Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

लिबरल होने के मायने

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 3, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

लिबरल होने के मायने

गुरूचरण सिंह
लिबरल यानि समझदार लोग, परिवार के लिए ही जीने मरने वाले लोग, जो अपने काम से काम रखते हैं और मौका देख कर ही बात करते हैं !

गुटनिरपेक्षता/तटस्थता की तरह उदार मानसिकता वाला आदमी भी अब लुप्त हो जाने वाली प्रजाति की तरह क्या अजायब घर की शोभा बनने जा रहा है ? देश ही नहीं पूरे विश्व के राजनीतिक रंगमंच पर तो उसकी कोई भूमिका तो निश्चय ही दिखाई नहीं देती. इतिहास की किताबों में ही दर्ज है वह अब तो. अपनी नियति इन दोनों ने खुद ही लिखी थी शायद. दिनकर जी तो पहले ही चेतावनी दे चुके थे :

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

समर शेष है,
नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं,
समय लिखेगा उनका भी अपराध !

इन शब्दों को अपनी निष्क्रियता की अगर ढाल बना लिया जाएगा, संघ-भाजपा की तरह अगर भाव की जमीन पर केवल शब्दों का कलेवर ही भगवे ध्वज की भांति फहराया जाएगा तो थोथी मर्यादाओं से बंधे लोगों का यही परिणाम तो होगा. सड़क पर चीरहरण होता रहेगा और आप एक न एक बहाना बना कर खामोशी से निकल लेंगे वहां से. दबंगों का हौसला ऐसे ही तो बढ़ा करता है !

कल ऐसा ही एक तर्क देखने को मिला था ‘ऐसे ही किसी लिबरल’ की वाल पर. उनका कहना था कि आज देश जो भी भुगत रहा है उसमें मुसलमानों की जिम्मेदारी भी बहुत ज्यादा है (क्योंकि) हिंदु कट्टरता तो अब सामाजिक रूप से स्वीकृत हो गई है. लिबरल लोग देखते-देखते अल्प में भी अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं और इसकी जिम्मेदारी सिर्फ कट्टर हिंदुओं की ही नहीं है, कट्टर मुसलमानों की भी है.

दरअसल राक्षस पत्नी से भीम के पौत्र बर्बरीक की कथा के जरिए इस सवाल के साथ कही गई थी यह बात – क्या हमेशा कमज़ोर ही सही होते हैं ? बचपन कुरुक्षेत्र में बीता है, संघ के स्कूल में ही पढ़ा हूं और बर्बरीक के कटे सिर को युद्ध का दृश्य दिखाने के लिए बनाए गए स्तंभ सहित महाभारत में वर्णित युद्ध के सभी स्थलों से भी परिचित हूं, इसलिए पूरी पोस्ट पढ़ गया. कर्ण की तरह छलिया कृष्ण ने इसके साथ भी छल किया था, जो मां के दिए संस्कारों के अनुसार कमजोर पक्ष का साथ देने के लिए आया था. उसकी वीरता परख लेने के बाद कृष्ण ने ब्राह्मण वेश में कर्ण के कवच कुंडल की तरह उसका शीश ही मांग लिया था !

बेशक सही होते हैं बहुसंख्यक कमज़ोर क्योंकि अक्सर वे ही तो दबंगई का शिकार होते आए हैं ! सहनशक्ति जब जवाब देने लगती है तो यही लोग, जिनके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता, वही नए समाज की बुनियाद बनते हैं, क्रांति का सूत्रपात करते हैं ! इनमें न कोई हिंदू होता है, और न ही कोई मुस्लिम और न ही किसी और धार्मिक पहचान का कोई आदमी ही ! वे तो बस कमज़ोर, गरीब और पहचानहीन लोग होते हैं ! पहचान वाले तो ताकतवर, अमीर और जालिम लोग हुआ करते हैं, जिनके लिए कहा गया है ‘हिंदु कट्टरता तो अब सामाजिक रूप से भी स्वीकृत हो चुकी है !’ यानि फिर एक खास पहचान के चलते मुट्ठी भर लोगों के साथ खड़े होने का अहसास.

गलतियां बेशक मुस्लिम समाज से भी हुई हैं क्योंकि नेतृत्व वहां भी संघ जैसे अगिया बेतालों के हाथ में चला गया है. आजादी से पहले वाली संघी-मुसंघी धुरी आज भी यही धुरी बेशक अपनी ही चाल चले जा रही है. पढ़े-लिखे लोगों की उपेक्षा दोनों ही ओर है वरना कोई वजह नहीं दिखाई देती कि आजादी के समय जिस मुस्लिम समाज में पढ़े-लिखे लोगों की फीसदी आबादी हिंदुओं से कहीं ज्यादा धी, 74 साल बाद उसी समाज की हालत दलितों से भी बदतर कैसे हो गई ?

