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कोरोना वेक्सीन : ये हालत है हमारे देश की !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 10, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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जिस देश के भी शासन प्रमुख ने कोरोना से इनकार किया या अपने नागरिकों को कोरोना वेक्सीन लगवाने में आनाकानी की, उसकी संदेहास्पद ढंग से मृत्यु हो गयी. और मजे की बात यह है जैसे ही उनकी मृत्यु हुई उनके बाद शासन की बागडोर सम्भालने वालो ने इस ‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ के सामने घुटने टेक दिए. अब वहां टीके लग रहे हैं और सब ठीक है. कितने आश्चर्य की बात है कि पूरे विश्व में इन तीन देशों के राष्ट्रपतियों ने ही कोरोना ओर वेक्सीन प्रोग्राम का विरोध किया था और आज वे जीवित नहीं हैं. लगभग एक साल के भीतर तीनों की संदेहास्पद ढंग से मृत्यु हो गयी.

कोरोना वेक्सीन : ये हालत है हमारे देश की !

गिरीश मालवीय

एक तरफ आप विज्ञान की दुहाई देते हो और दूसरी तरफ कहते हो कि हम भारत में कोरोना वेक्सीन कर क्लिनिकल ट्रायल के डेटा का खुलासा नही करेंगे ? कल सुप्रीम कोर्ट ने टीकाकरण संबधी एक याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि ‘हम वैक्सीन को लेकर हिचक के खिलाफ लड़ रहे हैं. ऐसे में इसके प्रभावकारिता को लेकर अदालत की ओर से कोई संदेश नहीं आना चाहिए.’ उन्होंने उल्टे याचिकाकर्ता से ही पूछ लिया कि ‘क्या आपको नहीं लगता कि इस तरह की याचिकाओं से लोगों के मन में संदेह पैदा होगा ? आप क्या चाहते हैं कि टीकाकरण कार्यक्रम को बंद किया जाए ?’

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इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य टीकाकरण पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया हालांकि कोर्ट ने क्लिनिकल ट्रायल पर केंद्र को नोटिस देने की बात की है लेकिन अभी स्थिति पूरी तरह से साफ नहीं है कि यह डेटा कब तक दिया जाएगा.

दरअसल यह याचिका टीकाकरण के राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह के पूर्व सदस्य डॉ. जैकब पुलियेल ने दायर की है. वकील प्रशांत भूषण के माध्यम से दायर इस याचिका में सरकार को निर्देश देने की गुहार लगाई गई है कि वह वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रायल के अलग-अलग डेटा को सार्वजनिक करें क्योंकि वैक्सीन को इमरजेंसी इस्तेमाल के तौर पर देश को लोगों को दिया जा रहा है.

याचिका में टीकाकरण के बाद होने वाले प्रतिकूल प्रभाव के आंकड़े को सार्वजनिक करने की मांग की गई. कहा गया कि केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह बताए कि कोरोना वैक्सीन लेने के बाद भी कितने लोग संक्रमित हुए हैं ? इनमें से कितनों को अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत आई और कितने लोगों की संक्रमण की वजह से मौत हुई ?

आप ही बताइए कि क्या यह देश की जनता को जानने का हक नहीं है ? एक बात जो तमाम बुध्दिजीवी वर्ग को ठीक से समझनी चाहिए कि इन तमाम वेक्सीन को अभी सिर्फ आपातकालीन अनुमति ही दी गई है. अमेरिका में भी COVID-19 टीकों में से कोई भी FDA एप्रूव्ड नहीं है. उन्हें केवल आपातकालीन उपयोग के लिए अनुमोदित किया गया था, जो कि FDA-अनुमोदन के समान नहीं है.

सरकार के मुताबिक, इन टीकों का जानवरों पर परीक्षण भी नहीं किया गया था. इससे पहले कि इसे सीधे तौर पर इंसानों पर प्रायोगिक दवा के रूप में इस्तेमाल किया गया है. ऐसे में क्लिनिकल डेटा का महत्व और बढ़ जाता है.

