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अब आंदोलन की राह पर

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 23, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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अब आंदोलन की राह पर

गुरूचरण सिंह

आंदोलन यानि हलचल, उथल-पुथल ! बाहरी हलचल या उथल-पुथल से पहले जरूरी होता है वह उथल-पुथल आपकी चेतना को अशांत कर दे, आपका अंतर्मन को मथ जाए, अनेक सवालों से बेंध जाए, लगे कुछ तो ऐसा हुआ है जिसके चलते अचानक शांत सरोवर में तरंगे उठने लगी हैं और कार्य- कारण का संबन्ध समझ में आते ही आप प्रतिकार की मुद्रा में आ जाते हैं.  NRC और CAB (अब CAA) ने बिल्कुल यही किया है.

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क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

हमारे चुने गए नुमाइंदों के जरिए हमारे मन की यह उथल- उथल संसद में भी प्रतिध्वनित होगी, यह हलचल देश की सबसे बड़ी पंचायत में भी दिखाई देगी, ऐसी उम्मीद की जाती है लोकतंत्र में. लेकिन जब आपके यही नुमाइंदे इसकी उपेक्षा करते हैं, संख्या बल से शोर मचा कर सागर के टापू जैसे छोटे से और चेतना से भी कमज़ोर विपक्ष को दबा देते हैं और अपने ग़लत काम को भी जनादेश के तर्क से सही ठहराते हैं तो सड़क पर उतरने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं बचता. संसद तब एक धर्म संसद में बदल जाए, आम आदमी की चिंताएं जब इस हवन की समिधा बन जाएं तो जनता जनार्दन को भी अपने रौद्र रूप के दर्शन करवाने पड़ते हैं. संस्कृति के पहरुए होने का दावा करने वाले ही जब उसकी धज्जियां उड़ाते लगें, उसकी आत्मा तक को भी घायल कर दें, ‘सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया,सर्वे भद्राणि पश्यंतु मां कश्चित् दुख भाग भवेत्” की प्रार्थना रोज करने वाले लोग जब कुछ लोगों को इसके दायरे से बाहर कर दें तो फिर हमें कहना ही पड़ेगा : संसद में जब होती नहीं कोई भी चर्चा पसमांदा इंसान की, सड़क और चौपाल ही अब से होंगे इस देश की संसद नई !

आपकी शोर मचाती, मेजें थपथपाती संसद मौजूदा कानून में संशोधन करती है और कहती है, एक खास धार्मिक समुदाय के लोग यदि छ: साल से अधिक समय से शरणार्थी हैं तो वे यहां के नागरिक बन सकते हैं, बाकी लोग नहीं. इसी कैब का एक सगा बड़ा भाई भी है, NCR. वह कहता है हम किसी को भी देश नागरिक नहीं मानते. अगर आप ऐसा मानते हैं तो सबूत दिखाओ और हां, ये आधार कार्ड कोई सबूत नहीं है !

लेकिन हमें आप नागरिक नहीं मानते, ऐसा कहने से कैसे चलेगा ? किसी आरोपी को गुनहगार साबित करने की जिम्मेदारी तो सरकार की ही होती है न !! आप साबित करिए न कि हम नागरिक नहीं हैं ! गरीब जनता कहां से जुटाए सबूत !! मलकीयत के नाम पर तो जब उसके पास कुछ है ही नहीं तो मकान, दुकान, खेती की जमीन के काग़ज़ात कहां से लाए ? आधार से वोट लेने में तो आपको कोई खोट नहीं दिखाई देता !! फिर नागरिकता में वह खोटा सबूत कैसे हो जाता है ?

कुछ लोग केवल इसलिए NRC के पक्ष में भी खड़े हैं कि इससे मुसलमानों को सबक सिखाया जा सकेगा ? हर मोर्चे पर विफल सरकार का समर्थन वे अधभरे पेट के साथ इसलिए करते हैं कि वे विदेश से आए थे कभी और यहां के लोगों पर अत्याचार किया था. लेकिन विदेश से तो बहुत सी और कौमें भी आई थीं और उनमें से बहुत से लोग तो यहां भी रह गए थे. आप लोग खुद भी तो मध्य एशिया से आए थे !! भूल गए क्या ? बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जाएगी ! अकेले मुसलमान ही परेशान नहीं होंगे इससे, गरीब, दलित और आदिवासी भी इसकी जद में आ जाएंगे !

गरीब के पास तो रहने के लिए, अपना कहने के लिए कुछ होता ही नहीं, बहुधा एक झोंपड़ी तक नहीं होती, सीवर के पाइप में, फुटपाथ पर ही गुजर बसर करता है वह अक्सर ! कहां से लाएगा वह कोई भी ऐसा दस्तावेज ?

पीढ़ियों से जंगल में रहता आदिवासी भी कैसे साबित कर पाएगा कि जंगल की उस जमीन पर उसका ही मालिकाना हक है, मलकीयत के कोई दस्तावेज तो हैं नहीं उसके पास. फिर कैसे साबित करेगा वह अपनी नागरिकता ? बहुत से दलित और पिछड़े भी इसका शिकार बन सकते हैं, क्योंकि वे ही तो खेतिहर मजदूर होते हैं !

लेकिन ये सारे के सारे NRC के समर्थन में इसलिए खड़े हैं कि वे हिन्दू हैं और मोदी- शाह की जोड़ी उनके लिए विदेशी मुसलमानों से बदला ले रही है. बेवकूफी भरे इस बदले की भावना उन्हें कितनी भारी पड़ने वाली है, इसका अहसास उन्हें कतई नहीं है और आंदोलकारियों की एक जिम्मेदारी यह भी बनती है उन्हें जागरूक करें, बताएं इसका क्या नुकसान होने वाला है !

समझ में आने भर की देर है, ‘अतुलित बल धामा’ हनुमान की तरह अपनी ही शक्ति को भुला चुकी जनता को याद दिलाने का काम आंदोलनकारी जामवंतों को ही करना है. यही काम किया था गांधी जी ने नमक कानून को तोड़ते हुए; एक लंबी यात्रा की थी दांडी मार्च. गांव-गांव में अलख जगाया था, सोते हुओंं को जगाया था, उठ जाग मुसाफिर भोर भई ! आम आदमी को बताया था, कैसे नमक जैसी मामूली रोजाना इस्तेमाल की चीज पर भी टैक्स लगा दिया था लूटेरों ने. तभी वे कह पाने की स्थिति में होंगे, ‘मत मानिए हमें नागरिक, हम भी कहां मानते हैं तुम्हें अपनी सरकार ? तुम अगर हमारी बात नहीं मानते, अपनी मनमर्जी को हमारा हित बता कर हमारे ही खिलाफ इस्तेमाल करते हो, तो हम भी ऐलान करते हैं कि तुम्हारे किसी फरमान को हम नहीं मानेंगे, कोई टैक्स नहीं देंगे, कोई भी जोर-जबरदस्ती बरदाश्त नहीं करेंगे ! ‘

तुम्हें अपनी मंजिल मुबारक, लेकिन अब से हमारी राहें अलग हैं, तुम्हारे किसी भी पाप के भागीदार अब हम नहीं है — यह ऐलान है सड़क और चौपाल की संसद का !

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