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बिहार में राजनीतिक जड़ता के प्रतीक नीतीश कुमार

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 10, 2020
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बिहार में राजनीतिक जड़ता के प्रतीक नीतीश कुमार

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हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

सवाल तो यह भी उठता है कि नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में आ चुकी जड़ता के प्रतीक बन गए हैं या आज भी राज्य की सत्ता के शीर्ष पर उनकी प्रासंगिकता उनके सुशासन की देन है ?

अभी हाल हाल तक लोग कयास लगा रहे थे कि वे भाजपा का दामन छोड़ फिर से लालू के गले भी लग जा सकते हैं. माना जाता था कि वे जिधर होंगे, जीत उधर ही होगी. लगातार 15 वर्षों से सत्ता में रहने के बावजूद ऐसी स्वीकार्यता कोई सामान्य बात नहीं है लेकिन, यहीं पर बिहार की राजनीतिक जड़ता भी सामने आती है.

पिछड़े तबके के अपने नेताओं को महत्वपूर्ण पद पर बैठाने के बावजूद बिहार में भाजपा का जनाधार व्यापक नहीं हो पाया है. उसे नीतीश कुमार के सहारे की आवश्यकता है ताकि अति पिछड़ों का वोट उसके सवर्ण जनाधार से जुड़ कर एक अजेय समीकरण बना सके.

इधर, राजद के साथ भी यही बात है. उसके साथ पिछड़ों का एक तबका जरूर है लेकिन वह इतना नहीं जो उसे राज्य की सत्ता में पहुंचा सके. नीतीश उसके साथ हो जाएं तो बाजी पलट सकती है. जीतन मांझी, उपेंद्र कुशवाहा आदि के साथ कोई प्रभावी जनसमर्थन नहीं है. वे अपनी सीटें निकाल लें यही गनीमत है. यह भ्रम बार-बार टूट चुका है कि मांझी के साथ महादलित का एक महत्वपूर्ण वोट बैंक और उपेंद्र कुशवाहा के साथ कुशवाहों की बड़ी संख्या का राजनीतिक समर्थन है. एक वीआईपी पार्टी है, जिस पर कोई टिप्पणी भी बेकार है.

15 वर्षों के अपने शासन काल में नीतीश कुमार ने अपना एक बड़ा प्रशंसक वर्ग निर्मित किया है. इनमें अति पिछड़ों की बड़ी संख्या और तमाम वर्गों की बहुत सारी महिलाएं शामिल हैं. महादलित का एक तबका भी इसमें जोड़ सकते हैं लेकिन, यह सब मिल कर भी नीतीश को अकेले सत्ता में पहुंचाने में सक्षम नहीं हैं.

तो, तीन ध्रुव हैं बिहार में. राजद, भाजपा और नीतीश कुमार. जिधर नीतीश उधर सत्ता. रामविलास पासवान बहुत छोटे खिलाड़ी बन कर रह गए हैं. वे समीकरणों को पलटने की क्षमता नहीं रखते. हांं, वे जिधर रहेंगे, उनका जो सीमित वोट बैंक है, वह उधर जाएगा. बिहार की राजनीति में यह अजीब सी जड़ता है जो नीतीश के आगे देख नहीं पा रही.

तेजस्वी यादव ने अपना वैसा तेज अब तक नहीं दिखाया है कि बिहारी युवा अपनी जातीय सीमाओं का अतिक्रमण कर उनमें अपनी आकांक्षाओं का अक्स देख सकें. वैसे भी, वे जातीय समीकरणों को साधने की असफल कोशिशें करते ही दिखते रहे हैं और अक्सर उनके बयान व्यापक तौर पर अग्राह्य रहे हैं. आप 80 प्रतिशत आरक्षण की मांग करके आज के युवाओं को प्रभावित नहीं कर सकते. उल्टे, कुछेक वर्गों को अपने से बहुत दूर जरूर कर लेते हैं.