याचिका में इसी बात पर जोर दिया गया है. याचिका में कहा गया है कि जिन टीकों की सुरक्षा और असर जानने के लिए पर्याप्त रूप से ट्रायल नहीं किया गया है, उनके डेटा का खुलासा किए बिना ही ‘आपातकालीन उपयोग’ की मंजूरी दी गई है. याचिका के मुताबिक यह डब्ल्यूएचओ और आईसीएमआर द्वारा निर्धारित नियमों का उल्लंघन है.

जैकब पुलियेल ने याचिका में कहा है कि इस डेटा को शेयर नहीं किया जाना टीकों के निष्पक्ष मूल्यांकन को लेकर सवाल खड़े करता है. क्लीनिकल ट्रायल डेटा जानना इसलिए जरूरी है कि क्योंकि आबादी के अलग-अलग वर्ग टीकाकरण के बाद प्रतिकूल घटनाओं के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं.

दुनिया के हर देश में वेक्सीन के एडवर्स इफेक्ट रिपोर्ट किये जाते हैं. उन्हें पब्लिक डोमेन में रखा जाता है. उस पर बहस होती है. ऐसी ही चीजो से विज्ञान मजबूत होता है लेकिन यहां पर उल्टा है.

इस प्रकार के अवलोकन से दूसरे देशों में वेक्सीन के एडवर्स इफेक्ट से हो रहे रक्त के थक्के जमने की समस्या और स्ट्रोक को पहचानने में मदद मिली है. कई देशों ने तब तक कोविशील्ड को अपने नागरिकों को देना बंद कर दिया है, जब तक वे इसका मूल्यांकन नहीं कर लेते. कई देशों में उपलब्ध आंकड़ों की समीक्षा कर के एस्ट्राजेन्का के इस्तेमाल पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है.

यहां किसी से यह बात करो तो वह पहले आपको कांस्पिरेसी थ्योरिस्ट घोषित करता है, फिर वो पूछता है कि आप यह बताओ कि आप कोरोना को मानते हो कि नहीं ? अरे भाई क्या हर चीज सिर्फ ब्लैक और व्हाइट ही होती है, जो ग्रे एरिया है उस पर कोई बात करेगा या नहीं ?

कोरोना के टीकाकरण के सर्टिफिकेट की अनिवार्यता

मुंबई की लाइफ लाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेन सेवा 15 अगस्त से शुरू हो रही है लेकिन इसमें यात्रा करने की अनुमति उन्हीं लोगों को दी जाएगी जो कोरोना टीके की दोनों खुराक ले चुके हैं. यह कल रात की खबर है. वैसे यह खबर पहले ही आ चुकी है कि देश का रेलवे बोर्ड यात्रियों के लिए कोरोना के टीकाकरण के सर्टिफिकेट को अनिवार्य बनाने पर विचार कर रहा है.

इसका मतलब यह है कि अगर आप ट्रेन से यात्रा करते हैं तो आपको टीका लगवाना जरूरी है और आपके पास टीका लगवाने का सर्टिफिकेट भी होना चाहिए. मुंबई लोकल ट्रेन में सफर के लिए वेक्सीनेशन सर्टिफिकेट का मांगा जाना इसकी शुरुआत है. दिल्ली में भी कह दिया गया है कि वैक्सीन की दोनों डोज का सर्टिफिकेट दिखाने पर ही दर्शकों को अक्टूबर में रामलीला देखने की अनुमति मिलेगी.

देश भर में कालेज खुल रहे हैं, मगर विद्यार्थियों के लिए प्रबंधक कमेटियों की तरफ से वैक्सीनेशन जरूरी कर दिया गया है. साफ तौर पर कहा गया है कि 18 साल से अधिक उम्र के विद्यार्थी वैक्सीनेशन लगवाने के बाद ही कालेज आ सकते हैं. बिना वैक्सीनेशन सर्टिफिकेट के विद्यार्थियों को कालेज में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा.

केरल सरकार भी पीछे नहीं है उसने नए कोविड प्रोटोकॉल लागू कर दिए हैं जो लोग दुकानों, बैंकों और अन्य प्रतिष्ठानों में प्रवेश करते हैं, उन्हें टीके की कम से कम एक डोज लगी होनी चाहिए या उनका आरटी-पीसीआर प्रमाणपत्र 72 घंटे से ज्यादा पुराना नहीं होना चाहिए. कोई बताए यह सब किस आधार पर किया जा रहा है ? दुनिया की किस स्वास्थ्य एजेंसी ने यह लिख कर दिया है कि जिसे टीका लग गया है वह संक्रमण नहीं फैला सकता ?

