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ब्रेनड्रेन : कौन दिमाग खपाए इन बातों पर ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 23, 2020
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ब्रेनड्रेन : कौन दिमाग खपाए इन बातों पर ?

गुरूचरण सिंह

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बात तो आपकी यकीनन सही है ! आर्थिक नीतियों का स्थान जहां धर्म, ‘संस्कृति’ और दिखावटी देशभक्ति ने ले लिया हो, जहां भुखमरी, बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य पर चर्चा करने के स्थान पर सत्तापक्ष की रुचि नागरिकता कानून और नागरिकता रजिस्टर जैसे कानून लाकर सामाजिक टकराव खड़ा करने में हो, वहां पर ऐसे बुनियादी और श्रमसाध्य सवालों पर भला कौन ‘ बेवकूफ’ अपना समय ‘वेस्ट’ करता है ? रामनाम की लूट चल रही है, आप भी अगर छीन सकते हैं तो छीन लो अपना हिस्सा !!

अमेरिका और यूरोप के देशों ने अपने यहां के ब्रेन ड्रेन (प्रतिभा पलायन) को रोकने के लिए तमाम तरह के कड़े नियम बनाए हुए हैं. इनकी तरह दूसरे कई देशों ने भी इसी मंशा से अलग कानून बनाए हैं, जैसे कमाने के लिए अगर विदेश जाना है तो पहले वहां की फ़ौज की सर्विस करना जरूरी है. सच्चाई तो यह है कि इन देशों का एक गोल्डेन रूल है – अगर उनके यहां ऐसे लोगों (बाहर जाने वाले) की संख्या देश की जरूरतों से अधिक हुई तो ही उन्हें ऐसी अनुमति दी जाएगी लेकिन इन्हीं देशों ने तीसरी दुनिया/ विकासशील देशों के बेहतरीन दिमागों को सस्ते में खरीदने के लिए एकदम अलग किस्म के नियम बना रखे हैं. आज हमारे देश में जिस IIT को विकास का पैमाना माना जाता है, उनके धड़धड़ खोले जाने के पीछे पश्चिम की यही नीतियां हैं, जिनके तहत इन संस्थानों को भारी सब्सिडी दी जाती है.

मेरा यकीन है कि अब आप यह पूछना चाहेंगे कि यही पैसा ये देश अपने यहां भी तो लगा सकते थे ऐसे संस्थान नहीं खोलने में !! तो फिर वहां ऐसा क्यों नहीं किया ? अरे भई, यह तो सीधे-साधे व्यापार का मामला है. अपने यहां ऐसे संस्थान खोल कर इंजिनियर पैदा करने में जो खर्च आता है, उसके 1/6 खर्च में तो हमारे यहां से तैयार इंजिनियर ही मिल जाते हैं, तो फिर फालतू में यह खर्च क्यों करना ? इनमें पढ़ने वाले हर बच्चे का सपना किसी एमएनसी में नौकरी करना और अक्सर विदेश में बना ही होता है क्योंकि इनमें पढ़ने वाले छात्रों के दिमाग में एक बड़े ही सलीके से डाल दी जाती है कि उन्हें करियर के लिए केवल अमेरिका/यूरोप ही जाना है. पढ़ाई के दौरान ही उनके लिए ऐसा ही एक माहौल बना दिया जाता है; IITs में जो सिलेबस भी पढ़ाया जाता है वह भी अमेरिका/यूरोप के हिसाब से तैयार किया जाता है. अगर कभी देश के अंदर इसके इस्तेमाल की नौबत आई तो आप जान सकेंगे कि इस पाठ्यक्रम का महज़ 10-20% ही इस देश के काम का है बाकी 80% अमेरिका/यूरोप के हिसाब से बना हुआ है !!

मतलब यह कि पहले से ही लगभग सुनिश्चित कर लिया जाता है कि हमारे यहां के बेहतरीन दिमाग में अमेरिका का एकमात्र विकल्प हो ! अमेरिका यदि इतनी अधिक सब्सिडी हमारे IITs को नहीं देता तो यकीन मानिए IIT से बी.टेक. करना कम से कम चार गुणा महंगा होता. एक अनुमान के मुताबिक ब्रेन ड्रेन से हमारा हर साल लगभग 25 अरब डॉलर का नुकसान होता है. व्यापार का तो यही नियम है – एक का नुकसान, दूसरे का फायदा ! इसके चलते अमेरिका को अपने देश की तुलना में एक तिहाई सस्ते दाम में इंजिनियर मिल जाते हैं यानि हमारे संस्थानों पर थोड़ा-सा खर्च करके अमेरिका हर साल अपने 150-200 अरब डॉलर बचा लेता है.