ऐसे दौर में, जब अंध निजीकरण देश और समाज को अंधे कुएं में धकेल रहा हो, सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सीमा बढ़ाने का राग बेसुरा लगता है. तेजस्वी को निजीकरण के खिलाफ सड़कों पर उतरना चाहिये था, लेकिन वे, मायावती और अखिलेश जैसे नेता इस मामले में कुछ अधिक नहीं कर सकते. वे सब उसी नवउदारवादी व्यवस्था के अलग-अलग चेहरे हैं, जो आज के युवाओं के सामने बड़ी चुनौती बन कर खड़ी है.

सही मायनों में, बिहार और यूपी जैसे समस्याग्रस्त राज्यों में युवा नेतृत्वविहीन है और यही शून्य आज भी बिहार में नीतीश कुमार की स्वीकार्यता को स्पेस देता है.

नीतीश कुमार ने अपने राज के शुरुआती वर्षों में अपनी छाप छोड़ी, लेकिन कुछ वर्षों बाद हालात उनके काबू से बाहर होने लगे, चाहे वह कानून और व्यवस्था का मामला हो, शिक्षा और स्वास्थ्य का मामला हो या सुशासन की अन्य कसौटियां हों. उन्होंने नियोजित शिक्षकों की अवधारणा और उससे भी बदतर उनके चयन की अजीबोगरीब पद्धति लाकर राज्य की स्कूली शिक्षा को बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया है.

माना जाता है कि हाई कोर्ट की निरन्तर फटकार और निगरानी विभाग के निरन्तर लकीर पीटने के बावजूद आज भी एक लाख से ऊपर फर्जी शिक्षक बिहार के स्कूलों में कार्यरत हैं. स्कूल पढ़ाई के लिये कम, आंदोलनों के कारण अधिक कोलाहलग्रस्त है.

डेढ़ दशकों के उनके राज के बाद भी बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था का हाल बेहाल है. अभी कल एक अखबार की विस्तृत रिपोर्ट है कि राज्य के 37 जिलों में मात्र 2 जिलों के अस्पतालों में हृदयाघात की चिकित्सा की व्यवस्था है. डॉक्टरों और सहयोगी स्टाफ की कमी खतरनाक स्तरों को पार कर रही है.

सरकारी नियुक्तियों का कोई भी मामला बिना विवाद का नहीं है. प्रक्रिया में अनावश्यक और त्रासद देरी तो है ही, अनियमितता की भी ढेर सारी शिकायतें आम हैं. बेरोजगार युवा त्रस्त हैं और उनकी सुनने वाला कोई नहीं. लगता ही नहीं कि बेलगाम नौकरशाही पर कोई सक्षम अंकुश भी है.

सबसे महत्वपूर्ण है नीतीश कुमार के वैचारिक आभामंडल का क्षरित होना. एक दौर था कि भाजपा के साथ रह कर भी वे एक अलग वैचारिक द्वीप पर नजर आते थे और विचारधारा से कोई भी समझौता न करने की उनकी छवि ने उनका एक विशिष्ट आभा मंडल निर्मित किया था. लेकिन, हाल के वर्षों में अब वे पहले वाले नीतीश कुमार नजर नहीं आते.

कभी नरेंद्र मोदी के साथ अपने पोस्टर के जारी होने पर क्रुद्ध हो जाने वाले नीतीश अगले सप्ताह दिल्ली में अमित शाह के साथ मंच साझा करने वाले हैं. यह उनके वैचारिक आभामंडल को तार-तार कर देने वाली खबर है, भले ही इसका राजनीतिक लाभ उन्हें मिले और वे 2020 में फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बन जाएं !

लेकिन, 2005 से 2020 तक की अपनी राजनीतिक यात्रा में नीतीश जी बिहार में सत्ता के पर्याय भले ही बने रहे हों, हमने एक ऐसे नेता को निरन्तर क्षरित होते आभामंडल के साथ अपने वैचारिक पथ से भटकते देखा है, जिसे कभी नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में बहुत सारे लोग देख रहे थे.

वे अगर आज भी सत्ता के लिये प्रासंगिक हैं तो इसलिये नहीं कि उनका सुशासन लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है, बल्कि इसलिये कि बिहार की राजनीति जिस जड़ता की शिकार हो गई है उसके वे प्रतीक भी हैं और सबसे बड़े लाभार्थी भी.

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