वेक्सीन और डेल्टा वेरिएंट

केरल की स्वास्थ्य मंत्री कह रही है कि किसी को भी डेल्टा वैरिएंट की उपस्थिति को नहीं भूलना चाहिए लेकिन पूरी दुनिया से जो आंकड़े आ रहे हैं उससे साफ हो गया है कि कोरोना के डेल्टा वेरियंट के प्रसार को रोकने में वैक्सीन कोई ख़ास सफल नहीं है.

अमेरिकी संस्थान सेंटर फॉर डीजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) की एक अप्रकाशित रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि वैक्सीन दोनों डोज ले चुके लोगों से भी डेल्टा वैरिएंट का संक्रमण फैल सकता है. चौंकाने वाली बात यह है कि उनसे उतनी ही तेजी से संक्रमण फैलेगा, जितनी तेजी से बिना वैक्सीन लगवाए लोगों से फैल रहा है.

CDC के डायरेक्टर डॉ. रोशेल पी वालेंस्की ने बताया कि वैक्सीनेशन करा चुके लोगों की नाक और गले में उतना ही वायरस होता है, जितना कि टीकाकरण न कराने वालों में, जिससे ये आसानी से फैल जाता है.

ब्रिटेन के पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड (PHE) ने अपने लेटेस्ट कोविड-19 अपडेट में साफ़ कह दिया है कि इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि जिन लोगों को वैक्सीन लग चुकी है, वे भी डेल्टा वेरिएंट को उन्हीं लोगों की तरह तेजी से फैला सकते हैं, जिन्हें अभी तक वैक्सीन नहीं लगी है.

PHE ने कहा कि 19 जुलाई से दो अगस्त तक डेल्टा वेरिएंट से संक्रमित होकर अस्पताल में भर्ती होने वाले 1467 लोगों में से 55.1 फीसदी मरीजों ने वैक्सीन नहीं लगवाई थी. वहीं, 34.9 फीसदी लोगों को (512 लोग) वैक्सीन की दोनों डोज लग चुकी थी. इस अध्ययन से साफ़ है कि वेक्सीन नहीं लगवाने वाले, वेक्सीन लगवाने वाले लोगो की तुलना में कहीं अधिक संख्या में होस्पिटलाइज़ हो रहे हो ऐसा भी नहीं है. दोनों का लगभग औसत बराबर ही है.

अमेरिका के बारे में खबर है कि वहां कोरोना का आपातकाल वापस लौट आया है. ये तब है कि वहां 60 प्रतिशत लोगों को कम से कम वेक्सीन की पहली डोज लग गयी है.

मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब वेक्सीनेशन की चर्चा शुरू हुई थी तब कहा जा रहा था कि हर्ड इम्यूनिटी के लिए लगभग 70 से 75 फीसदी आबादी को वेक्सीन लगवानी होगी. कई देशों में यह वेक्सीन लगा चुके लोगों की संख्या इस आंकड़े के बहुत नजदीक है लेकिन वहां आज भी मरीजों ओर मौतो की संख्या रुकी नहीं है. अब जिस हिसाब से यह प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं, उससे लगता है कि पूरे 100 प्रतिशत आबादी को ही वेक्सीन लगवानी होगी.

जिस देश के भी शासन प्रमुख ने कोरोना से इनकार किया उसकी संदेहास्पद मृत्यु हुई

जिस देश के भी शासन प्रमुख ने कोरोना से इनकार किया या अपने नागरिकों को कोरोना वेक्सीन लगवाने में आनाकानी की, उसकी संदेहास्पद ढंग से मृत्यु हो गयी. और मजे की बात यह है जैसे ही उनकी मृत्यु हुई उनके बाद शासन की बागडोर सम्भालने वालो ने इस ‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ के सामने घुटने टेक दिए. अब वहां टीके लग रहे हैं और सब ठीक है.