पूरे देश में सीएए और एनआरसी को लेकर प्रदर्शन जारी हैं लेकिन तमाम धरने प्रदर्शनों के बीच ‘लिबरल’ का स्टिकर चिपकाए रखने वाला विपक्ष है कहां ? दमन के शिकार यूपी में तो इन्हीं सियासी पार्टियों ने प्रदर्शनकारियों को उनके ही हाल पर छोड़ दिया है. एक रहस्यमय खामोशी ओढ ली है इन नेताओं ने, जिसके चलते जामिया प्रदर्शन की तरह सत्ता के संरक्षण में पुलिस गुंडे की भूमिका में आ गई है और गुंडे पुलिस के साथ चल रहे हैं. सड़कों पर पली बढ़ी होने का दावा करने वाली सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तो बंगले से ही बयानवीर की भूमिका में दिख रहे हैं. अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हो रही सरगर्मियों के साथ अंतरराष्ट्रीय अदालत हेग के सामने विरोध प्रदर्शन के बावजूद विपक्ष की खामोशी और भी भयावह हो जाती है. नतीजा यह कि सत्ता पक्ष को यह बताने में थोड़ी बहुत कामयाबी तो मिल ही रही है कि प्राय: मुस्लिम समाज ही विरोध में खड़ा है, जिसके चलते हिंदू फिर से गोलबंद होने लगे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार अरुण महेश्वरी का कथन इस परिपेक्ष्य में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, ‘विरोध किसी भी मनुष्य का पहला लोकतांत्रिक अधिकार है. अगर सत्ता प्रतिष्ठान उस पर रोक लगाने लगें तो मामला गंभीर हो जाता है. ऐसे में अगर कोई सियासी दल महज अपनी खाल बचाए रखने के लिए राजनीतिक धर्म भी पूरा नहीं कर रहा है तो ऐसे नेताओं को इतिहास भले माफ कर दे, लेकिन जनता माफ नहीं करेगी.’

बहुमत के साथ होने के अहसास के चलते सत्ता पक्ष वैसे भी सुनता कम ही है और जब इसके साथ संघी हठधर्मिता भी जुड़ जाए तो फिर राम ही मालिक लेकिन अपने ही बुजुर्ग नेता प्रभाश जोशी जैसे वरिष्ठ पत्रकार की बात को तो सुनिए. वैसे आपकी तो आप ही जाने हम तो कदम कदम अगाह करते ही रहेगें. सुनिए बुजुर्ग नेता क्या कह रहे हैं :

‘1. भारत अगर ज्यादातर मुसलमानों को निकाल कर एक हिन्दू राष्ट्र हो जता है तो इससे सबसे ज़्यादा ताक़त तो पाकिस्तान और बांग्लादेश को ही मिलेगी.

2. इस्लामी कट्टरपंथियों ने मुस्लिम समाज का और सिख उग्रवादियों ने सिख समाज का जो हाल किया है, ठीक वही हाल हिन्दू कट्टरपंथी हिन्दू समाज का करना चाहते हैं.’

यह वक्त कट्टर हिंदुओं के लिए तो अच्छा है ही, महामहिम राज्यपाल आरिफ मोहम्मद ख़ान की तरह लिबरल मुसलमानों के लिए भी मुफीद है. लिबरल माने भाजपा की गोद में जा बैठे लोग पक्ष तो अब आपको लेना ही होगा. अगर आप सत्ता पक्ष के खेमे में नहीं हैं तो उसके खिलाफ हैं. लिबरल यानि समझदार लोग, परिवार के लिए ही जीने मरने वाले लोग, जो अपने काम से काम रखते हैं और मौका देख कर ही बात करते हैं ! हमारे जैसे कुछ बेवकूफों की तरह नहीं जो आ बैल मुझे मार की मुद्रा में खड़े रहते हैं :

अजरा आपा ने इसी बात को रेखांकित करते हुए हाशिम रज़ा का एक शेयर भेजा है :

उधर है नेजा ओ’ खंजर मगर इधर हम लोग
मुक़ाबले में खड़े हैं कलम उठाए हुए !

Read Also –

केवल साल ही तो बदला है
मर्यादा पुरुषोत्तम या संहारक राम ?
कौन गुमराह कर रहा है देश की जनता को ?
देश को खून में डूबो रहा है मोदी-शाह की जोड़ी

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

Tags: लिबरल
Previous Post

नफरत की प्रयोगशाला

Next Post

एसबीआई : पापों का प्रायश्चित

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

एसबीआई : पापों का प्रायश्चित

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

रोज़गार के प्रश्न को भारत के बेरोज़गार युवाओं ने ही ख़त्म कर दिया

June 7, 2020

कश्मीरी आवाम का सम्मान करना सीखें

August 6, 2019

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.