातत्व विभाग यह नहीं बता पाया कि मंदिर गिराकर मस्जिद बनाई गई थी. कोर्ट के लिये थिओलॉजी में जाना उचित नहीं है क्योंकि मंदिर हिन्दू ही था, ये भी वे साबित नहीं कर पाये (हिन्दुओं के अलावा भी अन्य कई धर्मो में मंदिर होते हैं).

इन सब बिन्दुओं के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘विवादित ढांचे की जमीन हिंदुओं को दी जायेगी (इसी के कारण मुझे लगता है कि ये फैसला सरकारी दबाव में, राजनैतिक फायदे के लिये किया गया फैसला है) और हम सबूतों के आधार पर फैसला करते हैं कि मुसलमानों को मस्जिद के लिये दूसरी जगह मिलेगी. केंद्र सरकार तीन महीने में मंदिर सबंधी योजना तैयार करेगी तथा योजना में बोर्ड ऑफ ट्रस्टी का गठन किया जायेगा. फिलहाल अधिग्रहित जगह का कब्जा रिसीवर के पास रहेगा. केंद्र या राज्य सरकार अयोध्या में ही सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद के लिये सूटेबल और प्रॉमिनेंट जगह में 5 एकड़ ज़मीन दे.

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सभी शहरों को हाई अलर्ट पर रखा गया है और पुलिस हर जगह मार्च कर रही है ताकि कोई हिंसक घटना या दंगा न हो. सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट तौर पर कहा है कि मंदिर या मस्जिद सबंधी किसी भी तरह का विवादित लेख या भाषण अथवा किसी भी तरह की भड़काऊ टिप्पणी संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखी जायेगी. अतः आप किसी भी प्रकार की विवादस्पद पोस्ट या कमेंट से बचे क्योंकि फैसला चाहे कुछ भी हुआ है, संविधान के अनुसार दोनों पक्षों को जमीन आवंटित होनी है और हम सब को मानवता की भलाई के लिये शांति रखनी है और साथ ही ये भी ध्यान रखना है कि विवादित मामला सिर्फ जमीनी हक़ का था, आस्था का नहीं इसलिये इसे किसी भी तरह का धार्मिक रंग तो देना ही नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के 1045 पृष्ठों के फैसलों को पूरा पढ़ने के लिए click करें.

https://twitter.com/RoflSinha/status/1193087854961995776

नोट : इस विवाद को सटीकता से समझने के लिये फैजान मुस्तफा ने यू-ट्यूब पर सिलसिलेवार कई वीडियो अपलोड किये हैं, जिसमें शुरू से लेकर आखिर तक का सारा मुद्दा मौजूद है.

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