सबसे ताजा मामला हैती का है, आज से ठीक एक महीने पहले हैती के राष्ट्रपति, जोवेनेल मोसे की 28 भाड़े के सैनिकों के एक सुव्यवस्थित समूह द्वारा रात में उनके घर में उनके बिस्तर पर गोली मारकर हत्या कर दी गई.

पश्चिमी गोलार्ध में हैती ही एकमात्र देश था जिसने कोरोना वैक्सीन प्रोग्राम को लागू करने से इनकार कर दिया था. एस्ट्राजेन्का को तो साफ मना कर दिया था. हैती के राष्ट्रपति राष्ट्रपति जोवेनेल मोसे ने वायरस से बचाव के लिए हैती के लोगों से हर्बल ड्रिंक पीने का आग्रह किया था. हैती आश्चर्यजनक रूप से कोरोना के प्रकोप से बचा रह गया.

हैती ने उनके समय में कोरोना वायरस को खारिज कर दिया या इसके अस्तित्व पर सवाल उठाए थे. लेकिन जैसे ही 7 जुलाई जोवेनल मोसे की हत्या हुई अमेरिका के राष्ट्रपति जो बिडेन ने अगले हफ्ते आधा मिलियन वैक्सीन खुराक भेजीं, जिन्हें 14 जुलाई को तुरंत पोर्ट औ प्रिंस में पहुंचा दिया गया. अब हैती में टीके लग रहे हैं.

हर्बल ड्रिंक की बात से आपको तंजानिया के राष्ट्रपति मुगफेली की याद आ गयी होगी. ये वही है जिन्होंने देश की केंद्रीय प्रयोगशाला में एक भेड़, बकरी और पपीते के फल के नमूने भेजे थे और उन सब में कोरोना पाया गया था. उन्होंने साफ साफ कोरोना के अस्तित्व से इनकार कर दिया था. अक्टूबर 2020 में तंजानिया में चुनाव हुए और जॉन मागूफुली ने 83 प्रतिशत वोट हासिल किये थे यानी वे फिर सत्ता में आ गये थे लेकिन फरवरी 2021 को वे गायब हुए और मार्च में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. उनकी मृत्यु का कारण हार्ट अटैक बताया गया.

उनके बाद जो राष्ट्रपति बनी वह एक महिला थी उन्होंने भी आत्मसमपर्ण कर दिया और अब वहां भी वेक्सीन लगना शुरू हो गयी है. लेकिन मौतों का यह सिलसिला तंजानिया से नहीं शुरू हुआ था. यह शुरू बुरुंडी से हुआ था. पिछले साल जून 2020 में वहां के राष्ट्रपति पियरे नर्कुनज़िज़ा की हार्ट अटैक से अचानक मृत्यु हो गई थी. उन्होंने भी कोरोना को बीमारी मानने से इनकार कर दिया था.

बुरुंडी के नए राष्ट्रपति एवरिस्टे नादिशिमी ने जुलाई में घोषणा की कि COVID-19 देश का ‘सबसे बड़ा दुश्मन’ था लेकिन वह भी कोरोना टीकाकरण के खिलाफ थे लेकिन पता चला है कि उन्हें भी आईएमएफ ने कर्ज देकर पटा लिया है. बुरुंडी को महामारी के नतीजे से निपटने में मदद करने के लिए $78 मिलियन (65 मिलियन यूरो) के सहायता पैकेज के लिए सैद्धांतिक रूप से सहमति बन गयी है.

स्वास्थ्य मंत्री थद्दी नदिकुमाना ने घोषणा की कि बुरुंडी विश्व बैंक द्वारा पेश किए गए कोवैक्स टीकों को स्वीकार करेगा, अब वहां भी टीके लगने शुरू हो गए हैं.

कितने आश्चर्य की बात है कि पूरे विश्व में इन तीन देशों के राष्ट्रपतियों ने ही कोरोना ओर वेक्सीन प्रोग्राम का विरोध किया था और आज वे जीवित नहीं हैं. लगभग एक साल के भीतर तीनों की संदेहास्पद ढंग से मृत्यु हो गयी.

(बहस करते हुए कृपया फैक्ट चेक जैसे बकवास लेखों का सहारा न ले. फैक्ट चेक करने वालों की फंडिंग कैसे होती है, कौन करता है, हमें आपसे बेहतर पता है).

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