तो फिर सवाल पैदा होता है कि हम क्यों नहीं पश्चिमी देशों की तरह ब्रेन ड्रेन रोकने के लिए क़ानून बना लेते ? जरूर बना सकते हैं लेकिन एक समस्या है; इससे हमारे नेताओं को इसके चलते होती मोटी सालाना कमाई बंद हो जाएगी और IITs को मिलने वाली अमेरिकी सब्सिडी रुक जाएगी. इन पश्चिमी देशों में राष्ट्रवादी उभार के चलते इस नीति के खिलाफ आवाज उठने लगी है और वहां के लोग भी अब एशियाई प्रतिभा का विरोध करने लगे हैं !

हमारे यहां से जाने वाले लड़के-लड़कियों को उन देशों में कच्चा माल कहा जाता है और उनकी सप्लाई का धंधा हमारे यहां खूब जोरों से चल रहा है. हमारे सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की खरीद-फरोख्त होती है ठेके पर और इन सॉफ्टवेयर इंजिनियरों का हाल तो खाड़ी देशों में जाने वाले मजदूरों से भी बदतर है. हमारे यहां रेलवे में जैसे तीन टियर होते हैं वैसे ही सिलिकॉन वैली में 5- 6 टियर के बिस्तरों वाले कमरों में रहते हैं ये लोग !

बहुत ही कमाल का खेल यह ! आपका दुश्मन आपको आपकी ही गोटी से ही पीट जाता है, आपको पता भी नहीं चलता. अपनी ही हार पर आप ताली पीटते हैं ! दरअसल अमेरिका कभी नहीं चाहता कि देश की तकनीकी विकास हो; सब्सिडी का नाटक तो इसी मकसद से बनाई गई नीति का एक आवश्यक अंग है. हमारे यहां के इंजिनियर, डॉक्टर, मैनेजर पश्चिमी देशों की तुलना में बहुत कम पैसे पर काम करने को तैयार होते हैं और वो भी ज्यादा समय तक, कारण है मिलने वाले वेतन की भारतीय रुपए में गणना. वहां रहन-सहन पर होने वाला खर्च के बारे में तो वे सोचते भी नहीं ! यहां अगर किसी से कहो कि 10 बजे से शाम 5 बजे तक काम करो तो वह मुंह बनाने लगता है और वही आदमी अमेरिका में अगर सुबह 8 बजे से रात के 8 बजे तक काम करता है तो कोई तकलीफ नहीं होती क्योंकि बारह घंटे काम न करने से वहां जिंदगी चलाना भी मुश्किल हो जाता है.

अब तो खैर सत्तारूढ़ पार्टी व्यावसायिक तो क्या सभी तरह की शिक्षा के निजीकरण के लिए कटिबद्ध है ! फिर भी उसकी तमाम कोशिशों के बावजूद IITs और IIMs का आकर्षण कम नहीं हुआ है. पहली प्राथमिकता छात्रों की इनमें दाखला लेने की है और इनमें दाखिला दिलाने की दुकानदारी भी जोरों पर है.

कितना अजीब है, चीन के बाद हमारे देश में सबसे बड़ी स्किल्ड मैन पावर है, 65 हज़ार वैज्ञानिक हैं, सबसे ज़्यादा इंजीनियरिंग कॉलेज हमारे देश में हैं, अमेरिका से ज़्यादा हाई-टेक रिसर्च इन्स्टिट्यूट हैं भारत में. अमेरिका से ज़्यादा मेडिकल कॉलेज हैं भारत में, हमारे यहां पॉलिटेक्निक, ITI की संख्या ज़्यादा है, नेशनल लॅबोरेटरीस 44 से ज़्यादा हैं जो CSIR के कंट्रोल में हैं, इतना सब होने के बावजूद क्या कोई बता सकता है वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्र में हमारी उपलब्धि क्या है ? तीन-चार अपवादों को छोड़ कर हम क्यों नहीं नोबेल पुरस्कार विजेता पैदा कर पाते ?

दरअसल हमारी समस्या यह है कि हम किसी भी आदमी को उसकी डिग्री या पोस्ट के कद से नापते हैं. हमारी शिक्षा पद्धति पूरी तरह डिग्री के खेल मे फंसी हुई है, भले ही वह कैसे मिले ! यहां देश के शीर्ष नेता नकली डिग्री का खेल खेलते हुए पाए जाते हैं ! यही वजह है कि हम सोच ही नहीं पाते कि बिना डिग्री के भी कोई वैज्ञानिक या इंजीनियर हो सकता है !! अंग्रेज़ों ने ही डिग्री को प्रतिभा से जोड़ कर हमारे सारे तकनीकी इनफ्रास्ट्रक्चर को बर्बाद कर दिया है. आज भी यहां विद्वान की नहीं डिग्री की ही पूछ होती है. देर सबेर इन सवालों से जूझना तो पड़ेगा ही ! क्या हम लोग तैयार हैं ?

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